
इंंदौर के दूषित पानी पर सवाल और मंत्री का जवाब ‘घंटा’, क्या यही संवेदनशीलता है?
इंदौर में दूषित पानी से मौतों के बीच मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का 'फोकट-घंटा' बयान सत्ता और संवेदनशीलता के बीच गहरी खाई उजागर करता है।
Indore Water Crisis: इंदौर देश का सबसे साफ शहर है। अगर आप वैसे शहर में रहते हों जहां साफ-सफाई की कमी तो एक पल के लिए मन जरूर करेगा कि काश मेरा शहर भी इंदौर जैसा होता। लेकिन यह शहर इस समय चर्चा में गंदे पानी की वजह से है। पिछले 15 दिनों से भागीरथपुरा कॉलोनी में रहने वाले लोग बीमार होते रहे। कुछ लोगों की मौत हो गई। जब होहल्ला मचा तो प्रशासन हरकत में आया। यूं कहें तो नींद टूटी। इन सबके बीच एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल के पत्रकार ने मंत्री कैलाश विजयवर्गीय (Kailash Vijayvargiya) से सवाल किया तो वो भड़क गए।
कैलाश विजय वर्गीय (Kailash Vijayvargiya) ने फोकट और घंटा जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। पत्रकार ने आपत्ति जताई तो उनके साथ रहने वाले भी उखड़ गए। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय चलते बने। लेकिन सवाल यह है कि जब किसी व्यवस्था पर सवाल किया जाएगा तो उसे इस तरह के शब्दों से मामले की गंभीरता को खत्म कर दिया जाएगा। सवाल यह है कि मंत्री जी को भगीरथपुर इलाके में रहने वालों से कोई खास हमदर्दी नहीं थी। यहां बता दें कि जिस इलाके के लोग पिछले 15 दिनों से दूषित पानी पी रहे थे उनकी सामाजिक और आर्थिक हैसियत शानदार नहीं है। सीधे और सरल तरीके से समझें तो वो रईस नहीं थे।
अब यहां सवाल यह है कि कैलाश विजयवर्गीय जो खुद अपने दल को दूसरों से अलग चाल-चरित्र वाला बताते हैं क्या उनका एक सवाल पर भड़कना लाजिमी था। इस गंभीर सवाल को पूछना एक मंत्री को फोकट का काम लगता है। जिन घरों से चीख-पुकार उठ रही है, जहां मातम पसरा है और जिन परिवारों ने अपने अपनों को खोया है, वह सब उन्हें “घंटा” भर का महत्व नहीं रखता। यह संवेदनहीनता इसलिए भी झलकती है क्योंकि उन्होंने खुद ऐसी पीड़ा को कभी महसूस नहीं किया।
मंत्री और उनका परिवार उस जहरीले पानी को नहीं पीता, जिसे पीकर आम लोग काल के गाल में समा रहे हैं। उनके घरों में आरओ और वाटर फिल्टर लगे हैं, शुद्ध पानी उपलब्ध है और सुरक्षा की परतें मौजूद हैं। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग खुद इस संकट से अछूते हों, तो उनसे आम जनता के दर्द को समझने की उम्मीद करना बेमानी हो जाता है।
इसी असंवेदनशील दूरी का नतीजा है कि जनहित के सवालों पर मर्यादा भरी प्रतिक्रिया देने के बजाय बेलगाम और असभ्य भाषा सुनने को मिलती है। जिन मुद्दों पर जवाबदेही और सहानुभूति होनी चाहिए, वहां तंज और उपेक्षा दिखाई देती है। यह सिर्फ शब्दों का मामला नहीं है, बल्कि सत्ता और जनता के बीच बढ़ती खाई का प्रतीक है।
जब सवाल जिंदगी और मौत से जुड़ा हो, तब सत्ता में बैठे लोगों की भाषा और व्यवहार ही उनका असली चरित्र उजागर करते हैं। इंदौर के लोगों की पीड़ा पर दिया गया यह जवाब न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि यह बताता है कि संवेदनशीलता और जिम्मेदारी किस हद तक सत्ता के गलियारों से गायब हो चुकी है।
इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में बीते 15 दिनों से डायरिया का प्रकोप है। बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़ चुके हैं और कई मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अब तक लगभग 10 लोगों की मौत की आशंका जताई जा रही है। इसके बावजूद प्रशासन और सरकार लंबे समय तक बेखबर बनी रही। एक बुजुर्ग की मौत के बाद ही सरकारी तंत्र हरकत में आया, जैसे तब जाकर भागीरथपुरा की कराह और चीखें सत्ता के कानों तक पहुंचीं।
नगर निगम, जो इस पूरे मामले में पहली और सबसे अहम जिम्मेदार संस्था है, सीधे तौर पर नगर विकास विभाग के अधीन काम करता है। इस विभाग की कमान मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के हाथ में है। इसके बावजूद न दूषित पानी की समय पर जांच हुई और न ही बीमारी को रोकने के लिए त्वरित और प्रभावी कदम उठाए गए।
विवाद बढ़ने पर मंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर माफी जरूर मांगी। उन्होंने कहा कि वे और उनकी टीम पिछले दो दिनों से बिना सोए प्रभावित इलाकों में हालात सुधारने में जुटी है और दुख की स्थिति में उनसे शब्दों की चूक हो गई। लेकिन यह सवाल बना रहता है कि क्या केवल माफी से जवाबदेही पूरी हो जाती है?
भागीरथपुरा वही इलाका है जो मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के विधानसभा क्षेत्र में शामिल है। इंदौर जब देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा हासिल करता है, तो उसका श्रेय लेने के लिए भी यही चेहरे सामने आते हैं। नगर निगम पर भी बीजेपी का ही नियंत्रण है। ऐसे में इस त्रासदी की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। जनता को अपमानजनक शब्दों से नहीं बल्कि पारदर्शी जवाब और ठोस कार्रवाई से भरोसा दिलाना होगा।

