कर्नाटक के कोडागु ट्रेक के दौरान लापता हुई केरल की टेक्नीशियन 3 दिन बाद जंगल में सुरक्षित मिली
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कर्नाटक के कूर्ग (कोडागु) के घने जंगलों में तीन दिन बाद सुरक्षित मिली शरण्या अपनी खोजी टीम के साथ तस्वीर में। | फोटो: विशेष व्यवस्था

कर्नाटक के कोडागु ट्रेक के दौरान लापता हुई केरल की टेक्नीशियन 3 दिन बाद जंगल में सुरक्षित मिली

शरण्या, जो जंगल में भटकने के बाद बेहद थक चुकी थीं, उन्हें एक जर्जर बंगला मिला, जहां वे रुकी रहीं। आखिरकार 3 दिन बाद रेस्क्यू टीम ने उन्हें खोज निकाला।


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कर्नाटक पुलिस, वन विभाग और यहां तक कि एंटी-नक्सल फोर्स की तीन दिन तक चली तेज़ तलाश के बाद, केरल की 36 वर्षीय टेक्नीशियन को रविवार (5 अप्रैल) को सुरक्षित बचा लिया गया। वो 2 अप्रैल को कोडागु के सबसे ऊंचे शिखर ताडियंडामोल पर ट्रेकिंग के दौरान रास्ता भटक गई थीं।

शरण्या जीएस नाम की वो ट्रैकर जंगल में भटकते-भटकते थक गई थीं। उन्हें एक टूटा-फूटा बंगला मिला। जहां वे तब तक रुकी रहीं जब तक वन विभाग के अधिकारी, स्थानीय आदिवासी लोगों की मदद से, रविवार शाम करीब 5 बजे उन्हें खोज नहीं पाए। यह उनके लापता होने के करीब 72 घंटे बाद हुआ।

शरण्या को कैसे खोजा गया

पुलिस ने उनके फोन के CDR डेटा और आखिरी टावर लोकेशन को ट्रैक किया। इसके आधार पर घने जंगल को कई “ग्रिड” में बांटा गया और हर टीम को एक-एक हिस्से की जिम्मेदारी दी गई।

घने पेड़ों के नीचे फंसे लोगों को सामान्य ड्रोन से ढूंढना संभव नहीं होता, इसलिए “थर्मल इमेजिंग ड्रोन” का इस्तेमाल किया गया, जो मानव शरीर की गर्मी को पहचान सकते हैं। आसमान से दिन-रात लगातार सर्च ऑपरेशन चलाया गया।

स्थानीय आदिवासियों की अहम भूमिका

तकनीक के साथ-साथ इस रेस्क्यू ऑपरेशन की सबसे बड़ी ताकत स्थानीय माला कुडिया जनजाति रही। ये लोग जंगल के हर हिस्से, घाटियों, जल स्रोतों और जानवरों की गतिविधियों से अच्छी तरह परिचित हैं।

इसके अलावा 3 अप्रैल से ट्रेकिंग रूट पर डॉग स्क्वॉड भी तैनात किया गया। कुल 9 टीमें उनके आखिरी फोन लोकेशन के आधार पर सर्च ऑपरेशन चला रही थीं।

कोडागु जिले के सभी एंटी-पोचिंग कैंप को अलर्ट पर रखा गया और तलाश को केरल सीमा तक बढ़ाया गया।

क्या हुआ था शरण्या के साथ?

शरण्या, जो कोच्चि की एक आईटी कंपनी में काम करती हैं और कोझिकोड जिले के नादापुरम की रहने वाली हैं, 2 अप्रैल को ट्रेकिंग के लिए कक्काबे के पास यवकापडी स्थित एक होमस्टे में ठहरी थीं।

उन्होंने सोलो ट्रेक के लिए ऑनलाइन बुकिंग की थी, लेकिन जंगली हाथियों के खतरे को देखते हुए वन विभाग ने उन्हें एक समूह के साथ भेजा था।

आखिरी बार उन्हें ट्रेल पर कुत्तों के साथ खेलते देखा गया था, जिसके बाद वे अचानक लापता हो गईं।

आखिरी कॉल और नेटवर्क फेल

2 अप्रैल दोपहर के करीब उन्होंने होमस्टे मालिक को फोन कर बताया कि वे रास्ता भटक गई हैं और देर हो सकती है।

इसके बाद उनका फोन नेटवर्क से बाहर हो गया और उनकी लोकेशन ट्रैक करना मुश्किल हो गया।ताडियंडामोल का इलाका बेहद चुनौतीपूर्ण है। एक तरफ बसा हुआ इलाका है, जहां से ज्यादातर ट्रेकर्स जाते हैं, जबकि दूसरी तरफ घना पट्टीघाट रिजर्व फॉरेस्ट है, जहां रास्ते लगभग नहीं हैं।

कैसे बचीं शरण्या?

इसी घने जंगल वाले हिस्से में खोज अभियान केंद्रित किया गया और वहीं एक दूरस्थ घाटी में शरण्या मिलीं।

हालांकि यह साफ नहीं है कि वे वहां कैसे पहुंचीं, लेकिन जब रेस्क्यू टीम ने उन्हें पाया तो वे भूखी जरूर थीं, लेकिन मानसिक रूप से मजबूत थीं।

उन्होंने बताया कि उन्हें अंदाजा था कि ड्रोन से तलाश होगी, इसलिए वे जानबूझकर खुले इलाके में रहीं ताकि उन्हें आसानी से देखा जा सके।

परिवार का भरोसा सच साबित हुआ

शरण्या के भाई श्याम 4 अप्रैल को परिवार के साथ वहां पहुंचे थे। उन्होंने अपनी बहन को फिट और अनुभवी ट्रेकर बताया था और भरोसा जताया था कि वह सुरक्षित लौट आएंगी — जो आखिरकार सच साबित हुआ।

फिलहाल शरण्या को प्राथमिक उपचार दिया जा रहा है।

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