केरल में जब नहरें थीं व्यापार की जीवनरेखा, अब बनीं ट्रैफिक का विकल्प
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केरल में जब नहरें थीं व्यापार की जीवनरेखा, अब बनीं ट्रैफिक का विकल्प

करीब 100 साल के पीके मोइदुन्निकुट्टी के अनुभवों के बीच केरल में अक्कुलम–चेट्टुवा जलमार्ग के पुनर्जीवन से परिवहन और पर्यटन को नई दिशा मिली है।


पीके मोइदुन्निकुट्टी, जो केरल के त्रिशूर जिले के अकालाड के मूल निवासी हैं, अब लगभग 100 वर्ष के हो चुके हैं। वह इस समय अपने बेटे के परिवार के साथ कोच्चि में रहते हैं। उम्र ने उन्हें बिस्तर तक सीमित कर दिया है। उनके बेटे द्वारा मलेशिया से लाया गया एक श्वसन उपकरण उन्हें सांस लेने में मदद करता है। उनकी याददाश्त कमजोर हो चुकी है—लंबे अंधेरे अंतराल आते हैं और फिर कुछ क्षणों के लिए स्मृतियां साफ हो उठती हैं। इन्हीं स्पष्ट क्षणों में वे अपने नाविक जीवन की कहानियां सुनाते हैं।

नाविक के सुनहरे दिन

1960 और 1970 के दशक के उत्तरार्ध में मोइदुन्निकुट्टी उन कई मालवाहक नाव संचालकों में शामिल थे, जो केरल की अंतर्देशीय जलमार्गों के जरिए पोनानी और कोच्चि के बीच सामान ढोते थे। वे ‘पोल बोट’ पर काम करते थे और लंबी डंडियों व चप्पुओं की मदद से नावों को नहरों में आगे बढ़ाते थे। उस समय केरल की नहरें एक प्रमुख व्यापारिक मार्ग थीं।

ब्रिटिश प्रशासन के दौरान 19वीं सदी में बनी कनौली नहर (Canolly Canal) ने उत्तर केरल के बैकवॉटर क्षेत्रों को जोड़ा और कोझिकोड से कोच्चि के बीच अंतर्देशीय माल परिवहन को आसान बनाया। इस मार्ग से चावल, नारियल, कोयर और अन्य थोक वस्तुएं ढोई जाती थीं। मोइदुन्निकुट्टी को वह दौर राज्य की अंतर्देशीय नौवहन व्यवस्था का व्यस्त और सुनहरा समय याद आता है।

वे बताते हैं, “शुरुआती वर्षों में नावों में इंजन नहीं होते थे। पानी की गहराई और धारा के अनुसार डंडों और चप्पुओं से नाव चलाई जाती थी। यह काम शारीरिक ताकत और मौसम के अनुसार नहरों के बदलाव की समझ मांगता था। सामान हाथ से लादा और उतारा जाता था। एक यात्रा में कई दिन लग सकते थे।”

लेकिन 1970 के दशक के अंत तक सड़क परिवहन ने बढ़त बना ली। ट्रक तेज और भरोसेमंद साबित हुए। नहरों की देखरेख कम हो गई, गाद जमा होने लगी और नौवहन घट गया। काम कम होने से कई नाविकों ने यह पेशा छोड़ दिया। आज मोइदुन्निकुट्टी उस दौर के गिने-चुने जीवित नाविकों में हैं। जब टीवी पर नहरों के पुनरुद्धार की चर्चा होती है, तो वे कभी-कभी पुराने मार्गों को याद करते हुए प्रतिक्रिया देते हैं।

जलमार्गों का पुनर्जागरण

2018 में अक्कुलम–चेट्टुवा जलमार्ग के चालू होने के साथ केरल ने वर्षों से गाद से भरे हिस्सों को फिर से नौवहन योग्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया। यह 280 किलोमीटर लंबा मार्ग तिरुवनंतपुरम जिले के अक्कुलम से त्रिशूर जिले के चेट्टुवा तक फैला है।

जो कभी पोनानी, कोच्चि और आंतरिक बाजार कस्बों को जोड़ने वाला स्वाभाविक व्यापारिक नेटवर्क था, उसे अब राष्ट्रीय जलमार्ग-3 (वेस्ट कोस्ट कैनाल) परियोजना के तहत योजनाबद्ध परिवहन कॉरिडोर के रूप में विकसित किया जा रहा है। पोल बोट की जगह ड्रेजर मशीनों ने ले ली है, मिट्टी के किनारों की जगह मजबूत तटबंधों ने, और ज्वार-भाटा आधारित आवाजाही की जगह निर्धारित समय वाली सेवाएं शुरू की जा रही हैं।

