जनकपुरी हादसा: दो छोटे प्यादे गिरफ्तार, जल बोर्ड और पुलिस के लापरवाहों का क्या?
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जनकपुरी हादसा: दो छोटे प्यादे गिरफ्तार, जल बोर्ड और पुलिस के लापरवाहों का क्या?

जनकपुरी में जल बोर्ड की लापरवाही से कमल की मौत; पुलिस ने छोटे ठेकेदार के बाद एक मजदूर को पकड़ा, मगर जल बोर्ड के बड़े अफसरों और लापरवाह पुलिसकर्मियों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं।


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Delhi Janakpuri DJB Pit Incident : देश की राजधानी दिल्ली के जनकपुरी इलाके में हुई 25 वर्षीय युवक कमल की मौत ने सरकारी सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है। सड़क के बीचोंबीच दिल्ली जल बोर्ड द्वारा खोदे गए 14 फीट गहरे गड्ढे में गिरकर एक नौजवान की जान चली गई, लेकिन असली गुनहगार अब भी कानून की पहुंच से बाहर हैं। पुलिस ने दिखावे के लिए एक छोटे सब-कॉन्ट्रैक्टर और एक मजदूर को तो गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन उन बड़े अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई जिनकी देखरेख में यह मौत का जाल बिछाया गया था। सबसे बड़ा सवाल उन पुलिसकर्मियों पर भी है जो रात भर गश्त का दावा करते हैं, लेकिन उन्हें गड्ढे में तड़पता हुआ युवक नजर नहीं आया। परिवार अपने बेटे को खो चुका है और दिल्ली सरकार केवल 'जांच' का आश्वासन दे रही है। मुआवजे के नाम पर सरकार ने अब तक चुप्पी साध रखी है, जो उसकी संवेदनहीनता को दर्शाता है।

दिल्ली की सड़कों पर सुरक्षा के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। जनकपुरी में जिस तरह से कमल की जान गई, वह केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि एक 'प्रशासनिक हत्या' है। इस मामले में पुलिस की जांच अब सवालों के घेरे में है।

छोटे कर्मचारियों पर गाज, अफसरों को छूट?
पुलिस ने इस मामले में राजेश प्रजापति (सब-कॉन्ट्रैक्टर) के बाद अब यूपी के फिरोजाबाद से योगेश (मजदूर) को पकड़ा है। आरोप है कि योगेश ने कमल को गिरते हुए देखा था।
इस तरह की गिरफ्अतारियां कर देश की स्मार्ट पुलिस ने अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली है। मगर सवाल यह है कि दिल्ली जल बोर्ड के उन अधिकारीयों पर एफआईआर क्यों नहीं हुई, जिनकी यह साइट थी? नियमों के मुताबिक, किसी भी खुदाई वाली जगह पर सुरक्षा मानकों की जांच करना अधिकारियों का काम है। क्या बड़े अफसरों को बचाने के लिए छोटे प्यादों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है?

पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल

हादसे वाली रात दिल्ली पुलिस की पेट्रोलिंग टीम कहां थी? एक युवक रात भर गड्ढे में पड़ा रहा, उसकी बाइक की हेडलाइट जल रही थी, फिर भी किसी पुलिसकर्मी की नजर उस पर नहीं पड़ी। कमल के लापता होने के बाद उसे ढूंढने में तत्परता क्यों नहीं दिखाई गई? अगर इलाके की पुलिस सक्रिय होती और समय पर तलाशी अभियान शुरू करती, तो शायद कमल की सांसें बचाई जा सकती थीं। पुलिस की यह लापरवाही अक्षम्य है।

सरकार की चुप्पी और मुआवजे का अभाव दिल्ली सरकार आमतौर पर हर मुद्दे पर मुखर रहती है, लेकिन इस दर्दनाक हादसे पर उसकी चुप्पी हैरान करने वाली है। पीड़ित परिवार का सहारा छिन गया है, वे अपने बेटे की शादी के सपने देख रहे थे, लेकिन अब उनके पास सिर्फ आंसू हैं। सरकार ने अभी तक पीड़ित परिवार के लिए किसी मुआवजे का ऐलान नहीं किया है। क्या एक आम नागरिक की जान की कोई कीमत नहीं है?

व्यवस्था की खामियां जो कमल की मौत की वजह बनीं:

अफसरों की ढिलाई: जल बोर्ड के जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक कोई एफआईआर नहीं।

पुलिस की सुस्ती: लापता युवक को खोजने में रात भर कोई गंभीर प्रयास नहीं हुए।

अंधेरे में साइट: खतरे वाली जगह पर लाइट और चेतावनी बोर्ड का न होना।

सुरक्षा ऑडिट का अभाव: बिना बैरिकेडिंग के सड़क के बीचोंबीच मौत का गड्ढा छोड़ दिया गया।

संवेदनहीन प्रशासन: मुआवजे और मदद को लेकर सरकार का उदासीन रवैया।

कमल के परिजनों का कहना है कि उन्हें इंसाफ चाहिए, न कि केवल दिखावटी गिरफ्तारियां। जब तक जल बोर्ड के बड़े अधिकारियों और लापरवाह पुलिसकर्मियों की जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक यह लड़ाई अधूरी है।
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