पश्चिम बंगाल में सियासी टकराव: ममता बनर्जी, I-PAC और ED के बीच डेटा और सत्ता की जंग
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पश्चिम बंगाल में सियासी टकराव: ममता बनर्जी, I-PAC और ED के बीच डेटा और सत्ता की जंग

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी और ED के बीच यह टकराव अब राजनीतिक और कानूनी दोनों मोर्चों पर जारी है। चुनावी रणनीति, मतदाता डेटा और राजनीतिक अखंडता को लेकर यह विवाद आगामी विधानसभा चुनावों के दौरान और गरम होने की आशंका है।


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देश के चुनाव और राजनीतिक सलाहकार संस्थान 'I-PAC' और एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) के बीच बढ़ते विवाद में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दखल दे दिया है। इससे ममता राजनीतिक तौर पर इस विवाद में महत्वपूर्ण ‘तीसरी पार्टी’ के रूप में उभरती नजर आ रही हैं, जिसका असर आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है। ED ने I-PAC के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पश्चिम बंगाल और दिल्ली में कुल 10 परिसरों पर छापा मारा था।

I-PAC और TMC का चुनावी डेटा

छापे प्रतीक जैन से संबंधित परिसरों पर मारे गए। प्रतीक जैन ने मशहूर चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ मिलकर I-PAC की स्थापना की थी। प्रशांत किशोर ने 2021 में ममता बनर्जी की TMC की चुनावी सफलता में अहम भूमिका निभाई थी। इसके अलावा, उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2014 की सफल चुनावी अभियान की नींव रखने का श्रेय भी जाता है। I-PAC वर्तमान में TMC के सोशल मीडिया अकाउंट्स और चुनावी डेटा को संभालता है। ममता का आरोप है कि छापों के दौरान BJP के इशारे पर ED ने उनकी पार्टी से जुड़ी संवेदनशील जानकारी और डेटा हासिल करने की कोशिश की। ममता ने कथित तौर पर कोलकाता में ED के दो स्थानों पर छापों के दौरान फाइल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अपने कब्जे में ले लिए।

विपक्ष का आरोप

विपक्षी दलों का कहना है कि BJP, केंद्र और कई राज्यों में सत्ता में आने के बाद ED और CBI जैसे संस्थानों का उपयोग कानूनी और सोशल इंजीनियरिंग के लिए कर रही है। अब यह रणनीति पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले लागू की जा रही है। ED ने साफ किया कि छापे प्रतीक जैन के खिलाफ पांच साल पुराने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सबूत जुटाने के लिए थे और किसी चुनाव या तीसरी पार्टी से इसका कोई लेना-देना नहीं है।

TMC का रुख

TMC का कहना है कि I-PAC उनके चुनावी सलाहकार हैं और ED की कार्रवाई का असली उद्देश्य उनके चुनावी डेटा और रणनीतियों को रोकना था। ममता ने इसे BJP की मदद से TMC के चुनावी ‘वार रूम’ पर हमला करार दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर मैं (पश्चिम बंगाल सरकार) इसी तरह BJP कार्यालय पर छापेमारी करूं तो क्या होगा?

ममता की लड़ाई का अंदाज

ममता और ED के बीच यह विवाद कोलकाता हाई कोर्ट तक पहुंच गया। ममता ने शुक्रवार को पार्टी रैली में भी इसका जिक्र किया। ममता ने हमेशा ही राजनीतिक संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई है और विधानसभा चुनाव में चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की तैयारी में इस बार भी पूरी सजगता दिखाई।

SIR और मतदाता डेटा का महत्व

छापे के समय पश्चिम बंगाल में विशेष गहन मतदाता सूची संशोधन (SIR) चल रहा था। राजनीतिक दलों के पास उपलब्ध मतदाता डेटा महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि यह संसोधन प्रक्रिया में मार्गदर्शन का काम करता है। TMC का दावा है कि ममता की पार्टी का नियंत्रण इसे महत्वपूर्ण बना देता है और विपक्षी दलों द्वारा इस डेटा का इस्तेमाल चुनावी रणनीति के लिए किया जा सकता है।

मतदाता सूची पर खींचतान

TMC और चुनाव आयोग के बीच SIR को लेकर खींचतान रही है, क्योंकि राज्य सरकार के कर्मचारी, जिन्हें मतदाता सूची में नाम दर्ज करने का कार्य मिला है, उन्होंने पिछले दशक से यह डेटा संभाला है। यह मतदाता डेटा न केवल संशोधन प्रक्रिया बल्कि चुनाव के अंतिम नतीजे को भी प्रभावित कर सकता है। ममता पूरी तरह सतर्क दिखाई दे रही हैं और चुनाव से पहले किसी भी संभावित विपक्षी रणनीति के लिए तैयार हैं। उन्होंने I-PAC पर हुए छापों को BJP द्वारा प्रेरित कार्रवाई के रूप में पेश किया है।

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