कर्नाटक में सीएम बनाम डिप्टी सीएम, कांग्रेस हाई कमान के सामने कठिन परीक्षा
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कर्नाटक में सीएम बनाम डिप्टी सीएम, कांग्रेस हाई कमान के सामने कठिन परीक्षा

कर्नाटक में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच सत्ता संघर्ष गहराया। ढाई-ढाई फॉर्मूले पर विवाद बढ़ा। कांग्रेस हाई कमान पर समाधान का दबाव, 2028 की राह मुश्किल है।


कर्नाटक का मतदाता बेहद सख्त माना जाता है। राज्य की राजनीतिक परंपरा बताती है कि यहां की जनता किसी भी ऐसी सरकार को दोबारा मौका नहीं देती जो आपसी कलह में उलझ जाए। अतीत में कांग्रेस, बीजेपी और जनता दल—तीनों इसी गलती की कीमत चुका चुके हैं।लेकिन आज फिर वही स्थिति बनती दिख रही है, जहां राज्य की कांग्रेस सरकार के दो शीर्ष चेहरे अपने ही संघर्ष से खुद को और पार्टी को शर्मिंदा कर रहे हैं।

फिलहाल सिद्धारमैया मुख्यमंत्री हैं और डीके शिवकुमार उनके डिप्टी। लेकिन 2028 में जब कांग्रेस जनता के बीच जाएगी (यदि सरकार तब तक टिकती है), यह सवाल सबसे बड़ा होगा—क्या ये दोनों नेता मतदाता को फिर से कांग्रेस चुनने के लिए राज़ी कर पाएंगे?

वास्तविक सवाल यह नहीं है कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा—सिद्धारमैया या शिवकुमार। असली 100 करोड़ रुपए का प्रश्न यह है कि दिल्ली का कांग्रेस हाई कमान इस संघर्ष का समाधान कैसे करेगा? अगर सिद्धारमैया पूरे कार्यकाल सीएम रहते हैं तो शिवकुमार असंतुष्ट होंगे। और यदि सिद्धारमैया को हटाकर शिवकुमार को सीएम बनाया जाता है, तो सिद्धारमैया का रोष भी विस्फोटक हो सकता है।

संकट के बीज: मई 2023 से शुरू हुई थी कहानी

मई 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 135 सीटों के साथ शानदार जीत मिली। लेकिन जीत के तुरंत बाद ही मुश्किलें शुरू हो गईं।सिद्धारमैया (सिद्धू) और डीके शिवकुमार (डीके) दोनों ने खुद को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार बताया।चुनाव से पहले दोनों नेताओं ने अपने पुराने मतभेद दबाकर एक मजबूत एकता का प्रदर्शन किया था।

सिद्धारमैया बड़े जनाधार वाले नेता हैं, पार्टी के भीतर लोकप्रिय हैं और “5 गारंटी” जैसी योजनाओं की सोच के भी प्रमुख शिल्पकार थे।शिवकुमार संगठनकर्ता और रणनीतिक नेतृत्व के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने चुनाव से तीन साल पहले ही बूथ स्तर तक कांग्रेस को फिर से खड़ा किया।उन्होंने 136 सीटों का दावा भी किया था—जो लगभग सही साबित हुआ।लेकिन चुनावी जीत के बाद दोनों नेता सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी की ओर भाग पड़े।

पावर-शेयरिंग का समझौता और हाई कमान की चूक

करीब एक सप्ताह चले गतिरोध के बाद अचानक शिवकुमार शांत हो गए और सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बन गए।तब सवाल उठा—आखिर शिवकुमार क्यों मान गए?बाद में पार्टी के भीतर से यह बात सामने आई कि दोनों के बीच 2.5–2.5 वर्ष का अनौपचारिक पावर-शेयरिंग समझौता हुआ था।यानी सिद्धारमैया पहले ढाई साल के लिए सीएम और उसके बाद शिवकुमार। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने इस कथित समझौते को कभी सार्वजनिक नहीं किया।यहीं सबसे बड़ी गलती हुई।

