कर्नाटक में मूली लेकर तहसील पहुंचे किसान,दो साल बाद खुला खेत का रास्ता
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कर्नाटक में मूली लेकर तहसील पहुंचे किसान,दो साल बाद खुला खेत का रास्ता

कर्नाटक के किसान ने कथित रिश्वत मांग के विरोध में मूली भेंट कर अहिंसक प्रदर्शन किया, अगले दिन खेत तक अस्थायी सड़क बना दी गई।


करीब दो साल पहले कर्नाटक के तुमकुर ज़िले के मधुगिरी तालुक के जक्केनहल्ली गांव में रहने वाले 64 वर्षीय किसान प्रसन्ना कुमार की परेशानी शुरू हुई। अपने भाई से मतभेद के बाद उनके खेत तक जाने का रास्ता बंद हो गया।

प्रसन्ना कुमार बताते हैं, “मेरे भाई की जमीन सड़क से सटी हुई है और मेरी जमीन उसके पीछे है। सड़क तक पहुंचने के लिए मुझे उसके खेत से होकर गुजरना पड़ता था। दो साल पहले हमारे बीच मतभेद हो गए और उसके बाद मुझे अपने खेत तक जाने के लिए कोई रास्ता नहीं मिला।”

करीब 2.068 एकड़ के उनके खेत तक कोई वाहन नहीं पहुंच सकता था। खाद लाना हो या सब्जियां बाजार तक ले जानी हों, हर काम मुश्किल हो गया। हालांकि, वे ज्यादा परेशान नहीं हुए। जमीन के कागजात देखने पर उन्हें भरोसा हुआ कि रिकॉर्ड में उनके खेत तक एक संपर्क मार्ग होना चाहिए। इसी आधार पर वे मधुगिरी तहसीलदार कार्यालय पहुंचे और सरकार से रास्ता बनवाने की मांग की। लेकिन उनके अनुसार, उन्हें उदासीनता और कथित लालच का सामना करना पड़ा।

शिकायत से ‘गांधीगिरी’ तक

प्रसन्ना कुमार का कहना है कि जब उन्होंने संपर्क मार्ग की मांग की, तो तहसीलदार ने कनिष्ठ अधिकारियों को निर्देश तो दिए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। “दो महीने पहले लोकायुक्त ने क्षेत्र का दौरा कर एक महीने में रास्ता देने का निर्देश दिया था। लेकिन स्थानीय अधिकारी हर दिन नया बहाना बना रहे थे।

इसके बाद कथित रूप से रिश्वत की मांग सामने आई। प्रसन्ना कुमार ने रिश्वत देने से इनकार कर दिया और तहसीलदार कार्यालय के बाहर अहिंसक विरोध शुरू कर दिया। इसी महीने की शुरुआत में वे अपने खेत में उगाई मूली की टोकरी लेकर कार्यालय पहुंचे और माइक पर अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा, “मेरे पास पैसे नहीं हैं। मैंने अपने खेत में मूली उगाई है, चाहें तो इसे खा लीजिए।” उनका दावा है कि इसके अगले ही दिन उनके खेत तक रास्ता बना दिया गया।

प्रशासन का पक्ष

मधुगिरी तहसीलदार एच. श्रीनिवास ने रिश्वत के आरोपों को निराधार बताया। उनका कहना है कि भूमि रिकॉर्ड में प्रसन्ना कुमार के खेत तक किसी सड़क का उल्लेख नहीं था। “उनकी जमीन दर्ज सड़क से आगे है और उनके भाई ने रास्ते की कोई व्यवस्था नहीं की थी। रिकॉर्ड में आठ फीट की सड़क दिखाने का दावा किया गया, लेकिन ऐसा कोई रास्ता दर्ज नहीं था।

