
क्यों कर्नाटक का लक्कुंडी गांव बना राज्य का नया ऐतिहासिक आकर्षण
लक्कुंडी के निवासी हमेशा से इतिहास के साथ रहते आए हैं। माना जाता है कि यह गांव कल्याण चालुक्य साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। जहां एक ओर यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने के प्रयास चल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीणों के पुनर्वास की अफवाहें भी फैल रही हैं। साथ ही ‘हेरिटेज टाउन’ बनने की उम्मीदों ने यहां की जमीन की कीमतें बढ़ा दी हैं।
जरा कल्पना कीजिए, एक शिलालेख विशेषज्ञ (एपिग्राफिस्ट), जो पत्थर या मिट्टी पर खुदे शब्दों का अध्ययन करता है, कर्नाटक के एक गांव में खुदाई स्थल पर बने गड्ढे में धीरे-धीरे उतरता है। वहां से करीब आठ फुट लंबी पत्थर की पट्टिका निकाली जाती है। विशेषज्ञ उस पर खुदे शिलालेख को पढ़ने की कोशिश करता है। यह प्राचीन कन्नड़ लिपि ‘हलेगन्नड़’ में लिखा हुआ प्रतीत होता है। आसपास खड़े ग्रामीण उत्सुकता से सुनते हैं, जब विशेषज्ञ ऊंची आवाज में पढ़ता है—“मुझे सुरक्षित रखो, वरना क्रोध का सामना करो।”
कर्नाटक के गडग जिले में स्थित लक्कुंडी गांव के लोग दशकों से इतिहास के बीच रह रहे हैं। गांव में मध्यकालीन मंदिरों के अवशेष, प्राचीन स्मारक, धरोहरें और बावड़ियां बिखरी पड़ी हैं। स्थानीय लोग इस विरासत पर गर्व करते हैं।
50 वर्षीय शरणु मल्लप्पा, जो यहां किराना दुकान चलाते हैं, बताते हैं, “कई ग्रामीणों ने सदियों पुराने मंदिरों से सटे घर और दीवारें बना ली थीं, बिना यह जाने कि उनका पुरातात्विक महत्व क्या है। कुछ लोगों ने तो मध्यकालीन मंदिरों को ही घरों में बदल दिया। चौकीमुथ और कुंबारा ओणी (गली) में ऐसे घर मिल जाएंगे। कुछ पुरावशेष सीढ़ियां और आंगन के खंभे बन गए, क्योंकि लोग उनकी ऐतिहासिक अहमियत नहीं समझते थे।”
वे आगे कहते हैं, “खुदाई के बाद अब हमें इसकी अहमियत का पता चला है। हम बेहद खुश हैं और इन्हें पर्यटन विभाग को सौंपने के लिए तैयार हैं ताकि यहां ओपन-एयर म्यूजियम बनाया जा सके। ग्रामीण अपनी जमीन सरकार को सौंपने के लिए भी तैयार हैं, बशर्ते उन्हें रहने के लिए सम्मानजनक स्थान और खेती के लिए जमीन मिले।”
अब जब लक्कुंडी को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने की कोशिशें तेज हैं, तो ग्रामीणों को किसी अन्य स्थान पर बसाए जाने की चर्चाएं भी चल रही हैं। इस बीच ‘हेरिटेज टाउन’ बनने की उम्मीदों ने यहां संपत्ति के दाम बढ़ा दिए हैं।
राजधानी बेंगलुरु से करीब 400 किलोमीटर दूर स्थित लक्कुंडी, जिसे पहले ‘लोक्की गुंडी’ कहा जाता था, 10वीं से 12वीं शताब्दी के कल्याण चालुक्य (पश्चिमी चालुक्य) साम्राज्य का एक प्रमुख व्यावसायिक केंद्र माना जाता है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार यहां ‘टंकसाले’ (टकसाल) थी, जहां सोने के सिक्के ढाले जाते थे। ‘लोक्की’ और ‘गद्याना’ नाम से प्रसिद्ध ये सिक्के अपने वजन और आकार के लिए जाने जाते थे।
