
खनन की भूख में उजड़ रहे मध्य प्रदेश के जंगल, बढ़ा जलवायु संकट
मध्य प्रदेश में खनन और विकास परियोजनाओं के कारण हजारों हेक्टेयर जंगल खत्म हो रहे हैं, जिससे जलवायु, वन्यजीव और आदिवासी जीवन पर संकट बढ़ा है।
भारत भीषण लू की मार झेल रहा है और विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि वनों की कटाई बिगड़ते जलवायु संकट का एक बड़ा कारण बन चुकी है। इसी बीच मध्य प्रदेश से एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। देश में सबसे अधिक वन क्षेत्र रखने वाला यह राज्य, जिसकी हरित संपदा 85,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक फैली हुई है, पिछले पाँच वर्षों में बुनियादी ढांचा और खनन परियोजनाओं के कारण लगभग 60,000 एकड़ जंगल खो चुका है। रिपोर्टों के अनुसार, यह पूरे देश में वन क्षरण की सबसे तेज दरों में से एक है।
2014 से 2024 के बीच भारत में विकास परियोजनाओं के लिए 1.73 लाख हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को मंजूरी दी गई। इनमें अकेले खनन और जलविद्युत परियोजनाओं ने 80,000 हेक्टेयर से अधिक जंगल निगल लिए, जबकि सड़कें, बिजली ट्रांसमिशन लाइनें और रक्षा परियोजनाएँ भी बड़े पैमाने पर वन भूमि की हानि का कारण बनीं। इस पूरे दौर में मध्य प्रदेश सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में लगातार शामिल रहा।
मध्य प्रदेश की घटती हरियाली
♦ वर्ष 2021 में मध्य प्रदेश का वन क्षेत्र 77,492 वर्ग किलोमीटर था, जो 2023 में घटकर 77,073 वर्ग किलोमीटर रह गया।
♦ राज्य के सबसे अधिक वन क्षेत्र वाले तीन जिले हैं — उमरिया (55%), बालाघाट (53%) और श्योपुर (52%)।
♦ रिकॉर्डेड फॉरेस्ट एरिया के बाहर सबसे अधिक वन हानि (344.77 वर्ग किमी) मध्य प्रदेश में दर्ज की गई।
♦ पूरे देश में वन और वृक्ष आच्छादन में सबसे अधिक कमी भी मध्य प्रदेश में हुई, जहाँ 612.41 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र घट गया।
(स्रोत: इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2023)
वर्ष 2024-25 में राज्य में 3,200 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि का डायवर्जन किया गया। 2023-24 में यह आँकड़ा 9,000 हेक्टेयर से अधिक था, जबकि 2022-23 और 2021-22 में क्रमशः 3,492 और 6,352 हेक्टेयर वन भूमि विकास परियोजनाओं के लिए दी गई। इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2023 के अनुसार, मध्य प्रदेश का वन क्षेत्र 2021 में 77,492 वर्ग किलोमीटर था, जो 2023 में घटकर 77,073 वर्ग किलोमीटर रह गया। रिपोर्ट में कहा गया कि देश में वन और वृक्ष आच्छादन में सबसे अधिक कमी मध्य प्रदेश में दर्ज की गई, जो लगभग इंदौर शहर के आकार के बराबर है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस बड़े पैमाने पर हो रही वनों की कटाई का एक प्रमुख कारण खनन गतिविधियाँ हैं, जिनमें कोयला और अब सोने का खनन भी शामिल हो चुका है।
हाल ही में एक रिपोर्ट में बताया गया कि केंद्र सरकार ने राज्य में 150 हेक्टेयर वन भूमि को सोने के खनन के लिए मंजूरी दे दी है। एक निजी कंपनी सिंगरौली जिले में हर साल लगभग 130 किलोग्राम सोना निकालने की योजना बना रही है। यह इलाका भारत के महाकोशल खनिज क्षेत्र में आता है, जो सोना, सल्फाइड, निकेल और प्लेटिनम समूह धातुओं जैसे खनिजों के लिए जाना जाता है।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की पर्यावरण मूल्यांकन समिति (EAC) ने इस परियोजना की समीक्षा के बाद इसे मंजूरी देने की सिफारिश की। समिति ने कुंदन गोल्ड माइंस प्राइवेट लिमिटेड को सिंगरौली के चित्रांगी तहसील स्थित गुरहर पहाड़ गोल्ड ब्लॉक में 149.30 हेक्टेयर वन भूमि पर सालाना 1.12 मीट्रिक टन तक खनन की अनुमति दी। इसमें 130 किलोग्राम कच्चा सोना निकाला जाएगा जबकि शेष 990 किलोग्राम सामग्री को अपशिष्ट माना जाएगा।
