RRTS बनाम श्रीधरन मॉडल, केरल की हाई-स्पीड रेल पर नई सियासी लड़ाई
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RRTS बनाम श्रीधरन मॉडल, केरल की हाई-स्पीड रेल पर नई सियासी लड़ाई

केरल बजट में RRTS प्रस्ताव से हाई-स्पीड रेल बहस तेज हुई है। राज्य मॉडल और ई. श्रीधरन के केंद्र समर्थित प्रस्ताव के बीच नियंत्रण और राजनीति का टकराव उभरा है।


केरल सरकार के ताज़ा बजट प्रस्ताव ने राज्य में हाई-स्पीड रेल कनेक्टिविटी को लेकर लंबे समय से चल रही बहस के केंद्र में रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) को औपचारिक रूप से ला खड़ा किया है। बजट में सरकार ने स्वीकार किया है कि तिरुवनंतपुरम से कासरगोड तक उत्तर-दक्षिण तेज़ परिवहन कॉरिडोर अपरिहार्य है और अब राज्य इस तरह की व्यवस्था को चार चरणों में लागू करने की परिकल्पना कर रहा है। यह मॉडल दिल्ली–मेरठ RRTS कॉरिडोर से प्रेरित होगा।

उत्तर–दक्षिण कनेक्टिविटी पर ज़ोर

वित्त मंत्री के.एन. बालगोपाल ने बजट भाषण में कहा कि इस योजना के लिए केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने समर्थन देने की पेशकश की है। प्रस्तावित परियोजना को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा। तिरुवनंतपुरम से त्रिशूर, त्रिशूर से कोझिकोड, कोझिकोड से कन्नूर और कन्नूर से कासरगोड तक।

उन्होंने बताया कि यह प्रणाली मुख्य रूप से एलिवेटेड पिलर्स पर चलेगी और इसे मौजूदा व भविष्य की शहरी मेट्रो परियोजनाओं के साथ एकीकृत किया जा सकेगा। इसका उद्देश्य राज्य में तेज़, भरोसेमंद और आपस में जुड़ी हुई शहरी परिवहन व्यवस्था तैयार करना है।

राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय में ऐलान

यह बजट घोषणा ऐसे समय पर आई है, जब ‘मेट्रो मैन’ के नाम से मशहूर ई. श्रीधरन केंद्र सरकार के समर्थन से एक समानांतर हाई-स्पीड रेल प्रस्ताव को आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि दोनों योजनाएं केरल की सीमित उत्तर-दक्षिण कनेक्टिविटी की समस्या को संबोधित करती हैं, लेकिन इनके बीच संस्थागत नियंत्रण, राजनीतिक संकेत और सार्वजनिक मंच पर आने के तरीके को लेकर बड़ा अंतर है।

बजट में पेश RRTS प्रस्ताव

बजट और बाद की आधिकारिक ब्रीफिंग में RRTS को स्पष्ट रूप से राज्य सरकार की पहल के रूप में पेश किया गया है, भले ही इसमें केंद्र की सहायता को स्वीकार किया गया हो। यह योजना नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) में लागू RRTS मॉडल पर आधारित है, जहां पारंपरिक रेल की तुलना में अधिक गति, उच्च फ्रीक्वेंसी और एक्सप्रेस कॉरिडोर की तुलना में कम दूरी पर स्टेशन होते हैं।

इस प्रस्ताव में चरणबद्ध क्रियान्वयन, शहरी एकीकरण और तिरुवनंतपुरम, कोच्चि और कोझिकोड जैसे शहरों की मेट्रो प्रणालियों के साथ तकनीकी संगतता पर ज़ोर दिया गया है।

विधानसभा की मंजूरी से राज्य का दावा

बजट दस्तावेज़ में RRTS को शामिल कर और उसे विधानसभा से मंजूरी दिलवाकर राज्य सरकार ने इस परियोजना पर प्रक्रियागत स्वामित्व (प्रोसीजरल ओनरशिप) का दावा किया है। यह उस वैकल्पिक हाई-स्पीड रेल प्रस्ताव से अलग है, जो मुख्य रूप से ई. श्रीधरन के सार्वजनिक बयानों और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) द्वारा डीपीआर तैयार किए जाने की खबरों के ज़रिए सामने आया है।

श्रीधरन का प्रस्ताव

ई. श्रीधरन के अनुसार, उनके प्रस्तावित कॉरिडोर में हर 20 से 25 किलोमीटर पर स्टेशन होंगे, ट्रेनें हर पांच मिनट में चलेंगी और उनकी अधिकतम गति 200 किलोमीटर प्रति घंटा होगी। उनका दावा है कि यह परियोजना केरल की परिवहन चुनौतियों को कम करेगी और सड़क परिवहन पर निर्भरता घटाएगी, खासकर ऐसे राज्य में जहां सड़क दुर्घटनाओं की दर अधिक है।

उन्होंने यह भी कहा कि यह परियोजना रद्द हो चुकी सिल्वरलाइन परियोजना से अलग होगी। उनके अनुसार, इसमें भूमि अधिग्रहण सिल्वरलाइन की तुलना में लगभग एक-तिहाई होगा, जबकि 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा एलिवेटेड और कुछ हिस्से भूमिगत होंगे।