टकसाल के उल्लेख ने यहां दबे खजाने की चर्चाओं को भी हवा दी है। हाल ही में एक घटना ने इन कयासों को और मजबूत किया। जनवरी में गांव में एक निर्माणाधीन मकान की नींव खोदते समय मजदूरों को जमीन के भीतर दबा तांबे का घड़ा मिला। उसमें सोने के आभूषण, सिक्के और अन्य वस्तुएं थीं।
जमीन के मालिक प्रज्वल रिट्टी ने यह सामग्री राज्य सरकार को सौंप दी। पुरातत्वविदों का अनुमान है कि ये वस्तुएं 300 से 1000 वर्ष पुरानी हो सकती हैं और ये शाही खजाने के बजाय रोजमर्रा के उपयोग के आभूषण प्रतीत होते हैं। इस खोज से आगे और शोध की संभावनाएं बढ़ी हैं। बताया जाता है कि राज्य सरकार ने परिवार को घर बनाने के लिए वैकल्पिक भूखंड की पेशकश की है।
“जब भी मैं लक्कुंडी गया, मुझे नए शिलालेख मिले। मुझे राष्ट्रकूट काल (8वीं से 10वीं शताब्दी) का वीरगल्लु (वीर पत्थर/योद्धा स्मारक) भी मिला,” इतिहासकार हनुमाक्षी गोगी, जो लक्कुंडी इंसक्रिप्शन्स की लेखिका हैं, बताती हैं।
वास्तव में, वर्षों के दौरान लक्कुंडी अलग-अलग युगों की विरासत का संरक्षक बन गया है। जहां कल्याण चालुक्य काल से इसका संबंध अच्छी तरह दर्ज है, वहीं जनवरी में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के शोधकर्ताओं को खुदाई के दौरान ऐसे औजार मिले, जो उनके अनुसार पाषाण युग (लगभग 5,00,000 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व तक) के हो सकते हैं। इनमें एक अंडाकार पत्थर का औजार शामिल है, जिसकी एक धार तेज है।पुरातत्वविदों का मानना है कि इसका उपयोग प्रारंभिक मानव शिकार या आत्मरक्षा के लिए करते होंगे।
इस क्षेत्र में मौजूद स्थापत्य अवशेष विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों के मिश्रण की ओर भी संकेत करते हैं।
भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक धरोहर ट्रस्ट (INTACH) ने पहले उल्लेख किया है कि उत्तरी कर्नाटक में कल्याण चालुक्य काल में बने मंदिर ‘वेसर’ या मिश्रित शैली के हैं। इनमें नागर (उत्तर, मध्य, पश्चिम और पूर्व भारत में प्रचलित), द्रविड़ (दक्षिण भारत की शैली) और भूमिजा शैली के तत्वों का समावेश है, लेकिन ये एक विशिष्ट मंदिर शैली का निर्माण करते हैं।
बेंगलुरु स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़ के एसोसिएट प्रोफेसर श्रीकुमार एम मेनन कहते हैं, “उत्तर और दक्षिण के बीच भौगोलिक स्थिति के कारण दक्कन का पठार स्थापत्य विचारों का संगम स्थल रहा है। दक्कनी कारीगरों ने नागर परंपरा से परिचित होने के कारण द्रविड़ शैली के ढांचों में नए प्रयोग किए और उन्हें अनोखे ढंग से संयोजित किया।”
इतिहासकारों के अनुसार, लक्कुंडी वैष्णव, शैव और जैन परंपराओं का संगम स्थल रहा है।
लक्कुंडी हेरिटेज एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (LHADA) के आयुक्त शरणु गोगेरी कहते हैं, “लक्कुंडी को कभी 101 मंदिरों और कुओं की भूमि कहा जाता था। इनमें से कई मंदिर वर्तमान बस्तियों के नीचे दबे हुए हैं, जबकि लगभग 70 अब भी दिखाई देते हैं। उन्हें खुदाई कर संरक्षित करने की आवश्यकता है।”
