
मुंबई से पुणे तक बदला सत्ता संतुलन, वंशवाद पर संगठन की शक्ति भारी
महाराष्ट्र निकाय चुनावों में महायुति ने मुंबई और पुणे में जीत दर्ज कर ठाकरे और पवार परिवारों के पारंपरिक गढ़ों में सत्ता संतुलन बदल दिया।
Maharashtra civic polls Results: महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने राज्य की राजनीति में एक बड़ा संदेश दिया है। शुक्रवार (16 जनवरी) को आए परिणामों में दो सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों मुंबई में ठाकरे और पुणे में पवार को करारा झटका लगा है। BJP के नेतृत्व वाली महायुति ने इन पारंपरिक गढ़ों में शानदार जीत दर्ज कर सत्ता संतुलन को पूरी तरह बदल दिया है।
करीब तीन दशक तक बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) पर राज करने वाली अविभाजित शिवसेना का वर्चस्व टूट गया। BJP न सिर्फ BMC में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, बल्कि पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में भी उसने दोनों NCP गुटों के गठबंधन को पीछे छोड़ दिया। 2025–26 के लिए 74,427 करोड़ रुपये के भारी-भरकम बजट वाली BMC पर अब BJP-एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना का स्पष्ट नियंत्रण नजर आ रहा है।
ठाकरे गढ़ में सेंध, रणनीति भारी पड़ी
मुंबई के नतीजों ने शिवसेना (UBT) की सांगठनिक कमजोरी और रणनीतिक चूकों को उजागर कर दिया। कभी BMC की स्वाभाविक सत्ताधारी मानी जाने वाली शिवसेना को BJP-महायुति ने बूथ-स्तरीय मजबूती, वोटों के ध्रुवीकरण और स्पष्ट नेतृत्व नैरेटिव के दम पर पीछे छोड़ दिया।
उद्धव ठाकरे द्वारा राज ठाकरे से गठबंधन का दांव उल्टा पड़ गया। मराठी वोटों के एकीकरण और बाल ठाकरे की विरासत को भुनाने की रणनीति, राज ठाकरे के उत्तर भारतीयों और मुसलमानों के खिलाफ पुराने बयानों के कारण नुकसानदेह साबित हुई। इससे न केवल गैर-मराठी मतदाता दूर हुए, बल्कि मुस्लिम वोटर भी असमंजस में पड़ गए। अल्पसंख्यक वोट कांग्रेस, AIMIM, समाजवादी पार्टी और NCP के विभिन्न गुटों में बंट गया। उद्धव ठाकरे को इसका सीमित लाभ ही मिला, जिसने चुनावी समीकरण बदल दिए।
BJP की सधी हुई चाल
दूसरी ओर BJP ने गैर-मराठी वोटों को मजबूती से एकजुट किया और एकनाथ शिंदे के साथ मिलकर मराठी वोट बैंक में भी सेंध लगाई। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विकास और हिंदुत्व के संतुलित चेहरे के रूप में खुद को पेश कर व्यापक समर्थन हासिल किया। ठाकरे भाइयों को यह अंतर पाटने का समय मिला, लेकिन वे काफी देर से सक्रिय हुए।
पुणे-पिंपरी: पवार नाम का असर कम
पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ के नतीजों ने यह साफ कर दिया कि शहरी राजनीति में अब सिर्फ पवार उपनाम चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त नहीं रहा। शरद पवार और अजित पवार गुटों के सीमित तालमेल के बावजूद मतदाता उस तरह एकजुट नहीं हुए, जैसी उम्मीद की जा रही थी।
पुणे में BJP ने स्पष्ट बढ़त बना ली। तेजी से बढ़ता मध्य वर्ग, नए मतदाता और अपार्टमेंट संस्कृति वाले शहरी मतदाता अब विरासत की बजाय शासन, बुनियादी ढांचे और राष्ट्रीय राजनीति के मुद्दों को प्राथमिकता दे रहे हैं। पवार खेमे का अभियान इस बदलाव को समझने और प्रभावी शहरी विज़न पेश करने में नाकाम रहा।
पिंपरी-चिंचवड़ में भी दरार
अजित पवार का गढ़ माने जाने वाले पिंपरी-चिंचवड़ में भी BJP ने मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। यह नतीजा इस बात का संकेत है कि व्यक्तिगत प्रभाव तब तक कारगर नहीं होता, जब तक संगठनात्मक एकजुटता और स्पष्ट राजनीतिक संदेश न हो। पवार परिवार के बीच अधूरा और अस्पष्ट मेल-मिलाप भी नुकसानदेह साबित हुआ। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता बंटे रहे, जिससे मतदाताओं में भ्रम पैदा हुआ। इसके उलट, BJP ने मजबूत संगठन, स्पष्ट संदेश और लंबे समय से तैयार शहरी नेटवर्क के सहारे निर्णायक बढ़त हासिल की।
इन चुनावों ने महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में एक नया संकेत दिया है अब वंशवाद नहीं, बल्कि संगठन, रणनीति और सुशासन की बात निर्णायक भूमिका में है। ठाकरे और पवार परिवारों के लिए यह आत्ममंथन का वक्त है जबकि BJP-महायुति ने खुद को शहरी सत्ता की नई धुरी के रूप में स्थापित कर लिया है।

