सपा की सॉफ्ट हिंदुत्व पॉलिटिक्स’ ! क्या यूपी चुनाव से पहले प्लान- बी पर काम कर रहे हैं अखिलेश यादव?
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अखिलेश ने कई मुद्दों पर सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति का संकेत दिया है

सपा की 'सॉफ्ट हिंदुत्व पॉलिटिक्स’ ! क्या यूपी चुनाव से पहले प्लान- बी पर काम कर रहे हैं अखिलेश यादव?

मथुरा में बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन के कार्यक्रम और उसी दिन आगरा में सांसद चंद्रशेखर की जनसभा में जुटी भीड़ की तुलना से पश्चिमी यूपी की सियासत में दलित+मुस्लिम के समीकरण को लेकर चर्चा हो रही है तो वहीं अखिलेश के अविमुक्तेश्वरानंद को फ़ोन करने और बिकरू कांड की ख़ुशी दुबे की आर्थिक मदद से 'सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राजनीति के संकेत मिल रहे हैं।


SP's Soft Hindutva Politics : यूपी विधानसभा चुनाव में अभी महज़ एक साल का वक्त रह गया है।ऐसे में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने नए 'सियासी मूव’ से विपक्ष की नई राजनीति के संकेत दे रहे हैं। हाल ही में कई मौकों पर अखिलेश की 'सॉफ्ट हिंदुत्व पॉलिटिक्स’ नज़र आई है जो सपा की परम्परागत राजनीति से हटकर है।क्या अब अखिलेश पहली बार मुस्लिम वोटों को लेकर चिंतित हैं? क्या अखिलेश अपने कोर वोट बैंक रहे मुसलमान वोटों के अलावा किसी और समीकरण की रणनीति बना रहे हैं ? क्या विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव किसी Plan-B पर काम कर रहे हैं?

अखिलेश की टाइमिंग और सॉफ्ट हिंदुत्व पॉलिटिक्स, क्या है सपा की रणनीति ?

उत्तर प्रदेश में विपक्ष की राजनीति में चुनावी साल से पहले नए रोचक संकेत मिल रहे हैं।समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल के समय में कई मौकों पर जो सक्रियता दिखाई है उससे भविष्य में सपा की राजनीति को लेकर चर्चा तेज़ हो गई है।चाहे योगी सरकार के विरोध में माघ मेले ने बैठे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से फ़ोन पर बात करना हो, मणिकर्णिका घाट में निर्माण पर मुखर होकर योगी सरकार को घेरना या फिर बिकरू कांड में जेल में रही ख़ुशी दुबे की बीमार माँ की आर्थिक मदद करना, अखिलेश की 'टाइमिंग’ और 'सॉफ्ट हिंदुत्व की पॉलिटिक्स’ चर्चा का विषय है।

यही नहीं हाल ही में लखनऊ आए गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह बघेला से लेकर भुवनेश्वर में नवीन पटनायक के घर जाकर उनसे मुलाक़ात कर अखिलेश ने अपनी सक्रियता से राजनीतिक चर्चा को हवा दी है।अब चर्चा यह हो रही है कि क्या पहली बार अखिलेश अपने कोर वोट बैंक से इतर भी अपनी राजनीति को लेकर सोच रहे हैं? क्या पहली बार अखिलेश यादव सपा को मिलने वाले एकजुट मुस्लिम वोट के खिसकने का दबाव महसूस कर रहे हैं या लोकसभा चुनाव में PDA के नारे से कई जातियों को जोड़ने के प्रयोग सफल होने के बाद विधानसभा चुनाव में सॉफ्ट हिंदुत्व का प्रयोग करना चाहते हैं?

चुनाव से पहले नए जातीय समीकरणों की आहट-

दरअसल यूपी में एक तरफ़ बीजेपी से ब्राह्मणों को नाराज़गी चर्चा का विषय बनी है तो वहीं दूसरी तरफ़ कई नए सियासी समीकरणों के संकेत भी मिल रहे हैं।हाल ही में बतौर अध्यक्ष पहली बार मथुरा आए नितिन नबीन के कार्यक्रम और उसी दिन आगरा में आज़ाद समाज पार्टी चीफ सांसद चंद्रशेखर की जनसभा में जुटी भीड़ की तुलना से पश्चिमी यूपी में एक नई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।क्या पश्चिमी यूपी में दलित+मुस्लिम का समीकरण आने वाले समय में ज़्यादा स्पष्ट हो सकता है? ऐसा हुआ तो सियासी दल इसी समीकरण का सहारा लेकर अपनी सियासी ज़मीन मज़बूत कर सकते हैं।ज़ाहिर है पश्चिम यूपी में बने किसी नए सियासी समीकरण में मुस्लिम वोटों के रुख़ की ख़ास भूमिका होगी।

पहली बार मुस्लिम वोटों के बिखरने की चर्चा -

इधर बिहार चुनाव में सीमांचल और उसके बाद हुए महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव में ओवैसी की तक़रीरों और एआईएमआईएम की सफलता ने उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले ओवैसी का आत्मविश्वास बढ़ा दिया है। हालाँकि AIMIM का यूपी में कोई आधार और टीम नहीं है।साथ ही यहाँ के सियासी समीकरण भी बिहार और महाराष्ट्र से अलग हैं पर जिस तरह से ओवैसी ने अखिलेश यादव को बीएमसी के मंच से चुनौती दी और जिस तरह से उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के सत्ता में भागीदारी की मांग बीच-बीच में उठती रही है उससे अब भविष्य में मुस्लिम वोटों के खिसकने को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।ऐसे में अखिलेश के सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति की वजहों पर भी कयास लग रहे हैं।