आज शिवकुमार के समर्थक लगातार “दिए गए वचन” की बात कर रहे हैं, जबकि सिद्धारमैया कहते हैं कि उन्होंने सिर्फ जनता से स्थिर सरकार और 5 गारंटियों को पूरा करने का वादा किया है—किसी आधे कार्यकाल वाले सौदे का नहीं।

खड़गे, जिन्हें 2023 में समाधान कराने का श्रेय मिला था, अब इस गड़बड़ी के लिए भी उतने ही जिम्मेदार माने जा रहे हैं—क्योंकि उन्होंने तब समाधान को लिखित या औपचारिक रूप नहीं दिया।और अब वही मुद्दा वापस सामने खड़ा है।

हाई कमान कौन?—सिर्फ सोनिया गांधी हल निकाल सकती हैं

कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे कहते हैं—“हाई कमान इस विवाद को सुलझा देगा।” लेकिन हाई कमान कौन?—स्पष्ट है, गांधी परिवार।2023 में भी अंतिम फैसला सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने किया था और आज स्थिति इतनी गंभीर है कि इसे हल करने की क्षमता शायद केवल सोनिया गांधी के पास है।

सिद्धारमैया का सोनिया पर भरोसा

2013 के चुनाव से पहले सिद्धारमैया को कांग्रेस में "बाहरी" माना जाता था, क्योंकि वे 2006 में जनता दल छोड़कर आए थे।पार्टी के भीतर विरोध था, लेकिन सोनिया गांधी ने स्वयं आश्वासन दिया था कि जीत होने पर वे ही मुख्यमंत्री बनेंगे—और उन्होंने अपना वादा निभाया।

शिवकुमार का सोनिया के प्रति भावनात्मक जुड़ाव

2019 में ईडी द्वारा गिरफ्तार कर तिहाड़ भेजे गए शिवकुमार से सोनिया गांधी व्यक्तिगत रूप से मिलने जेल गई थीं।2023 की जीत के बाद शिवकुमार भावुक होकर बोले “मैं कैसे भूल सकता हूं कि सोनिया गांधी मुझे जेल में मिलने आई थीं…”इसीलिए माना जा रहा है कि विवाद को शांत करना उनके अलावा शायद किसी के बस की बात नहीं।

बीते वर्षों की कड़वाहट और बढ़ता अविश्वास

सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के रिश्तों में तनाव नया नहीं है।

2019 का आरोप

जब कांग्रेस–जेडीएस गठबंधन सरकार गिरी थी, तब पार्टी के भीतर आरोप लगे कि यह सब सिद्धारमैया गुट की रणनीति थी—क्योंकि वे कुमारस्वामी के साथ काम नहीं करना चाहते थे।

2023–24 का MUDA विवाद

सिद्धारमैया के परिवार पर मैसूर विकास प्राधिकरण (MUDA) की जमीन आवंटन में अनियमितताओं का आरोप लगा। बाद में जांच में वे निर्दोष पाए गए।कहा गया कि यह मामला डीके शिवकुमार समर्थकों द्वारा हवा दी गई थी—यह दिखाने के लिए कि वे भी सिद्धारमैया पर दबाव डाल सकते हैं।दोनों मामलों में कोई ठोस सबूत नहीं मिला, लेकिन ‘राजनीति में धुआं बिना आग के नहीं उठता’ वाली कहावत यहां फिट बैठती है।

कांग्रेस की सबसे कठिन परीक्षा

कर्नाटक में आज स्थिति बेहद संवेदनशील है।एक छोटी सी गलती भी पार्टी को भारी कीमत चुकवा सकती है या तो सरकार बीच कार्यकाल में गिर सकती है या 2028 में जनता पूरी तरह कांग्रेस को खारिज कर सकती है। अगले कुछ दिन तय करेंगे क्या कांग्रेस इस सरकार को संभाल पाएगी या कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर नई करवट लेगी?

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