अखबार की मुहिम से खुला मौत के ड्रेनेज का राज, दहल उठा इंदौर
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अखबार की मुहिम से खुला 'मौत के ड्रेनेज' का राज, दहल उठा इंदौर

इंदौर के भागीरथपुरा में ड्रेनेज मिला पानी पीने से मची तबाही; लगभग 1100 बीमार, 17 मौतें। अफसरशाही और पुरानी पाइपलाइनों ने मचाई शहर में बर्बादी, अब जागा प्रशासन।


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Indore Water Borne Epidemic : जिस शहर ने स्वच्छता के मामले में देश में अपनी एक अलग साख बनाई, उसी इंदौर के भागीरथपुरा इलाके से आई एक खबर ने पूरे सिस्टम की चूलें हिला दीं। यह सिर्फ दूषित पानी से हुई बीमारियों का मामला नहीं था, बल्कि नगर निगम, जनप्रतिनिधियों और अफसरशाही के बीच के उस 'कम्युनिकेशन गैप' का नतीजा था, जिसकी कीमत मासूम बच्चों और बेगुनाह नागरिकों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।


आम तौर पर देखा जाता है कि किसी गली मौहल्ले में गंदगी या घरों में आने वाले गंदे पानी से सम्बंधित शिकायतों को आखबारों में एक छोटे से कौने में चिपका दिया जाता है। ऐसा करके समाचार पत्र अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी को पूरा किया समझता है लेकिन उससे कभी समस्या का निवारण हो जाता है, कभी नहीं भी होता।
लेकिन इंदौर की घटना की बात करें तो पत्रकारिता ही वो वजह है, जिसकी मुहिम के चलते ये घटना इंदौर की एक बस्ती से पूरे देश तक पहुँच सकी है।

इंदौर की घटना की बात करे तो शुरुआत में वो भी इसी तरह की एक आम समस्या की तरह मध्य प्रदेश के प्रतिष्ठित समाचार पात्र दैनिक भास्कर तक पहुंची। लेकिन अख़बार के संपादक अमित मंडलोई के दिमाग में कुछ घंटी सी बजी और उन्होंने अपने पत्रकारों को ग्राउंड पर भेजा। इसके बाद तो जैसे आम सा समझा जाने वाला ये मुद्दा भयावह त्रासदी के रूप में सबके सामने आया।





हमने दैनिक भास्कर इंदौर के संपादक अमित मंडलोई से हुई बातचीत के आधार पर मिली जानकारियों को आधार बनाते हुए इस पूरे घटनाक्रम पर एक रिपोर्ट तैयार की है, ताकि ये समझा जा सके कि आखिर कब कैसे और क्या हुआ ? प्रशासन और शासन ने क्या किया और जो किया क्या वो काफी है?


27 दिसंबर 2025: जब पहली बार सामने आई खौफनाक तस्वीर

इस पूरी घटना की शुरुआत 27 दिसंबर को हुई। भागीरथपुरा से खबर आई कि बड़ी संख्या में लोग उल्टी-दस्त के शिकार हो रहे हैं। देखते ही देखते स्थानीय अस्पताल (वर्मा, त्रिवेणी और एलबी आदि हॉस्पिटल) मरीजों से पट गए हैं। आलम यह था कि अस्पतालों में पैर रखने तक की जगह नहीं बची। पहले दिन जब आंकड़ा अपडेट हुआ, तो पता चला कि करीब 150 से ज्यादा लोग बीमार हैं। दैनिक भास्कर की टीम जब मौके पर पहुँची, तो यह साफ हो गया था कि यह कोई साधारण मौसमी बीमारी नहीं, बल्कि पानी में घुला दूषित 'जहर' है।

इन्वेस्टिगेशन में खुला राज: 8 साल से रिसता 'सिस्टम का ड्रेनेज'

