भारत रत्न या राजनीतिक विदाई? नीतीश को लेकर जद(यू) की सख्त लाइन
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भारत रत्न या राजनीतिक विदाई? नीतीश को लेकर जद(यू) की सख्त लाइन

जद(यू) ने नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग खारिज कर दी है। पार्टी इसे उन्हें राजनीति से हटाने की साजिश मानती है और चाहती है कि वे सक्रिय रहें।


Nitish Kumar News: नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) ने बेहद स्पष्ट शब्दों में यह संकेत दे दिया है कि वह उन्हें भारत रत्न दिए जाने की किसी भी मांग के खिलाफ है। भले ही ऐसी मांग पार्टी के भीतर से ही क्यों न उठे। पहले के मौकों पर पार्टी ने इस तरह की मांगों को नज़रअंदाज़ किया या हल्के में लिया, लेकिन अब वह सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे पर कड़ा ऐतराज़ जता रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पार्टी के भीतर नीतीश कुमार का प्रभाव कम हो रहा है? आखिर जद(यू) क्यों नहीं चाहती कि उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिले?

इसके उलट, पार्टी चाहती है कि नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने रहें और यथासंभव लंबे समय तक सक्रिय राजनीति में बने रहें। जद(यू) बिहार और केंद्र दोनों जगह भाजपा के साथ एक असहज गठबंधन में है और यह सर्वविदित है कि भगवा पार्टी जैसे ही मौका मिले, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश की जगह किसी और को बैठाने की योजना रखती है। ऐसे में भारत रत्न जैसा प्रतिष्ठित सम्मान जितना सम्मानजनक लगता हैअसल में सक्रिय राजनीति से विदाई और सेवानिवृत्ति की ओर धकेले जाने जैसा माना जाता है।

भारत रत्न की बढ़ती मांग

पिछले सप्ताह जद(यू) के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग की। उन्होंने नीतीश को समाजवादी आंदोलन का “अनमोल रत्न” बताया। हालांकि पार्टी ने तुरंत इस मांग से सार्वजनिक रूप से दूरी बना ली और इसे त्यागी का “व्यक्तिगत विचार” करार दिया। पार्टी ने फिलहाल पूर्व सांसद और पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता त्यागी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है, लेकिन उन्हें पूरी तरह अलग-थलग कर दिया गया है। इसके बाद से त्यागी भी खामोश हैं।

त्यागी पहले नेता नहीं हैं जिन्होंने यह मांग की हो। वर्ष 2024 में जद(यू) के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने भी ऐसी मांग की थी। इसके अलावा पार्टी के सक्रिय नेता छोटू सिंह और शिवहर से जद(यू) सांसद लॉवली आनंद जो पूर्व सांसद और कभी कुख्यात बाहुबली रहे आनंद मोहन की पत्नी हैं ने भी भारत रत्न की मांग की थी।

‘नीतीश अभी सक्रिय हैं’

भाजपा के अलावा एनडीए के सहयोगी दल हम (HAM) और लोजपा (रामविलास) ने भी त्यागी की मांग का समर्थन करने में देर नहीं लगाई। बिहार विधानसभा अध्यक्ष और वरिष्ठ भाजपा नेता प्रेम कुमार, हम के संस्थापक और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी, तथा लोजपा (रा) प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने सार्वजनिक रूप से नीतीश को भारत रत्न देने का समर्थन किया। लेकिन जद(यू) इससे खुश नहीं दिखी। पार्टी ने इसे नीतीश को हॉट सीट से हटाने की चाल के रूप में देखा। जद(यू) के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,“नीतीश-जी अभी सक्रिय हैं, वे सेवानिवृत्त नहीं हुए हैं कि उन्हें भारत रत्न दिया जाए। वे आगे भी राजनीति में बने रहेंगे।”

एक अन्य नेता ने कहा कि खुद नीतीश कुमार भी इस मांग से खुश नहीं हैं। उनके मुताबिक, “यह नीतीश-जी को राजनीति से किनारे करने और जबरन रिटायरमेंट की ओर धकेलने की साजिश है। लेकिन पार्टी चाहती है कि वे राजनीति में बने रहें और पार्टी का नेतृत्व करते रहें।”

नीतीश को हटाने की साजिश?