26 फरवरी 2026 को अक्कुलम–चेट्टुवा जलमार्ग के उद्घाटन के बाद पहली आधिकारिक नावों के गुजरने के साथ यह केवल एक नहर पुनरुद्धार परियोजना की पूर्णता नहीं थी, बल्कि राज्य के लिए एक वैकल्पिक परिवहन रीढ़ के संचालन की शुरुआत थी।

पर्यटन को नई दिशा

फिलहाल इस जलमार्ग का सबसे स्पष्ट प्रभाव पर्यटन क्षेत्र में दिख सकता है। अक्कुलम–चेट्टुवा मार्ग के दक्षिणी हिस्से में पर्यटक नौकाएं चलाई जाएंगी। विशेष आकर्षण वर्कला की पुनर्निर्मित चिलाक्कूर सुरंग है, जहां इलेक्ट्रिक नाव सवारी और श्री नारायण गुरु पर आधारित ऑडियो-विजुअल प्रस्तुति की व्यवस्था की गई है।

यह कार्य केरल वाटरवेज इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (KWIL) ने किया है, जो राज्य सरकार और कोचीन इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड का संयुक्त उपक्रम है।

पर्यटन के साथ-साथ भविष्य में माल परिवहन को भी बढ़ावा देने की योजना है। हालांकि बड़े पैमाने पर कार्गो संचालन में समय लगेगा, लेकिन शुरुआती चरण में जलमार्ग पर्यटन और यात्री सेवाओं पर केंद्रित रहेगा।

परिवहन के लिए वैकल्पिक मार्ग

केरल की भौगोलिक स्थिति पश्चिमी घाट और अरब सागर के बीच संकरी पट्टी हाईवे और रेल नेटवर्क के विस्तार को सीमित करती है। उत्तर-दक्षिण मार्गों पर ट्रैफिक जाम आम हो चुका है। जलमार्ग इस भीड़ से बचने का एक वैकल्पिक रास्ता प्रदान करता है।

हालांकि जल परिवहन की गति सड़क जितनी तेज नहीं होती, लेकिन यह स्थिरता देता है। नाव की यात्रा में ट्रैफिक जाम जैसी समस्या नहीं होती। परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि थोड़ी मात्रा में भी यात्री और माल सड़क से जलमार्ग की ओर स्थानांतरित होते हैं, तो मुख्य सड़कों पर दबाव कम हो सकता है।

रखरखाव और चुनौतियां

परियोजना की सफलता नियमित रखरखाव पर निर्भर करेगी। केरल की नहरों में गाद जमने और जलकुंभी जैसी आक्रामक वनस्पतियों का खतरा रहता है। यदि नियमित सफाई न हो, तो नौवहन फिर बाधित हो सकता है। इसके अलावा, ठोस कचरे को नहरों में फेंकने से रोकने के लिए सख्त नियमों की आवश्यकता होगी। परियोजना के तहत कई स्थानों पर भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास भी हुआ। वर्कला क्षेत्र में ही 594 लोगों का पुनर्वास किया गया।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में केरल

भारत में 111 राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित हैं, लेकिन उनमें से केवल लगभग 30 ही पूरी तरह संचालित हैं। 1993 में घोषित राष्ट्रीय जलमार्ग-3 अब सक्रिय रूप ले रहा है। अक्कुलम–चेट्टुवा खंड के चालू होने से केरल उन राज्यों में शामिल हो गया है जहां घोषित जलमार्ग वास्तव में कार्यात्मक परिवहन मार्ग बन रहे हैं।

भविष्य की दिशा

अक्कुलम–चेट्टुवा कॉरिडोर का उद्घाटन अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है। इसे टिकाऊ बनाने के लिए निरंतर रखरखाव, यात्री सेवाओं की विश्वसनीयता और बस-रेल नेटवर्क से बेहतर कनेक्टिविटी जरूरी होगी।यदि यह परियोजना सफल रहती है, तो नहर किनारे की अर्थव्यवस्था को भी पुनर्जीवन मिल सकता है नाव संचालन, आतिथ्य सेवाएं और पर्यटन गतिविधियां बढ़ सकती हैं।

आज, जब केरल सड़क विस्तार की भौगोलिक और पर्यावरणीय सीमाओं से जूझ रहा है, राज्य ने अपने जलमार्गों पर फिर से भरोसा जताया है। अक्कुलम–चेट्टुवा जलमार्ग अब चालू है। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि क्या यह राज्य के परिवहन और पर्यटन परिदृश्य को वास्तव में बदल पाएगा या फिर यह केवल एक सीमित उपयोग वाला विरासत मार्ग बनकर रह जाएगा।

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