श्रीनिवास के अनुसार, अंततः अधिकारियों ने आसपास के किसानों, जिनमें प्रसन्ना के भाई भी शामिल थे, से बातचीत कर खेत के एक किनारे से अस्थायी मार्ग बनाने पर सहमति बनाई। विभाग ने केवल इस संपर्क मार्ग को बनाने में मदद की, कोई नई अतिरिक्त सड़क नहीं बनाई गई। उन्होंने यह भी माना कि अधिकारियों की देरी से समस्या बढ़ी। “यदि आवेदन के समय ही निरीक्षण कर लिया गया होता, तो यह स्थिति पैदा नहीं होती,”।

स्थानीय नायक बने प्रसन्ना

प्रशासनिक दावों के विपरीत, स्थानीय स्तर पर प्रसन्ना कुमार को ‘गांधीगिरी’ के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। राज्य किसान संघ के उपाध्यक्ष मुत्तप्पा कोमार का कहना है कि आज खुलेआम रिश्वत की मांग होती है और भ्रष्टाचार बढ़ गया है। उनके मुताबिक, मधुगिरी किसान का संघर्ष 1980 के दशक के किसान आंदोलन को फिर से जीवित करने की जरूरत दर्शाता है।

गौरतलब है कि प्रसन्ना का आंदोलन उस समय हुआ जब राज्य में गन्ना किसान अपनी फसल के ‘उचित मूल्य’ को लेकर विरोध कर रहे थे। इससे पहले एक चंदन उत्पादक ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा भूमि अधिग्रहण के विरोध में विधानसभा के पास पेड़ की शाखाएं काटकर प्रदर्शन किया था।

किसान आंदोलनों की पृष्ठभूमि

कर्नाटक में किसान आंदोलनों का इतिहास पुराना है। 1980 में गांधीवादी नेता एम.डी. नंजुंडास्वामी ने कर्नाटक राज्य किसान संघ की स्थापना की थी। हालांकि, प्रसन्ना कुमार को एक ऐसे आम किसान के रूप में देखा जा रहा है, जो व्यक्तिगत निराशा से उभरे और स्थानीय स्तर पर नेतृत्व का चेहरा बन गए।

बेंगलुरु ग्रामीण जिले के एक युवा किसान पी. प्रमोद का कहना है, “जिस तरह एक किसान ने अपना गुस्सा जाहिर किया, उसने कई लोगों को प्रेरित किया है। ऐसे प्रभावी संघर्ष आज की जरूरत हैं।”

हालांकि, कुछ किसान नेता उनकी पद्धति से सहमत नहीं हैं। कर्नाटक राज्य गन्ना उत्पादक संघ के अध्यक्ष कुरुबुरु शंथाकुमार का कहना है कि रिश्वत मांगने वालों को फसल भेंट करना उचित नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा आंदोलन जरूरी है।

नेतृत्व की ओर कदम

प्रसन्ना कुमार अब स्थानीय किसानों के लिए जवाबदेही की आवाज बनते जा रहे हैं। वे कहते हैं कि किसानों की जायज समस्याओं का समाधान होना चाहिए। उन्हें सालों तक दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने चाहिए। किसानों को राजनीतिक दलों से अलग एक गैर-पक्षपाती संगठन बनाना चाहिए।

वे बताते हैं कि उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी दी थी कि यदि एक सप्ताह में रास्ता नहीं दिया गया, तो वे तहसीलदार कार्यालय के सामने आत्महत्या कर लेंगे। इसके बाद एक ही दिन में रास्ता उपलब्ध करा दिया गया। हालांकि, वे यह भी स्वीकार करते हैं कि जब उन्होंने मूली भेंट की, तब वे किसी दर्शन या गांधीवादी विचारधारा के बारे में नहीं सोच रहे थे। “मेरे पास रिश्वत देने की क्षमता नहीं थी, इसलिए मैंने अपनी उगाई सब्जियां पेश कीं। मेरे विरोध को गांधीवादी नाम दूसरों ने दिया।

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