कई जद(यू) नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं ने बताया कि भाजपा लंबे समय से नीतीश को शीर्ष पद से हटाने का मौका तलाश रही है और उन्हें राजनीति से संन्यास लेने के योग्य नेता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। एक कार्यकर्ता ने कहा, “अगर भाजपा नीतीश को रिटायर करा दे, तो बिहार की सत्ता राजनीति पर उसका पूरा कब्ज़ा हो जाएगा।”

पटना के एक राजनीतिक पर्यवेक्षक का भी मानना है कि केसी त्यागी अनजाने या जानबूझकर भाजपा के एजेंडे के लिए काम कर रहे थे, और यही भांपकर पार्टी ने उन्हें हाशिये पर डाल दिया। बिहार के एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक, सोरूर अहमद, का कहना है कि जद(यू) के भीतर का एक वर्ग भाजपा के हाथों खेल रहा है, जो भारत रत्न के ज़रिये नीतीश कुमार को किनारे करना चाहती है क्योंकि यह सम्मान आमतौर पर सेवानिवृत्त नेताओं या मरणोपरांत दिया जाता है। उनके अनुसार मुख्य एजेंडा किसी तरह नीतीश को राजनीति से रिटायर कराने का है, लेकिन जद(यू) अभी इसके लिए तैयार नहीं है।

पिछले हफ्ते जद(यू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद और मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने साफ कहा कि त्यागी के बयान उनके निजी विचार हैं और पार्टी का उनसे कोई लेना-देना नहीं है। बिहार के मंत्री और जद(यू) के सबसे वरिष्ठ नेता बिजेंद्र प्रसाद यादव ने भी कहा कि यह त्यागी का व्यक्तिगत मत है, हालांकि इसमें कुछ गलत नहीं है, लेकिन वे इस पर टिप्पणी नहीं कर सकते।

मानसिक स्वास्थ्य पर सवाल

भारत रत्न की मांगों के साथ-साथ बिहार में पिछले कुछ समय से यह नैरेटिव भी जोर पकड़ रहा है कि 74 वर्षीय नीतीश कुमार का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक नहीं है। दिसंबर में एक आधिकारिक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने एक युवा मुस्लिम आयुष डॉक्टर के नकाब (हिजाब) को खींच दिया, जिससे इन अटकलों को और हवा मिली। उनके इस व्यवहार की चौतरफा आलोचना हुई और यह धारणा मजबूत हुई कि वे शासन के लिए पूरी तरह फिट नहीं हैं।

हालांकि जद(यू) नेताओं ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि नीतीश कुमार पूरी तरह स्वस्थ, फिट और सक्रिय हैं। वे नियमित रूप से परियोजनाओं का उद्घाटन करते हैं, कार्यों का निरीक्षण करते हैं और उच्चस्तरीय बैठकों की अध्यक्षता करते हैं।

असहज सत्ता समीकरण

भले ही भाजपा चाहती हो, लेकिन फिलहाल वह नीतीश कुमार को बिहार की राजनीति से पूरी तरह बाहर नहीं कर सकती। पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में जद(यू) ने 243 में से 85 सीटें जीतकर वापसी की, जबकि भाजपा को 89 सीटें मिलीं। भाजपा पहली बार सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन राजनीतिक मजबूरी के चलते उसे नीतीश को मुख्यमंत्री बने रहने देना पड़ा जो वे 2005 से हैं।

हालांकि अब भाजपा बिग ब्रदर की भूमिका में दिख रही है। इसका संकेत गृह विभाग जैसे अहम मंत्रालय और विधानसभा अध्यक्ष पद पर भाजपा का कब्ज़ा है जो नीतीश के 20 साल के शासन में पहली बार हुआ है। पहले की सरकारों में गृह विभाग नीतीश के पास रहता था भले ही स्पीकर का पद भाजपा को मिलता रहा हो।

इन दोनों पदों का भाजपा के पास जाना राज्य में बदलते सत्ता संतुलन को दर्शाता है। अब भाजपा दूसरे नंबर की भूमिका में नहीं है, जैसी वह डेढ़ दशक से अधिक समय तक रही। बिहार के एक वरिष्ठ भाजपा नेता के अनुसार, पार्टी को फ्रंट से नेतृत्व करने और सरकार चलाने का जनादेश मिला है। ऐसे में यह साफ है कि नीतीश कुमार अब भाजपा से सौदेबाज़ी की स्थिति में नहीं हैं।

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