सपा के प्लान- बी का संकेत-

देखा जाए तो 1992 में समाजवादी पार्टी के गठन के बाद से अब तक मुसलमान वोट सपा के पक्ष में एकजुट रहे हैं। मुलायम सिंह यादव ने M +Y समीकरण के ज़रिए ही यूपी में सत्ता की स्क्रिप्ट लिखी। मुलायम की राजनीति में उनके व्यक्तित्व का बड़ा रोल रहा है। मुस्लिम नेताओं के साथ उनकी केमिस्ट्री और उनके कई सियासी फैसले और सत्ता में रहने पर नीतिगत फैसलों ने भी समाजवादी पार्टी के पक्ष में मुस्लिम वोटों को साधने में अहम भूमिका निभाई है।अब कुछ मौके अपवाद के तौर पर छोड़ दिए जाएँ तो ज्यादातर चुनाव में मुसलमानों को सपा का साथ मिला है।राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अखिलेश यादव ने पीडीए( PDA) के ज़रिए एक नया कॉम्बिनेशन बनाया।इसमें ग़ैर यादव ओबीसी( OBC) और दलित को शामिल किया।चुनाव में इसका असर दिखाई पड़ा।कांग्रेस के साथ मिलकर ‘संविधान बदलने के नैरेटिव’ की वजह से दलित भी गठबंधन के साथ आए।पर 2027 विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा नहीं है।साथ ही नगीना के सांसद चंद्रशेखर जैसे नेता के लिए उमड़ रही भीड़ को भी देर तक नजरंदाज करना सियासी दृष्टि से संभव नहीं है।ऐसे में अभी दलित वोटों को लेकर भी पक्के तौर पर कुछ कह पाना संभव नहीं। तो क्या अब अखिलेश यादव नए समीकरण की तलाश कर Plan B पर अभी से काम करना चाहते हैं? सपा को मुस्लिम वोटों को एकजुट रखने की चुनौती से दो-चार होना पड़ सकता है।ख़ास तौर पर जब मुसलमानों को सिर्फ़ वोट देने के लिए इस्तेमाल करने और सत्ता में भागीदारी न देने की बात कर विपक्षी दल लगातार अखिलेश यादव पर हमला कर रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर कहते हैं ''मुलायम सिंह यादव के समय से सपा पर इस बात के आरोप लगते रहे हैं कि सपा प्रो-मुस्लिम पार्टी है और दूसरे वर्गों के बारे में नहीं सोचती।अखिलेश यादव इसी टैग को हटाने की और यह बताने को कोशिश कर रहे हैं कि सपा सभी के बारे में सोचती है और किसी के भी विरोध में नहीं है।इसी बीच बीजेपी से ब्राह्मणों की नाराज़गी की चर्चा भी है तो उसपर भी अखिलेश की नज़र है…और अगर किसी को ऐसा लगता है कि मुस्लिम वोट्स को लेकर सपा को कोई चुनौती नहीं मिल सकती तो यह ग़लत है।बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में चुनौती ज़रूर मिल सकती है।’’

बीजेपी के हिंदुत्व से मुक़ाबले के लिए सपा का सॉफ्ट हिंदुत्व-

माघ मेले में स्नान विवाद के बाद अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जब विरोध में शिविर के बाहर बैठे तो अखिलेश यादव ने फ़ोन पर उनसे बात कर हालचाल लिया।इसका वीडियो के सामने आने के बाद भी अखिलेश कई बार अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर बयान दे चुके हैं बल्कि धर्माचार्यों के सम्मान को लेकर योगी सरकार को ताकीद दे चुके हैं।वहीं बिकरू कांड में जेल में रही ख़ुशी दुबे की माँ के इलाज के लिए अखिलेश यादव ने आर्थिक मदद की।यह बात इसलिए भी अहम है क्योंकि ख़ुशी दुबे के मुद्दे को ब्राह्मणों की सुनवाई न होने से जोड़कर चर्चा होती रही है।अखिलेश यादव ने वाराणसी के मणिकर्णिका घाट में कई निर्माण को क्षतिग्रस्त किए जाए पर भी सवाल उठाया।इधर सैफ़ई में केदारनाथ की तर्ज़ पर मंदिर बनवाने पर चर्चा भी होती रही है।कहा जा रहा है कि बीजेपी के हिंदुत्व के नैरेटिव से मुकाबला करने की दिशा में यह अहम कदम है।

यूपी के बाहर भी सक्रियता-

यही नहीं अखिलेश यादव ने हाल ही में भुवनेश्वर में उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मुलाक़ात की।सपा जहाँ बीजेपी विरोध की राजनीति करती रही है और इंडिया ब्लॉक का हिस्सा है जबकि बीजेडी की राजनीति कांग्रेस और बीजेपी से समान दूरी बनाकर राजनीति करने की रही है।वहीं पिछले दिनों लखनऊ में अखिलेश यादव गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला से भी मिले थे।

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