LHADA की परिकल्पना 2017-18 में कर्नाटक सरकार की बजट घोषणा के बाद की गई थी, ताकि लक्कुंडी के ऐतिहासिक नगर का संरक्षण, प्रबंधन और विकास किया जा सके। 2020 में इसे एक संस्थान के रूप में स्थापित किया गया। इसका उद्देश्य 50 से अधिक चालुक्यकालीन मंदिरों, 101 बावड़ियों और गांव में बिखरे विभिन्न शिलालेखों का संरक्षण और धरोहर पर्यटन को बढ़ावा देना है।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के अनुसार, लक्कुंडी में पहली खुदाई 2004-05 में हुई थी, जिसमें कल्याण चालुक्य काल के अनेक शिलालेख मिले थे। वे लक्कुंडी में एक अस्थायी ओपन-एयर म्यूजियम के उद्घाटन के दौरान बोल रहे थे, जहां एकत्रित पुरावशेष प्रदर्शित किए जा रहे हैं। पिछले वर्ष नवंबर में और फिर पिछले महीने भी यहां खुदाई की गई।
पिछले वर्ष 24 नवंबर को एएसआई की एक अनोखी पहल के तहत 1050 प्राचीन वस्तुएं—जिनमें दुर्लभ मूर्तियां, सिक्के, मोती और रत्न शामिल हैं—स्थानीय समुदाय द्वारा दान की गईं। उस दिन लक्कुंडी की सड़कों पर पालकियों में प्राचीन सिक्के, सोने-चांदी-पीतल-तांबे की वस्तुएं, पत्थर पर खुदेशिलालेख और ताड़पत्र पांडुलिपियां निकाली गईं—जो इस नगर की ऐतिहासिक समृद्धि का प्रमाण थीं।
लक्कुंडी से एकत्रित पुरावशेषों को एक अस्थायी खुले संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है। फोटो: विशेष व्यवस्था द्वारा।
लक्कुंडी में पहले से ही ब्रह्म जैनालय (जैन प्रार्थना स्थल) में एएसआई द्वारा संचालित एक संग्रहालय मौजूद है। अब राज्य पुरातत्व, संग्रहालय एवं धरोहर विभाग की पहल पर एक नया संग्रहालय प्रस्तावित है, जो LHADA के अधीन होगा। वर्तमान में खुले संग्रहालय में प्रदर्शित पुरावशेषों को वहीं सुरक्षित रखा जाएगा।
ये सभी घटनाक्रम उस समय सामने आए हैं जब कर्नाटक सरकार लक्कुंडी को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिलाने के प्रयास में जुटी है। इस संबंध में अंतिम प्रस्ताव राज्य सरकार ने दिसंबर में केंद्र को भेजा था और इसी महीने यूनेस्को की एक टीम ने 10वीं शताब्दी के कल्याण चालुक्य स्मारकों का आकलन करने के लिए लक्कुंडी का दौरा किया। यह दर्जा मिलने से गांव को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल सकती है और पर्यटकों की संख्या बढ़ सकती है।
हालांकि, एक विरासत नगर के रूप में लक्कुंडी की पहचान उसके मौजूदा निवासियों के विस्थापन का कारण भी बन सकती है।
स्थानीय निवासी सिद्धू पाटिल कहते हैं, “हमारे परिवार के बुजुर्ग इस ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहर का हिस्सा होने पर गर्व महसूस करते हैं।” लेकिन कुछ परिवारों को अपने पैतृक घर खाली करने के कथित सरकारी नोटिस मिलने से चिंता बढ़ गई है।
60 वर्षीय शरणैया चौकीमुत्त का दावा है कि उन्हें भी मकान खाली करने का नोटिस मिला है। उनका घर लक्कुंडी के ऐतिहासिक महांतेश्वर मंदिर से सटा हुआ है। वे कहते हैं, “पिछली पांच पीढ़ियों से हमारा परिवार इस घर में रह रहा है। अब हमें इसे खाली करने का नोटिस मिला है। हम सरकार का विरोध नहीं करेंगे, लेकिन अगर हमें वैकल्पिक जमीन और आवास दिया जाए तो हम स्थानांतरित होने को तैयार हैं।”
