महाराष्ट्र निकाय चुनाव: बीजेपी की जीत अधूरी? विपक्ष के लिए उम्मीद बाकी
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महाराष्ट्र निकाय चुनाव: बीजेपी की जीत अधूरी? विपक्ष के लिए उम्मीद बाकी

महाराष्ट्र के निकाय चुनाव साफ संकेत देते हैं कि बीजेपी की ताकत उसकी लोकप्रियता से ज्यादा विपक्ष की कमजोरी में छिपी है। बिखरा हुआ विपक्ष, नेतृत्व संघर्ष और संगठनात्मक कमी बीजेपी को बढ़त दिला रही है।


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पहली नजर में महाराष्ट्र के निकाय चुनाव नतीजे भारतीय जनता पार्टी (BJP) की बड़ी जीत और उसके विरोधियों की करारी हार जैसे लगते हैं। लेकिन अगर नतीजों को थोड़ा गहराई से देखा जाए तो तस्वीर इतनी सीधी नहीं दिखती। 16 जनवरी को घोषित परिणामों के बाद जहां बीजेपी खेमे में जश्न का माहौल है, वहीं कई ऐसे संकेत भी हैं, जो पार्टी और उसके सहयोगियों के लिए सावधानी की घंटी बजाते हैं। असल चिंता बीजेपी से ज्यादा उसके सहयोगियों एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी के लिए है। महायुति की जीत के बावजूद इन दलों का भविष्य फिलहाल अनिश्चित नजर आ रहा है।

BJP का जबरदस्त विस्तार

पिछले 15 वर्षों में बीजेपी ने महाराष्ट्र की स्थानीय राजनीति में लंबी छलांग लगाई है। 2009 से 2013 के बीच जहां पार्टी के पास करीब 300 पार्षद थे, वहीं अब उसके खाते में 1,425 पार्षद हैं। यह संख्या राज्य की 29 नगर निगमों की कुल 2,869 सीटों का लगभग आधा हिस्सा है। कभी अविभाजित शिवसेना की सहयोगी रही बीजेपी ने 2022 में शिवसेना विभाजन के बाद अपनी स्थिति और मजबूत की। आज पार्टी 29 में से 13 नगर निगमों में अपने दम पर बहुमत में है।

BMC में सत्ता, लेकिन सहयोगियों पर दबाव

छह अन्य नगर निगमों में, जिनमें देश का सबसे अमीर नगर निकाय बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC)—भी शामिल है, बीजेपी ने सहयोगियों के साथ मिलकर सत्ता हासिल की है। करीब 75,000 करोड़ रुपये के बजट वाली BMC पर नियंत्रण रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। लेकिन यहां बीजेपी के छोटे सहयोगी अब या तो निगले जाने या हाशिए पर धकेले जाने के डर से जूझ रहे हैं।

हार के बावजूद ‘ब्रांड ठाकरे’ कायम

मुंबई में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने पुराने मतभेद भुलाकर शिव शक्ति गठबंधन बनाया। भले ही वे BMC में महायुति को रोक नहीं पाए, लेकिन नतीजों ने साफ कर दिया कि मराठी मतदाताओं के बीच ‘ठाकरे ब्रांड’ अब भी जीवित है। शिव शक्ति गठबंधन ने 2017 में अविभाजित शिवसेना की 84 सीटों में से करीब 50 सीटें बचा लीं। यह दिखाता है कि पुराने शिवसेना गढ़ों में न तो शिंदे गुट पूरी तरह असर जमा पाया और न ही बीजेपी। अगर शिवसेना विभाजित न होती तो ठाकरे खेमे की कुल सीटें 2017 के आंकड़े से भी ज्यादा हो सकती थीं।

बंटी हुई विपक्षी एकता का नुकसान

BMC में महायुति की जीत का बड़ा कारण विपक्ष की बिखरी हुई रणनीति रही। अगर कांग्रेस, शिवसेना (UBT) और शरद पवार की एनसीपी (SP) ने राज ठाकरे की MNS को साथ लिया होता तो नतीजे बिल्कुल अलग हो सकते थे। फिलहाल शिव शक्ति गठबंधन (71), कांग्रेस (24), समाजवादी पार्टी (2) और एनसीपी (SP) (1) मिलकर 98 सीटों पर हैं, जो महायुति के 121 सीटों से ज्यादा दूर नहीं है।

महायुति में सब कुछ ठीक नहीं

BJP की BMC में जीत को केवल विकास या भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडे का समर्थन कहना अधूरा सच होगा। 2017 के मुकाबले बीजेपी की सीटें सिर्फ 82 से बढ़कर 89 हुई हैं। असली फायदा विपक्ष के वोट बंटवारे से हुआ। राज्य में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच अगर बीजेपी ने सहयोगियों पर ज्यादा दबाव बनाया तो शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी अपने-अपने मूल दलों की ओर लौटने का रास्ता भी चुन सकते हैं।

कांग्रेस की हार, लेकिन पूरी तरह पराजय नहीं

मुंबई से बाहर कांग्रेस का प्रदर्शन कमजोर जरूर रहा, लेकिन इसे पूरी तरह ‘सफाया’ नहीं कहा जा सकता। पार्टी ने 27 नगर निगमों में 324 पार्षद जीते। लातूर में कांग्रेस को बहुमत मिला और भिवंडी, चंद्रपुर, परभणी और कोल्हापुर में वह सबसे बड़ी पार्टी बनी। कम सीटों पर चुनाव लड़ना, संसाधनों की कमी और संगठनात्मक कमजोरियां कांग्रेस के लिए चुनौती जरूर हैं, लेकिन सुधार की गुंजाइश अभी भी बाकी है।

AIMIM का बढ़ता असर

इस चुनाव में AIMIM की बढ़त कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए चिंता का विषय है। पार्टी ने राज्यभर में 125 सीटें जीतीं, जो 2017 के मुकाबले बड़ी बढ़ोतरी है। मुंबई से लेकर मराठवाड़ा और विदर्भ तक मुस्लिम बहुल इलाकों में AIMIM का मजबूत होना विपक्षी दलों की कमजोर नेतृत्व क्षमता को उजागर करता है।

असली नुकसान में पवार परिवार

इन नतीजों के असली नुकसान में शरद पवार और अजित पवार की एनसीपी दिख रही है। लोकसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन के बाद भी विधानसभा, पंचायत और अब निगम चुनावों में पार्टी लगातार कमजोर हुई है। पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में बीजेपी को रोकने के लिए दोनों पवारों का साथ आना भी जनता को रास नहीं आया। दोनों गुटों की साख को गहरा झटका लगा है।

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