
कर्नाटक में नली-कली योजना पर संकट, क्या लौटेगा पुराना सिस्टम?
कर्नाटक सरकार 2026-27 से नली-कली गतिविधि-आधारित शिक्षण प्रणाली बंद करने की तैयारी में है। 29 हजार स्कूलों में पुरानी सिंगल-ग्रेड व्यवस्था लौटेगी।
साल 2020 में कर्नाटक के एक सरकारी स्कूल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ था। वीडियो में छात्र-छात्राएं गुणा के पहाड़े गाते और नाचते हुए सीखते दिखाई दे रहे थे। उस समय की खबरों में एक्स पर लोगों द्वारा इस शिक्षण पद्धति की जमकर सराहना किए जाने का उल्लेख था। कई यूजर्स ने लिखा कि काश उनके गणित शिक्षक भी इतने नवोन्मेषी होते।
कुछ समाचार रिपोर्टों ने इस वायरल वीडियो को कर्नाटक के सरकारी स्कूलों में कक्षा 1 से 3 तक लागू ‘नली- कली’ (Nali-Kali) यानी गतिविधि-आधारित शिक्षण प्रणाली से जोड़ा था। 1990 के दशक में शुरू की गई इस पहल का उद्देश्य शुरुआती कक्षाओं में पढ़ाई का बोझ कम करना और बच्चों के लिए शिक्षा को आनंददायक बनाना था। हालांकि अब यह कार्यक्रम इतिहास बनने की कगार पर दिखाई दे रहा है।
मैसूरु जिले के हेग्गडदेवनकोटे (एचडी कोटे) के एक स्कूल में 1995 में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया गया नली- कली कार्यक्रम 2009 में पूरे राज्य में लागू किया गया। शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इसका लक्ष्य पारंपरिक शिक्षा से जुड़े दंड और परीक्षा के भय को खत्म करना और खेल-आधारित पद्धति से पढ़ाई कराना था। बच्चों को केवल पाठ्यपुस्तक पढ़ाने के बजाय गतिविधियों के माध्यम से सिखाया जाता था। कक्षा 1 से 3 तक बहु-स्तरीय (मल्टी-ग्रेड) कक्षाएं बनाई गईं और बच्चों को छोटे समूहों में बांटा गया, ताकि सहयोग और सामाजिक कौशल विकसित हो सकें। ब्लैकबोर्ड और व्याख्यान आधारित पद्धति से हटकर चित्रकला, गीत, नृत्य और लर्निंग कार्ड्स के जरिए स्व-अध्ययन को बढ़ावा दिया गया।
छात्रों के लिए यह बदलाव ताजी हवा के झोंके जैसा था। कर्नाटक के एक सरकारी स्कूल में कक्षा 9 के छात्र एस. प्रकाश बताते हैं, “शुरुआत में मैं स्कूल नहीं जाना चाहता था, लेकिन नली- कली में पढ़ाई खेल के साथ होती थी, इसलिए धीरे-धीरे कक्षाएं अच्छी लगने लगीं। अब समझ आता है कि खेल-खेल में कितना कुछ सीख लिया।” वे कहते हैं कि इस कार्यक्रम में शिक्षक बच्चों के साथ फर्श पर बैठते थे और मित्र की तरह व्यवहार करते थे। पढ़ाई गीत, नृत्य, नाटक और चित्रकला के जरिए होती थी।
शुरुआती दौर में इस कार्यक्रम को यूनिसेफ का समर्थन मिला था। बाद में विश्व बैंक और अजीम प्रेमजी फाउंडेशन जैसी संस्थाओं ने भी सहयोग दिया। 2022 में ‘लर्निंग कर्व’ मैगजीन में प्रकाशित एक लेख में बताया गया कि नली- कली के तहत पाठ्यक्रम को छोटे-छोटे चरणों (माइलस्टोन) में बांटा गया। प्रत्येक विषय—भाषा, गणित और पर्यावरण अध्ययन—के लिए अलग माइलस्टोन बनाए गए। बच्चे गतिविधियों और अध्ययन सामग्री की सीढ़ियों के जरिए आगे बढ़ते थे।
