अंतरधार्मिक लिव-इन अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया बड़ा फैसला
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अदालत ने जोर देते हुए कहा कि हर नागरिक के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है।

अंतरधार्मिक लिव-इन अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ने कहा कि मानव जीवन का अधिकार किसी नागरिक के धार्मिक विश्वास से ऊपर है। अंतरधार्मिक लिव-इन में रहने वाले जोड़े सिर्फ हिंदू और मुस्लिम नहीं, बल्कि दो व्यक्ति हैं।


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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो अलग-अलग धर्मों के जोड़ों के लिव-इन के मामले में सोमवार को एक अहम फैसला दिया है। हाईकोर्ट की लखन पीठ ने सोमवार को स्पष्ट किया कि अंतरधार्मिक (इंटरफेथ) जोड़ों का लिव-इन संबंध उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम, 2021 के तहत अपराध नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि केवल अंतरधार्मिक विवाह अपने आप में इस कानून के तहत प्रतिबंधित नहीं है।

न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी 12 याचिकाओं की संयुक्त सुनवाई के दौरान की। ये याचिकाएं सात मुस्लिम और पांच हिंदू महिलाओं द्वारा दायर की गई थीं, जिन्होंने दूसरे समुदाय के पुरुषों के साथ लिव-इन संबंध में रहने के कारण कथित धमकियों के बाद पुलिस सुरक्षा की मांग की थी।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि यदि कानून दो व्यक्तियों, यहां तक कि समान लिंग के, को शांति से साथ रहने की अनुमति देता है, तो दो बालिग विषमलैंगिक व्यक्तियों के आपसी सहमति से साथ रहने पर किसी व्यक्ति, परिवार या राज्य को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

अदालत ने जोर देते हुए कहा कि हर नागरिक के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है। पीठ ने टिप्पणी की कि मानव जीवन का अधिकार नागरिक के धार्मिक विश्वास से ऊपर है और केवल अंतरधार्मिक संबंध में रहने के आधार पर किसी को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। जाति, पंथ, लिंग या धर्म के आधार पर भेदभाव अस्वीकार्य है।

न्यायमूर्ति सिंह ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोच्च है। यह अधिकार विवाह के वैध या अवैध होने, या विवाह के अस्तित्व में होने या न होने से प्रभावित नहीं होता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह याचिकाकर्ताओं को हिंदू या मुस्लिम के रूप में नहीं, बल्कि दो बालिग व्यक्तियों के रूप में देखती है, जो अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रह रहे हैं। पीठ ने कहा कि अपनी पसंद के साथी के साथ रहने का निर्णय एक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और इसमें हस्तक्षेप अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

सुनवाई के दौरान अदालत द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी ने दलील दी कि सभी याचिकाकर्ता बालिग हैं और केवल लिव-इन संबंध में रह रहे हैं, इसलिए धर्मांतरण कानून की धाराएं उन पर लागू नहीं होतीं। उन्होंने कहा कि धर्मांतरण की औपचारिक घोषणा तभी आवश्यक है, जब कोई व्यक्ति वास्तव में अपना धर्म बदलना चाहता हो।

वहीं राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने तर्क दिया कि कानून की धारा 3 के अनुसार धर्मांतरण केवल विवाह के लिए ही नहीं, बल्कि विवाह-सदृश संबंधों के लिए भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि 2021 का अधिनियम लिव-इन जैसे संबंधों पर भी लागू हो सकता है, और याचिकाकर्ताओं ने अधिनियम की धारा 8 और 9 के तहत कोई आवेदन नहीं किया है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि ‘धर्मांतरण’ का अर्थ अपने धर्म का त्याग कर दूसरे धर्म को अपनाना है। इन मामलों में किसी भी याचिकाकर्ता ने यह दावा नहीं किया कि उसे धर्म बदलने के लिए मजबूर किया गया या ऐसा कोई प्रयास हुआ। साथ ही, इस संबंध में कोई एफआईआर या शिकायत भी दर्ज नहीं है।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 तथा 2021 के अधिनियम को देखते हुए अंतरधार्मिक लिव-इन संबंध को अपराध नहीं कहा जा सकता। चूंकि याचिकाकर्ताओं द्वारा कोई अपराध नहीं किया गया है, इसलिए उनके संरक्षण के अनुरोध को अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं है।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि यदि याचिकाकर्ताओं को किसी प्रकार की हानि पहुंचाई जाती है, तो वे पुलिस से संपर्क कर सकते हैं। साथ ही, यदि कोई उनकी इच्छा के विरुद्ध बल, प्रलोभन, दबाव, धोखे या गलत प्रस्तुति के जरिए धर्मांतरण का प्रयास करता है, तो वे संबंधित शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

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