
काजीरंगा बना जैव विविधता का अनोखा संसार, गैंडे से ‘मेसेका’ तक
काजीरंगा नेशनल पार्क में 57 मछलीमार बिल्लियों की पहचान की गई है। यह पार्क भारत में मीठे पानी के लिए अहम जगह है।
असम का काजीरंगा नेशनल पार्क (Kaziranga National Park) जो गोलाघाट, सोनितपुर, बिस्वनाथ और नागांव जिलों में लगभग 1,000 वर्ग किलोमीटर में फैला एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, दुनिया भर में एक-सींग वाले भारतीय गैंडे की विशाल आबादी के लिए प्रसिद्ध है। यहां विश्व में बचे ऐसे गैंडों की लगभग दो-तिहाई संख्या पाई जाती है। ताजा गणना के अनुसार 2,600 से अधिक। वर्ष 2006 में इसे टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। यहां बंगाल टाइगर, बारहसिंगा, हाथी और एशियाई जंगली भैंसों की भी सशक्त आबादी है, जिससे यह पृथ्वी के सबसे सघन वन्यजीव आवासों में शामिल है।
ब्रहमपुत्र नदी की वार्षिक बाढ़ से पोषित इसका गतिशील बाढ़मैदान पारिस्थितिकी तंत्र मिट्टी को पुनर्जीवित करता है और ‘बील’ (आर्द्रभूमि) व घासभूमि का जाल रचता है। यही प्राकृतिक प्रक्रिया इस क्षेत्र को जीवन की प्रचुरता का केंद्र बनाती है। एक नए वैज्ञानिक आकलन के अनुसार, काजीरंगा भारत में मछलीमार बिल्ली (Fishing Cat – Prionailurus viverrinus) के लिए भी सबसे महत्वपूर्ण मीठे पानी के आश्रयों में से एक है। यह आर्द्रभूमि शिकारी अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में ‘संकटग्रस्त’ (Vulnerable) श्रेणी में सूचीबद्ध है और भारत के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-1 के तहत संरक्षित है।
पहली संगठित गणना
काजीरंगा के भीतर इस प्रजाति का पहला व्यवस्थित सर्वेक्षण टाइगर रिजर्व के 450 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में 57 अलग-अलग मछलीमार बिल्लियों की पहचान करता है, जिन्हें असमिया में ‘मेसेका’ कहा जाता है। यह अध्ययन काजीरंगा टाइगर रिजर्व के टाइगर सेल ने ‘फिशिंग कैट प्रोजेक्ट’ के सहयोग से किया। इसमें अखिल भारतीय बाघ आकलन अभ्यासों के दौरान एकत्र कैमरा-ट्रैप डेटा का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट 22 फरवरी फिशिंग कैट डे को जारी की गई, जिसके साथ स्थानीय समुदायों, छात्रों और संरक्षण विशेषज्ञों की भागीदारी वाले जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित हुए।
जंगल का ‘भूत’
हाल के दशकों में आवास विनाश के कारण वैश्विक स्तर पर मछलीमार बिल्लियों की संख्या लगभग 30% घट चुकी है। आर्द्रभूमियां, जो इनके जीवन का आधार हैं, तेजी से समाप्त हो रही हैं—एशिया की 50% से अधिक आर्द्रभूमि कृषि, शहरीकरण और प्रदूषण की भेंट चढ़ चुकी हैं। फर, बुशमीट और पालतू पशुओं के लिए खतरे की धारणा के कारण शिकार, फंदे और जहर से भी इनकी मौतें होती हैं। वियतनाम और जावा जैसे क्षेत्रों में यह प्रजाति लगभग विलुप्त मानी जा रही है, जबकि दक्षिण एशिया अब इसकी वैश्विक आबादी का मुख्य केंद्र बन गया है।
हालांकि CITES परिशिष्ट-II और विभिन्न राष्ट्रीय कानूनों के तहत संरक्षण के प्रयास जारी हैं, फिर भी गिरावट को पूरी तरह रोक पाना चुनौतीपूर्ण रहा है। समुदाय-आधारित पहलें, जैसे मैंग्रोव पुनरोपण और एंटी-पोचिंग गश्त, अब प्रभावी साबित हो रही हैं। अपने पारिस्थितिक क्षेत्र में शीर्ष शिकारी के रूप में मछलीमार बिल्ली की उपस्थिति एक संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत देती है, जहां स्वच्छ जल और पर्याप्त शिकार जीव-जंतुओं की पूरी श्रृंखला को सहारा देते हैं।
पानी में जीने की अनोखी क्षमता