इस पद्धति का एक उद्देश्य शिक्षकों की कमी जैसी समस्या का समाधान भी था। लेकिन विडंबना यह है कि अब शिक्षकों पर बढ़ते कार्यभार को ही इसे बंद करने का एक कारण बताया जा रहा है। शिक्षा विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, कम छात्र संख्या वाले स्कूलों में कक्षा 1 से 3 तक बच्चों को एक साथ बैठाने की व्यवस्था कारगर थी, लेकिन उत्तर कर्नाटक जैसे जिलों में अधिक छात्र संख्या के कारण एक शिक्षक के लिए सभी को संभालना मुश्किल हो जाता है। आयु और सीखने की गति में अंतर भी चुनौती बनता है।
सरकार 2026-27 शैक्षणिक सत्र से नली- कली को पूरी तरह बंद करने की योजना बना रही है। पहले चरण में 29,000 स्कूलों में इसे निलंबित किया जाएगा और ‘सिंगल-ग्रेड क्लासरूम’ प्रणाली दोबारा लागू की जाएगी, जिसमें प्रत्येक कक्षा के लिए अलग कमरा और शिक्षक होगा।
अधिकांश शिक्षकों ने इस कदम का समर्थन किया है। बेंगलुरु के पास अनेकल के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक ने कहा कि विचार अच्छा है, लेकिन क्रियान्वयन कठिन। उनके अनुसार अतिरिक्त कार्यभार के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
आलोचकों का कहना है कि नली- कली सरकारी स्कूलों में घटते नामांकन का एक कारण है। उनका तर्क है कि तीन साल तक आनंदपूर्वक सीखने वाले बच्चे कक्षा 4 में अचानक परीक्षा और मोटी किताबों के दबाव से जूझने लगते हैं। सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक टी. रविकुमार के अनुसार, यह प्रणाली की खामी नहीं, बल्कि दो अलग शिक्षण प्रणालियों के बीच सेतु की कमी है।
राज्य प्राथमिक स्कूल शिक्षक संघ के अध्यक्ष चंद्रशेखर नुग्गली का दावा है कि पिछले सात वर्षों से इस कार्यक्रम को बंद करने की मांग उठती रही है। कुछ अभिभावक भी खेल के बजाय अकादमिक दबाव को प्राथमिकता दे रहे हैं। निजी क्षेत्र के कर्मचारी नीलकंठ का कहना है कि उनके बेटे को नली- कली में शुरुआत में मजा आया, लेकिन बाद में पढ़ाई पर ध्यान कम हो गया, इसलिए उसे निजी स्कूल में दाखिला दिलाया गया।
दूसरी ओर, कन्नड़ विकास प्राधिकरण (केडीए) ने नली- कली को बंद करने के फैसले का विरोध किया है। उसने सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कार्यक्रम की विफलता का कारण क्रियान्वयन में कमियां हैं, न कि अवधारणा। रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षकों को प्रत्येक बच्चे की सीखने की शैली पहचाननी चाहिए और उसी अनुरूप पद्धति अपनानी चाहिए।
केडीए अध्यक्ष पुरुषोत्तम बिलिमाले के अनुसार, 80 मिनट की कक्षा को चरणबद्ध तरीके से संचालित किया जाना चाहिए पहले 10 मिनट सामूहिक गतिविधि, अगले 10 मिनट सीखने के स्तर की पहचान, फिर 10 मिनट शिक्षक का मार्गदर्शन, उसके बाद 40 मिनट निर्देशित अध्ययन और अंत में 10 मिनट मूल्यांकन। यह पूरी प्रक्रिया छात्र-केंद्रित है, लेकिन इसके लिए शिक्षक की सतर्कता जरूरी है।
मनोचिकित्सक और काउंसलर डॉ. एच.के. कल्पना नवीन भी नली- कली के समर्थन में हैं। उनके अनुसार यह बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए बेहद लाभकारी है। खेल और पढ़ाई के संयोजन से सीखने में रुचि बढ़ती है, और प्रत्येक बच्चा अपनी गति से आगे बढ़ सकता है।
अब संभावना है कि कर्नाटक के सरकारी स्कूलों की कक्षा 1 से 3 के बच्चों के लिए सीखने का यह आनंदमय तरीका समाप्त हो जाए और उसकी जगह पारंपरिक परीक्षा-केंद्रित दबाव ले ले जो देश की शिक्षा व्यवस्था की पहचान बन चुका है।