कंपनी ने अगस्त 2024 में खनन प्रस्ताव प्रस्तुत किया था। शुरुआत में दावा किया गया कि लीज क्षेत्र में 143.80 हेक्टेयर वन भूमि और 5.50 हेक्टेयर सरकारी बंजर भूमि शामिल है। बाद में स्पष्ट हुआ कि पूरा क्षेत्र वन भूमि के अंतर्गत आता है। इसके बाद कंपनी ने संशोधित आवेदन जमा किया और EAC ने मूल्यांकन के बाद इसे मंजूरी दे दी।
“भारत का मिनरल हब” बनने की तैयारी
सितंबर 2025 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर और विकसित भारत के विजन के तहत राज्य खनन क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल कर रहा है और मध्य प्रदेश “भारत का मिनरल हब” बनने जा रहा है।मार्च में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, वन सलाहकार समिति (FAC) ने भी राज्य में कई बड़े खनन और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए वन भूमि डायवर्जन को सैद्धांतिक मंजूरी दी है। इनमें 1,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र वाला कोयला ब्लॉक और लगभग 470 हेक्टेयर का कोयला खदान क्षेत्र शामिल है।
FAC की 27 फरवरी की बैठक के मिनट्स के अनुसार, समिति ने सिंगरौली जिले में प्रस्तावित गोंडबहेरा उजहेनी ईस्ट भूमिगत कोयला खदान के लिए लगभग 470 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के डायवर्जन की सिफारिश की। यह परियोजना अदानी पावर की सहायक कंपनी महान एनर्जेन लिमिटेड को दी गई है।
इसी तरह, उमरिया और शहडोल जिलों में प्रस्तावित मारवटोला-VII कोल ब्लॉक के लिए भी 1,063 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि डायवर्ट करने को प्रारंभिक मंजूरी दी गई। यह खदान आंशिक रूप से ओपन-कास्ट और आंशिक रूप से भूमिगत तरीके से संचालित की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट और विरोध प्रदर्शन
खनन परियोजनाओं को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है और राज्य विधानसभा से लेकर सड़कों तक विरोध प्रदर्शन हुए हैं। 21 मई को सुप्रीम कोर्ट ने अदानी समूह की कंपनी स्ट्रेटाटेक मिनरल रिसोर्सेज को सिंगरौली के धिरौली कोल ब्लॉक के लिए लगभग 1,400 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट करने की मंजूरी के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी।
पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे ने अदालत से इस क्षेत्र को इको-सेंसिटिव जोन घोषित करने की मांग की थी। उनका कहना था कि यह इलाका हाथियों के आवागमन का मार्ग है और जैव विविधता से भरपूर जंगलों का हिस्सा है।
पिछले वर्ष दिसंबर में मध्य प्रदेश विधानसभा में भी इस मुद्दे पर जोरदार हंगामा हुआ। कांग्रेस विधायकों ने धिरौली परियोजना के लिए लगभग छह लाख पेड़ों की कटाई का विरोध करते हुए वॉकआउट किया। कांग्रेस विधायक विक्रांत भूरिया ने आरोप लगाया कि “पूंजीपतियों और कोयला खनन” को लाभ पहुँचाने के लिए आदिवासियों के अधिकार छीने जा रहे हैं।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि धिरौली में बिना स्टेज-II फॉरेस्ट क्लीयरेंस और वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 तथा PESA, 1996 का उल्लंघन करते हुए पेड़ों की कटाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि प्रभावित गाँवों में अधिकांश आबादी अनुसूचित जनजातियों और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) की है, जो इसका विरोध कर रहे हैं।