आंशिक रूप से जालीदार पंजे, ठोस शरीर, जलरोधी घना फर और छोटी मांसल पूंछ जो पतवार की तरह काम करती है। मछलीमार बिल्ली को जलजीवन के लिए विशिष्ट रूप से अनुकूल बनाते हैं। यह नदियों और दलदलों में सिर के बल गोता लगाकर मछलियां, केकड़े और यहां तक कि सांप तक पकड़ लेती है। अधिकांश बिल्लियों के विपरीत, यह पानी से नहीं कतराती; लंबी दूरी तक तैर सकती है और पूरी तरह डूबकर शिकार कर सकती है। वयस्क का वजन 14 किलोग्राम तक हो सकता है। जैतूनी-धूसर फर पर गहरे धब्बे और धारियां इसे सरकंडों के बीच बेहतरीन छद्मावरण देती हैं। इसकी रात्रिचर और गुप्त जीवनशैली इसे जंगल का ‘भूत’ बना देती है।
57 की संख्या शायद कम आकलन
काजीरंगा टाइगर रिजर्व की निदेशक सोनाली घोष के अनुसार, यह खोज ब्रह्मपुत्र बाढ़मैदान में इस आर्द्रभूमि विशेषज्ञ के लिए काजीरंगा को एक महत्वपूर्ण ‘आर्क’ (सुरक्षित आश्रय) के रूप में स्थापित करती है। फिशिंग कैट प्रोजेक्ट की सह-संस्थापक तियासा अध्या ने कहा कि यह अध्ययन बाढ़मैदान की गतिशीलता की निगरानी के लिए आधाररेखा तैयार करता है।
अध्ययन में 2x2 किमी के 856 ग्रिड सेल में सिंगल-सीजन ऑक्यूपेंसी मॉडलिंग का उपयोग किया गया। शोधकर्ताओं ने दो मुख्य प्रश्नों के उत्तर तलाशे। क्या काजीरंगा में मछलीमार बिल्ली दुर्लभ है या सामान्य? और उपलब्ध डेटा से कितने व्यक्तियों की स्पष्ट पहचान संभव है? परिणाम 57 अलग-अलग व्यक्तियों की पहचान—संभवतः वास्तविक संख्या से कम है, क्योंकि कैमरा-ट्रैप ग्रिड बाघों के लिए बनाए गए थे, छोटे मांसाहारियों के लिए नहीं।
भविष्य की निगरानी का आधार
राष्ट्रीय स्तर पर मछलीमार बिल्लियां निम्नभूमि नदी घाटियों और मुहाना क्षेत्रों से जुड़ी हैं। सुंदरबन टाइगर रिजर्व, ओडिशा की चिलिका झील और भीतarkanika में भी इनकी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की गई है। मीठे पानी के परिदृश्यों में संख्या आमतौर पर कम होती है, लेकिन 2026 में 57 व्यक्तियों का दस्तावेजीकरण काजीरंगा को भारत के प्रमुख मीठे पानी के गढ़ों में स्थापित करता है।
अध्ययन में 25 स्थलों पर 12 पुनः पहचान दर्ज की गईं, जिनमें कुछ बिल्लियों ने 20 किमी से अधिक दूरी तय की। यह दर्शाता है कि वे कई आर्द्रभूमि पैच का उपयोग करती हैं। बाढ़ के दौरान ये ऊंचे भूभाग या वुडलैंड क्षेत्रों में शरण लेती हैं और जल घटने पर फिर दलदलों में लौट आती हैं।
ब्रह्मपुत्र बाढ़मैदान के बाहर तटबंध निर्माण, रेत खनन, बुनियादी ढांचे का विस्तार और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न अनिश्चित बाढ़ पैटर्न जैसे खतरे बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आर्द्रभूमि मांसाहारियों की निगरानी जलवायु परिवर्तन और नदी प्रबंधन के संदर्भ में अत्यंत आवश्यक है।
मछलीमार बिल्लियों की उल्लेखनीय उपस्थिति इस बात का संकेत है कि काजीरंगा की आर्द्रभूमियां अभी भी काफी हद तक सुरक्षित और उत्पादक हैं। लेकिन यदि दीर्घकाल में जलविज्ञान में बदलाव हुआ, तो आवास की उपयुक्तता प्रभावित हो सकती है। 2026 में तैयार की गई यह आधाररेखा भविष्य की निगरानी के लिए संदर्भ बिंदु प्रदान करती है।
असम में नदी प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण पर बहस के बीच यह आकलन एक व्यापक पारिस्थितिक सच्चाई को उजागर करता है। बाढ़ मैदान स्वस्थ आर्द्रभूमियों पर निर्भर प्रजातियों को जीवित रखते हैं। काजीरंगा की ‘मछली पकड़ने वाली बिल्लियों’ का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि ये आर्द्रभूमियां कितने समय तक सुरक्षित रह पाती हैं।