जांच आगे बढ़ी तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जिस शहर को हम सबसे स्वच्छ कहते हैं, वहां भागीरथपुरा में एक पुलिस चौकी के पास बने एक पब्लिक टॉयलेट का ड्रेनेज किसी पाइपलाइन से जुड़ा ही नहीं था। पिछले 8 साल से उस टॉयलेट की गंदगी जमीन के भीतर एक गड्ढे में जा रही थी। विडंबना देखिए, ठीक वहीं से पानी की मुख्य सप्लाई लाइन गुजर रही थी। ऐसा माना जा रहा है कि एक मामूली लीकेज ने ड्रेनेज की गंदगी को पीने के पानी में मिला दिया और घरों तक 'मौत' पहुँचने लगी।

एक मां की बेबसी और 5 महीने के अव्यान की मौत

इस पूरी घटना का सबसे दर्दनाक पहलू 5 महीने के मासूम अव्यान की मौत रही। अव्यान की माँ उसे दूध में थोड़ा पानी मिलाकर पिलाती थी, यह सोचकर कि शायद इससे बच्चा दूध आसानी से पचा पाएगा। उसे क्या पता था कि जिस पानी को वह जीवनदायिनी समझ रही है, वही उसके कलेजे के टुकड़े की जान ले लेगा। इस खबर ने न केवल इंदौर, बल्कि पूरे प्रदेश को रुला दिया।

सियासी ड्रामा और अफसरों पर गाज

जैसे-जैसे मौतों का आंकड़ा 11, 15 और फिर 17 तक पहुँचा, प्रशासन की नींद खुली। अखबार ने जब लगातार डेटा और पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट्स के साथ इन्वेस्टिगेशन शुरू की, तब जाकर सरकार हरकत में आई। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। जनप्रतिनिधियों का दावा था कि वे अगस्त से टेंडर होने की बात कह रहे थे, लेकिन अफसरों ने 'वर्क ऑर्डर' जारी नहीं किए। अंततः, दबाव बढ़ने पर 5-6 बड़े अफसरों पर कार्रवाई हुई, नगर निगम आयुक्त को हटाया गया और जल विभाग के उन प्रभारियों को सस्पेंड किया गया जो सालों से कुर्सियों पर जमे थे।

बुनियादी ढांचा: 30 साल पुरानी पाइपलाइन और मौत का जोखिम

अखबार की पड़ताल में यह भी सामने आया कि इंदौर के 85 में से लगभग 70 वार्डों से लगातार गंदे पानी की शिकायतें आती रही हैं। शहर के एक बड़े हिस्से में पाइपलाइनें 25-30 साल पुरानी हो चुकी हैं। कायदे से सीवरेज और पानी की लाइनें अलग-अलग दिशाओं में होनी चाहिए, लेकिन यहाँ वे समानांतर (Parallel) डली हुई हैं। ऐसे में जरा सा भी लीकेज सीधे जान का जोखिम खड़ा कर देता है।

मौजूदा स्थिति: क्या अब सब ठीक है?

प्रशासन ने अब 200 से ज्यादा टीमें मैदान में उतारी हैं। घर-घर जाकर सर्वे हो रहा है, लेकिन आज भी दर्जनों लोग अस्पतालों में भर्ती हैं। मुआवजे के नाम पर सरकार ने 2-2 लाख रुपये दिए हैं, लेकिन क्या किसी की जान की कीमत इतनी ही है? हाई कोर्ट भी इस मामले में बेहद सख्त रुख अपनाए हुए है।
1100 से ज्यादा लोग बीमार हुए। आज की बात करें तो सोमवार को भी बड़ी संख्या में मरीज अस्पताल पहुंचे थे, जिन्हें हैजा के लक्ष्ण थे।
यह घटना एक सबक है कि सिर्फ कागजों और रैंकिंग में 'स्वच्छ' होना काफी नहीं है। जब तक जमीन के नीचे बिछी पाइपलाइनों और जर्जर हो चुके सिस्टम को नहीं सुधारा जाएगा, तब तक 'भागीरथपुरा' जैसी त्रासदी का डर बना रहेगा।


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