हालाँकि, राज्य के वन राज्यमंत्री दिलीप अहीरवार ने कहा कि पेड़ों की कटाई केंद्र और राज्य सरकार के नियमों के अनुसार की जा रही है और जितने पेड़ काटे जा रहे हैं, उतने ही अन्य स्थानों पर लगाए भी जा रहे हैं।
“सिर्फ पौधे लगाना पर्याप्त नहीं”
पूर्व भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी सुदेश वाघमारे ने कहा कि केवल पौधारोपण से सदियों पुराने जंगलों की भरपाई नहीं हो सकती। उन्होंने चेतावनी दी कि नए लगाए गए पौधों का जीवित रहना और विकसित होना भी जरूरी है।उन्होंने कहा कि विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि डायवर्ट होने पर CAMPA (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority) फंड उपलब्ध कराया जाता है, जिसका उपयोग वन प्रबंधन के लिए होना चाहिए। लेकिन कई मामलों में इन फंड्स का इस्तेमाल भवन निर्माण जैसी गतिविधियों में किया गया है, जिसकी ओर पहले भी CAG रिपोर्ट में इशारा किया गया था।
पर्यावरणीय संकट और बढ़ती गर्मी
मध्य प्रदेश अब गंभीर हीटवेव्स और सूखे की स्थितियों का सामना कर रहा है। हालिया अध्ययन बताते हैं कि राज्य एक बड़े जलवायु संकट की ओर बढ़ रहा है और यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो इसका सीधा असर पानी, खेती और ग्रामीण जीवन पर पड़ेगा।
राज्य के उत्तरी और पूर्वी जिलों में मानसून के दौरान कम बारिश हो रही है जबकि सालभर तापमान ऊँचा बना रहता है। गर्मी से होने वाली मौतों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है।
अध्ययन में पाया गया कि हाल के दशकों में वर्षा और तापमान दोनों के पैटर्न बदल गए हैं। कम बारिश से खेती प्रभावित हो रही है, जबकि बढ़ते तापमान के कारण जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं।
विशेषज्ञों ने किसानों को खेतों के किनारे पेड़ लगाने, वर्षा जल संचयन और नमी बनाए रखने के उपाय अपनाने की सलाह दी है। उनका कहना है कि आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में वनों की कटाई सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है, क्योंकि पेड़ों के खत्म होने से भूमि का स्वरूप बदलता है और सतही तापमान बढ़ता है। जंगल घटने पर अधिक गर्मी फँसती है, जिससे सूखा और हीटवेव्स और भी गंभीर हो सकती हैं।
वन्यजीवों पर मंडराता खतरा
“टाइगर स्टेट” कहलाने वाले मध्य प्रदेश में वनों की कटाई ने वन्यजीव अभयारण्यों को भी गंभीर नुकसान पहुँचाया है। सबसे बड़ा असर वन्यजीव कॉरिडोर के टूटने के रूप में सामने आया है।1990 से 2015 के बीच कान्हा-पेंच लैंडस्केप के महत्वपूर्ण कॉरिडोर या तो खेती में बदल दिए गए या इतने खराब हो गए कि दोनों टाइगर रिजर्व के बीच संपर्क बाधित होने लगा। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएँ बढ़ीं।
मारवटोला-VII कोल ब्लॉक का क्षेत्र बांधवगढ़-अचानकमार वन्यजीव कॉरिडोर से सटा हुआ है, जो बाघ, तेंदुआ, स्लॉथ भालू और चीतल जैसे वन्यजीवों का आवास है। वहीं ताडोबा-पेंच-कान्हा कॉरिडोर, जो मध्य प्रदेश को महाराष्ट्र से जोड़ता है, खनन गतिविधियों के कारण विशेष खतरे में माना जा रहा है।
यहाँ तक कि चंबल नदी में हो रहा रेत खनन भी जलीय जीवों के लिए खतरा बन चुका है।हालाँकि मध्य प्रदेश में सोने का खनन अभी शुरुआती या नीलामी चरण में है, लेकिन कोयला और अन्य खनन परियोजनाओं का जो पैटर्न राज्य में पहले से दिख चुका है — बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई, आदिवासियों का विस्थापन और नियमों के उल्लंघन — उसने यह आशंका बढ़ा दी है कि सोने के खनन के विस्तार से राज्य के विशाल वन क्षेत्रों पर और गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