केंद्र की औपचारिक मंजूरी का अभाव

हालांकि, RRTS के विपरीत श्रीधरन की योजना को अभी तक केंद्र सरकार की औपचारिक घोषणा नहीं मिली है। न तो कोई कैबिनेट फैसला सामने आया है, न ही आधिकारिक प्रोजेक्ट नोट, और न ही फंडिंग स्ट्रक्चर या स्वामित्व मॉडल को लेकर कोई अधिसूचना जारी हुई है। यही अस्पष्टता अब अपने आप में एक राजनीतिक मुद्दा बन गई है, खासकर इसलिए क्योंकि LDF सरकार की पहले की अर्ध-हाई-स्पीड रेल परियोजना सिल्वरलाइन को केंद्र ने मंजूरी देने से इनकार कर दिया था।

रेल राजनीति और नियंत्रण का सवाल

राज्य सरकार को आशंका है कि कहीं ऐसा न हो कि केंद्र समर्थित कोई परियोजना किसी हाई-प्रोफाइल तकनीकी विशेषज्ञ के ज़रिए अनौपचारिक रूप से आगे बढ़ाई जाए और निर्वाचित राज्य सरकार को दरकिनार कर दिया जाए। गौरतलब है कि ई. श्रीधरन ने पिछला विधानसभा चुनाव भाजपा के टिकट पर लड़ा था और हार गए थे।

यह असहजता मंत्रियों के बयानों में भी झलकती है, जिन्होंने कहा है कि कथित तैयारी के बावजूद उन्हें नई परियोजना को लेकर केंद्र से कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है।

थॉमस आइजैक की टिप्पणी

पूर्व वित्त मंत्री थॉमस आइजैक ने इस मुद्दे को गति नहीं, बल्कि नियंत्रण का सवाल बताया। उन्होंने कहा, “एक बड़ा अंतर यह है कि नई परियोजना केंद्र सरकार के नियंत्रण में होगी, जबकि के-रेल केरल के नियंत्रण में थी। के-रेल में केरल की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत और रेलवे की 49 प्रतिशत थी। नई योजना कोंकण रेलवे मॉडल पर आधारित बताई जा रही है, जिसमें केंद्र की 51 प्रतिशत और केरल की 49 प्रतिशत हिस्सेदारी होगी। इसका मतलब है कि कंपनी का नियंत्रण केंद्र के पास होगा।”

आइजैक ने केंद्र की मंशा पर भी सवाल उठाए। उन्होंने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि यह स्पष्ट नहीं है कि परियोजना वास्तव में किस मॉडल पर चलेगी—क्या यह पीपीपी होगी, क्या निजी कंपनियों की हिस्सेदारी होगी, और क्या केंद्र का खर्च राज्य के लिए कर्ज में बदल दिया जाएगा, जैसा कि विझिंजम परियोजना में हुआ। उन्होंने कहा कि जब तक केंद्र की ओर से आधिकारिक प्रस्ताव नहीं आता, केवल श्रीधरन के बयानों के आधार पर प्रतिक्रिया देना ठीक नहीं है।

मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का पक्ष

मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने शुक्रवार (30 जनवरी) को कहा कि हाई-स्पीड रेल पर केंद्र से बार-बार जवाब न मिलने के बाद राज्य कैबिनेट ने RRTS को मंजूरी दी। लोका केरल सभा के उद्घाटन सत्र में उन्होंने बताया कि राज्य ने पहले भी कई प्रस्ताव केंद्र को भेजे थे, जिनमें ई. श्रीधरन और पूर्व केंद्रीय मंत्री के.वी. थॉमस के साथ चर्चा किया गया प्रस्ताव भी शामिल था, लेकिन रेल मंत्रालय की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं मिली।

मुख्यमंत्री के अनुसार, इसके बाद राज्य ने आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय से संपर्क किया, जहां संकेत दिया गया कि यदि RRTS का प्रस्ताव औपचारिक रूप से भेजा गया तो उसे समर्थन मिलेगा। इसी आश्वासन के बाद RRTS को कैबिनेट के सामने रखा गया और बजट में शामिल किया गया।

विजयन ने कहा कि यह फैसला सभी विकल्पों पर विचार करने के बाद लिया गया है और राज्य सरकार केंद्र की ओर से आने वाले किसी भी वैकल्पिक प्रस्ताव को देखने के लिए तैयार है, बशर्ते वह आधिकारिक रूप से सामने आए।

समानांतर प्रस्ताव और दोहरे मापदंड

RRTS को बजट में शामिल किए जाने और श्रीधरन के प्रस्ताव के बीच का अंतर केरल की रेल राजनीति में गहरे टकराव को दर्शाता है। सिल्वरलाइन परियोजना को, व्यापक शोध, LiDAR सर्वे, पर्यावरणीय आकलन और अंतरराष्ट्रीय परामर्शदाताओं द्वारा तैयार डीपीआर के बावजूद, तकनीकी और वित्तीय कारणों से खारिज कर दिया गया था।

इसके विपरीत, बिना डीपीआर और औपचारिक मंजूरी के नई योजना को उन्हीं राजनीतिक हलकों से अपेक्षाकृत सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। वहीं, केंद्र सरकार की चुप्पी इस मुद्दे पर राजनीतिक तापमान को और बढ़ा रही है।

RRTS पर श्रीधरन की आपत्ति

मुख्यमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ई. श्रीधरन ने कहा कि RRTS को केंद्र से मंजूरी मिलना कठिन होगा। उन्होंने तिरुवनंतपुरम–कोल्लम जैसे छोटे RRTS कॉरिडोर को मौजूदा नीति ढांचे में अधिक व्यावहारिक बताया। उन्होंने पूरे RRTS प्रस्ताव को “अव्यवहारिक” करार देते हुए इसे LDF सरकार का चुनावी स्टंट बताया।

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