
इंदौर पेयजल त्रासदी: हाईकोर्ट ने न्यायिक जांच के आदेश दिए, एक सदस्यीय आयोग गठित
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शहर में दूषित पानी की समस्या को बेहद गंभीर मानते हुए इसकी न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। अदालत ने एक सदस्यीय आयोग का गठन किया है जिसे मामले की स्वतंत्र जांच कर 4 हफ्तों के भीतर अंतरिम रिपोर्ट सौंपनी होगी।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में फैली पेयजल त्रासदी को गंभीर मानते हुए इसकी न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही अदालत ने इस मामले की जांच के लिए एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन भी किया है।
इंदौर बेंच ने मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान कहा कि मामले की प्रकृति अत्यंत गंभीर है और इसकी तत्काल व स्वतंत्र न्यायिक जांच आवश्यक है। अदालत ने आयोग को कार्यवाही शुरू होने की तारीख से चार सप्ताह के भीतर एक अंतरिम रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।
देर रात जारी हुआ आदेश
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने दिनभर सभी पक्षों को सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रखा था, जिसे देर रात जारी किया गया। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने भागीरथपुरा में फैली गैस्ट्रोएंटेराइटिस महामारी से जुड़ी 23 मौतों की एक ऑडिट रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश की।
सरकारी रिपोर्ट में आशंका जताई गई कि इनमें से 16 मौतें दूषित पेयजल के कारण हुई उल्टी-दस्त की बीमारी से जुड़ी हो सकती हैं।
सरकारी रिपोर्ट पर अदालत के सवाल
राज्य सरकार की ओर से सौंपी गई रिपोर्ट इंदौर स्थित महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के पांच विशेषज्ञों की समिति ने तैयार की थी। इसमें कहा गया कि चार मौतों का इस बीमारी से कोई संबंध नहीं था, जबकि तीन अन्य मौतों के कारणों को लेकर कोई स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकल सका।
इस पर अदालत ने सरकार से रिपोर्ट के वैज्ञानिक आधार को लेकर सवाल उठाए और विशेष रूप से रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए ‘वर्बल ऑटोप्सी’ शब्द पर भी हैरानी जताई। अदालत ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि उसने यह शब्द पहली बार सुना है और स्थिति बेहद खतरनाक है।
मौतों की संख्या पर संदेह
अदालत को यह भी बताया गया कि इंदौर के पास महू इलाके में भी दूषित पानी से लोग बीमार पड़े हैं। याचिकाकर्ताओं और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मरने वालों की संख्या करीब 30 हो सकती है, जबकि सरकारी रिपोर्ट में बिना ठोस रिकॉर्ड के केवल 16 मौतों का उल्लेख किया गया है।
स्वतंत्र जांच की जरूरत पर जोर
याचिका में आरोप लगाया गया कि पाइपलाइन लीकेज, सीवेज का मिलना और जल गुणवत्ता मानकों को बनाए रखने में विफलता के कारण यह प्रकोप फैला। अदालत ने कहा कि तस्वीरें, मेडिकल रिपोर्ट और अधिकारियों को दी गई शिकायतें प्रथम दृष्टया ऐसे गंभीर मामले की ओर इशारा करती हैं, जिसमें स्वतंत्र और भरोसेमंद जांच अनिवार्य है।
पूर्व हाईकोर्ट जज को सौंपी जांच
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता को एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया है। आयोग इंदौर के भागीरथपुरा में पेयजल दूषण और इसके शहर के अन्य इलाकों पर पड़े प्रभाव की जांच करेगा।
आयोग यह भी पता लगाएगा कि क्या भागीरथपुरा में सप्लाई किया गया पानी दूषित था? दूषण का स्रोत और प्रकृति क्या थी? क्या इसमें सीवेज, औद्योगिक कचरा या खराब पाइपलाइन जिम्मेदार थी?
आयोग को मिलेंगी दीवानी अदालत की शक्तियां
अदालत ने कहा कि आयोग दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों की पहचान कर उनकी जिम्मेदारी तय करेगा। साथ ही यह प्रभावित नागरिकों, विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए मुआवजे के दिशा-निर्देश भी तय करेगा।
आयोग को दीवानी अदालत की शक्तियां दी गई हैं, जिसके तहत वह गवाहों और अधिकारियों को तलब कर सकेगा तथा सरकारी विभागों, अस्पतालों, प्रयोगशालाओं और नगरीय निकायों से रिकॉर्ड मंगा सकेगा।
मुआवजा बढ़ाने की मांग
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी मांग रखी गई कि दूषित पानी से जान गंवाने वालों के परिजनों को 2 लाख के बजाय 10 लाख रुपये मुआवजा दिया जाए। वहीं प्रशासन ने अदालत को बताया कि अब तक उल्टी-दस्त से हुई मौतों के 20 से अधिक पीड़ित परिवारों को 2-2 लाख रुपये की सहायता राशि दी जा चुकी है।