पुरानी पत्थर की नक्काशी का एक टुकड़ा। फोटो: विशेष व्यवस्था द्वारा।
इस बीच यह भी चर्चा है कि लक्कुंडी के नीचे दबी ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए पूरे गांव को ही किसी अन्य स्थान पर बसाया जा सकता है। राज्य पर्यटन विभाग के सूत्रों के अनुसार, पिछले महीने हुई खुदाई के निष्कर्षों का पूर्ण मूल्यांकन होने के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
सूत्रों का कहना है कि 12वीं शताब्दी के कोटे वीरभद्रेश्वर मंदिर (भगवान शिव को समर्पित) परिसर में बड़े पैमाने पर खुदाई शुरू करने की योजना है। यह परियोजना कर्नाटक के पुरातत्व, संग्रहालय एवं धरोहर विभाग और LHADA द्वारा संयुक्त रूप से चलाई जाएगी।
पुरातत्व, संग्रहालय एवं धरोहर विभाग के आयुक्त ए. देवराज कहते हैं कि खुदाई के लिए स्थानों की पहचान उनके महत्व और संभावित खोजों के आधार पर की जाती है। वहीं गडग जिले के उपायुक्त सी.एन. श्रीधर का कहना है, “पूरे गांव को स्थानांतरित करने का निर्णय खुदाई के निष्कर्षों और जमीन के नीचे और स्मारकों के मिलने की संभावना पर निर्भर करेगा।”
विडंबना यह है कि जहां एक ओर निवासी संभावित बेदखली की आशंका में जी रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लक्कुंडी में रियल एस्टेट की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। वर्ष 2023 में लक्कुंडी और राष्ट्रीय राजमार्ग के पास कृषि भूमि की कीमत लगभग 50 लाख रुपये प्रति एकड़ थी। दो वर्षों में यह दर लगभग दोगुनी होकर क्षेत्र के लिए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है।
लक्कुंडी में खुदाई स्थलों में से एक। फोटो: विशेष व्यवस्था द्वारा।
रियल एस्टेट एजेंटों का कहना है कि हालिया खुदाई और लक्कुंडी के संभावित विरासत स्थल बनने की उम्मीदों ने जमीन की कीमतों में उछाल लाया है। एक एजेंट ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “लक्कुंडी के प्रमुख विरासत स्थल बनने की संभावना को देखते हुए निवेशकों को आकर्षित करने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं।”
पर्यटन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, “यूनेस्को का दर्जा मिलने से स्मारकों को अतिरिक्त संरक्षण मिलेगा और कर्नाटक की कलात्मक धरोहर को वैश्विक पहचान मिलेगी। लेकिन इसका पूरा लाभ तभी मिलेगा जब संबंधित प्राधिकरण इन स्मारकों को पर्यटकों के अनुकूल बनाएं और संरक्षण के सभी अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करें।”
पर्यटन निदेशक राजेंद्र के.वी. का कहना है, “सरकार सभी महत्वपूर्ण स्मारकों पर पर्यटक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। आने वाले दिनों में यूनेस्को समिति की सिफारिशों और मास्टर प्लान को लागू किया जाएगा।”
लेकिन हाल ही में मिले शिलालेख की तरह, असली कुंजी ‘संरक्षण’ ही है—पहचान और पर्यटन उसके बाद आएंगे।

