देशद्रोह से ‘फाइन कल्चर’ तक, 2016 के बाद JNU कैसे बदला?
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देशद्रोह से ‘फाइन कल्चर’ तक, 2016 के बाद JNU कैसे बदला?

2016 के बाद JNU में असहमति का स्वर बदला है। जुर्माने, निगरानी और सख्त नियमों के बीच छात्र-शिक्षक डर और दबाव में भी विरोध की परंपरा बचाए हुए हैं।


9 फरवरी 2016 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) परिसर में आयोजित एक कार्यक्रम ने ऐसी घटनाओं की श्रृंखला शुरू की, जिसका असर आज तक विश्वविद्यालय पर दिखता है। यह कार्यक्रम 2001 संसद हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरु की फांसी की बरसी के मौके पर आयोजित किया गया था। इसके बाद टीवी बहसों में JNU को “राष्ट्रविरोधी” करार दिया गया, दिल्ली पुलिस ने तत्कालीन JNU छात्रसंघ (JNUSU) अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया और छात्रों उमर ख़ालिद व अनिर्बान भट्टाचार्य पर देशद्रोह के आरोप लगाए गए। कई अन्य छात्रों को भी पुलिस जांच का सामना करना पड़ा।

हालांकि बाद में इन तीनों को ज़मानत मिल गई और यह हाई-वोल्टेज राष्ट्रीय विवाद कानूनी पचड़े में फंसकर ठंडा पड़ गया—खासकर तब, जब देशद्रोह कानून को ही स्थगित कर दिया गया और टीवी चैनलों द्वारा दिखाए गए कथित वीडियो सबूतों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे—लेकिन इस घटना की छाया JNU पर अब भी बनी हुई है।

2002 से 2004 तक JNUSU के अध्यक्ष रहे और वर्तमान में JNU के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज़ एंड प्लानिंग में पढ़ा रहे रोहित आज़ाद कहते हैं। 2016 परिसर के लिए एक निर्णायक मोड़ था, दो वजहों से। एक, इससे छात्रों में डर पैदा हुआ, लेकिन साथ ही यह एहसास भी जगा कि वे राज्य की ताकत के खिलाफ खड़े हो सकते हैं। छात्र आंदोलन पहले जैसा कभी नहीं रहा। दूसरा, इसने JNU को आम जनता की नजरों में बदनाम कर दिया, जिससे विश्वविद्यालय की छवि को गहरा नुकसान पहुंचा।”

विरोध अब याद नहीं, रोज़मर्रा की सच्चाई

आज JNU के छात्रों के लिए 2016 कोई स्मृति नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की हकीकत बन चुका है। इसका बड़ा उदाहरण नवंबर 2023 में विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद द्वारा मंज़ूर किया गया चीफ प्रॉक्टर ऑफिस (CPO) मैनुअल है, जिसमें छात्रों के “अनुशासन और आचरण” के नियम तय किए गए हैं।

JNUSU की उपाध्यक्ष के. गोपिका बाबू के मुताबिक CPO मैनुअल लागू होने के बाद पीने के पानी, यौन उत्पीड़न या पोस्टर लगाने जैसे बुनियादी विरोध पर भी जुर्माना लगाया जा रहा है। जुर्माना भरने के बाद छात्र चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाते हैं। यह एक्टिविज़्म पर सीधा हमला है। उनका कहना है कि विरोध के लिए जगहें भी लगातार घटती गई हैं। पहले केवल प्रशासनिक भवन के 100 मीटर दायरे में प्रदर्शन प्रतिबंधित था, अब पूरा अकादमिक ब्लॉक ही प्रतिबंधित है। ढाबे भी वार्डन आवास के दायरे में आ गए हैं। यानी विरोध के लिए कोई जगह ही नहीं बची।

