गैस खत्म, जुगाड़ शुरू: पुडुचेरी के रेस्टोरेंट अब लकड़ी और बुरादे से चला रहे रसोई
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गैस खत्म, जुगाड़ शुरू: पुडुचेरी के रेस्टोरेंट अब लकड़ी और बुरादे से चला रहे रसोई

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब भारत में आम जीवन पर भी दिखने लगा है। गैस आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं के कारण कई क्षेत्रों में वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडरों की कमी हो गई है, जिसका सीधा असर रेस्टोरेंट उद्योग पर पड़ रहा है।


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पुडुचेरी में होटल और रेस्टोरेंट मालिकों को तेजी से नए विकल्प अपनाने पड़ रहे हैं, क्योंकि एलपीजी सिलेंडरों का मौजूदा स्टॉक खत्म हो रहा है और नई आपूर्ति में देरी हो रही है। अपने कारोबार को चालू रखने के लिए कई रसोइयों ने वैकल्पिक तरीकों से खाना पकाना शुरू कर दिया है। कुछ रेस्टोरेंट ने अपने काम के घंटे कम कर दिए हैं, जबकि कुछ ने सीमित ईंधन के कारण अपने मेन्यू में कटौती की है।

वैकल्पिक चूल्हों का सहारा

कई रेस्टोरेंट के लिए समाधान के तौर पर इंडक्शन कुकटॉप, हाइब्रिड स्टोव, बुरादे (सॉडस्ट) से चलने वाले चूल्हे और लकड़ी के चूल्हों का इस्तेमाल शुरू किया गया है। हालांकि एलपीजी से हटकर इन विकल्पों पर जाना आसान नहीं है। कई विकल्पों के लिए अतिरिक्त निवेश, नए उपकरण और रसोई कर्मचारियों को नए तरीके से प्रशिक्षण देना पड़ रहा है।

छोटे और मध्यम रेस्टोरेंट मालिकों के लिए इतनी जल्दी इन बदलावों को अपनाना चुनौतीपूर्ण और महंगा साबित हो रहा है।

बुरादे से चलने वाला हाइब्रिड सिस्टम

पुडुचेरी के गणपति चेट्टिकुलम इलाके में एक बेकरी मालिक पहले से ही ऐसे हालात के लिए तैयार था। करीब चार दशकों से होटल और बेकरी चला रहे चालापा नामक कारोबारी लाल मिट्टी से बने एक खास बुरादे के चूल्हे का इस्तेमाल करते हैं।

यह चूल्हा बुरादे को काफी कुशलता से जलाता है और इसकी कार्यक्षमता लगभग एलपीजी सिलेंडर के बराबर मानी जाती है। चालापा बताते हैं कि उन्होंने पहले भी कई बार गैस की कमी देखी है। इसी अनुभव से उन्होंने हाइब्रिड चूल्हा प्रणाली अपनाई, जिसमें गैस उपलब्ध होने पर सिलेंडर जोड़ा जा सकता है और कमी होने पर बुरादे का इस्तेमाल किया जा सकता है।

सस्ता और आसानी से उपलब्ध ईंधन

उनके अनुसार बुरादा स्थानीय लकड़ी की दुकानों से आसानी से मिल जाता है और इसकी कीमत भी कम होती है। लकड़ी की तुलना में इसमें कम धुआं निकलता है और खर्च भी काफी कम पड़ता है।

धुएं को बाहर निकालने के लिए रसोई में लगभग 20 फुट ऊंची चिमनी लगाई गई है, जिससे धुआं बाहर निकल जाता है और कर्मचारी आराम से काम कर सकते हैं।

कई रेस्टोरेंट ने अपनाए लकड़ी के चूल्हे

पुडुचेरी के कई प्रसिद्ध रेस्टोरेंट भी इस संकट के अनुसार खुद को ढाल रहे हैं। लोकप्रिय कामिनेनी रेड्डी रेस्टोरेंट, जहां रोज सैकड़ों ग्राहक आते हैं, वहां एलपीजी की कमी के कारण पूरी रसोई को लकड़ी के चूल्हों पर चलाया जा रहा है।

अचानक बदलाव के बावजूद रेस्टोरेंट अपने ग्राहकों के लिए वही व्यंजन तैयार कर रहा है। रसोई में इस्तेमाल होने वाले लकड़ी के चूल्हों में लौ नियंत्रित करने की व्यवस्था भी है, जिससे रसोइए तापमान नियंत्रित कर सकते हैं और भोजन की गुणवत्ता बनाए रख सकते हैं।

पर्यटन शहर के लिए रेस्टोरेंट अहम

पर्यटन के लिए मशहूर पुदुचेरी जैसे शहर में रेस्टोरेंट और होटलों का सुचारु रूप से चलना स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटकों दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कारोबारी बताते हैं कि स्थिति सामान्य होने तक रसोई चलाने के लिए वे नए-नए प्रयोग कर रहे हैं।

उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि गैस आपूर्ति सामान्य होने तक ऐसे अस्थायी उपाय जारी रह सकते हैं। मौजूदा अनिश्चितता का बड़ा कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और Strait of Hormuz जैसे समुद्री मार्गों को लेकर चिंताएं हैं, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम हैं।

अब सवाल यह है कि क्या यह संकट जल्द खत्म होगा या कारोबारियों को लंबे समय तक इन वैकल्पिक तरीकों के साथ ही काम करना पड़ेगा।

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