‘एंटी-नेशनल’ की अस्पष्ट परिभाषा

बाबू ने मैनुअल की भाषा पर भी सवाल उठाए। एंटी-नेशनल जैसे शब्दों की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। यह तय करने का अधिकार प्रॉक्टर ऑफिस को दे दिया गया है। मौजूदा राजनीतिक माहौल में सरकार की आलोचना भी राष्ट्रविरोधी ठहराई जा सकती है। CPO मैनुअल के तहत नैतिक अधमता, धार्मिक, सांप्रदायिक, जातिगत या राष्ट्रविरोधी सामग्री वाले पोस्टर और असहिष्णुता फैलाने वाली गतिविधियों” पर 10,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

‘फाइन कल्चर’ और डर का माहौल

छात्रों का दावा है कि इससे एक फाइन कल्चर विकसित हुआ है जो असहमति को अनुशासित करने के साथ-साथ राजस्व भी जुटाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक 2016 से नवंबर 2023 तक विश्वविद्यालय लगभग 30 लाख रुपये जुर्माने के रूप में वसूल चुका है। राजनीति विज्ञान के एक पीएचडी छात्र ने बताया कि अब चर्चाएं और सेमिनार भी सख्त निगरानी में हैं। पहले मेस के बाद, डिनर के बाद खुली चर्चाएं होती थीं। अब प्रशासन जगहों को मंजूरी नहीं देता। लोग डरते हैं कि कहीं जिम्मेदारी न डाल दी जाए।

कक्षाओं से लेकर सभाओं तक निगरानी

छात्रों और शिक्षकों का कहना है कि निगरानी अब सर्वव्यापी हो चुकी है। होस्टल और स्कूलों में हर जगह CCTV कैमरे लगाए गए हैं। छह-सात लोग भी कहीं जमा हों, तो रिकॉर्ड किया जाता है। शिक्षकों में भी असुरक्षा की भावना है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति केंद्र की प्रोफेसर मौशमी बसु ने बताया कि एक जेंडर सेंसिटाइजेशन वर्कशॉप के बाद उन्हें कक्षा तक बंद कर दी गई।

प्रशासनिक केंद्रीकरण के आरोप

JNUTA अध्यक्ष सूरजीत मजूमदार का आरोप है कि विश्वविद्यालय का निर्णय तंत्र पूरी तरह केंद्रीकृत हो गया है। डीन और चेयरपर्सन अब वरिष्ठता से नहीं, विवेकाधीन आधार पर नियुक्त होते हैं। फैसले विश्वविद्यालय के भीतर चर्चा से नहीं, ऊपर से थोपे जाते हैं। उन्होंने भर्ती, पदोन्नति और आवास आवंटन में भी विवेकाधीन शक्ति के दुरुपयोग का आरोप लगाया।

‘तानाशाही पूर्णता’ की ओर बढ़ता परिसर?

पूर्व JNUTA महासचिव विक्रमादित्य चौधरी का कहना है कि अकादमिक परिषद जैसी संस्थाएं खोखली हो चुकी हैं। पहले ऐसी मीटिंग्स घंटों चलती थीं। अब 8–10 मिनट में खत्म हो जाती हैं। सब कुछ ऑनलाइन और नियंत्रित है।

प्रशासन का पक्ष

इन आरोपों को खारिज करते हुए JNU की कुलपति शांति श्री धुलिपुड़ी पंडित ने कहा JNU में असहमति की पूरी जगह है, लेकिन हिंसा और तोड़फोड़ की नहीं। भारत एक जीवंत लोकतंत्र है और JNU भी।”

फिर भी बची है JNU की आत्मा

इसके बावजूद छात्र और शिक्षक मानते हैं कि JNU की असहमति की परंपरा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। हाल ही में JNUSU ने प्रशासन के आदेश को चुनौती दी, जिसके बाद विश्वविद्यालय-व्यापी हड़ताल, मशाल जुलूस और छात्र संसद का आयोजन हुआ। JNUTA ने भी कुलपति को हटाने की मांग की। जैसा कि एक पूर्व छात्र ने कहा 2016 में जो अपवाद लगा था, वह अब व्यवस्था बन गया है। फिर भी, दबाव के बावजूद JNU में असहमति अभी ज़िंदा है।

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