
अजित पवार के बिना महायुति: फडणवीस और शिंदे के सामने नई चुनौती
Maharashtra politics: ‘दादा’ के नाम से लोकप्रिय अजित पवार के गुणों का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है। वे एक व्यावहारिक राजनेता थे, जो कांग्रेस, शिवसेना और बीजेपी—तीनों के साथ काम करने में सक्षम थे।
Ajit Pawar demise: महाराष्ट्र की सियासत में कुछ रिश्ते सत्ता से नहीं, संतुलन से चलते हैं। अजित पवार ऐसे ही एक नेता थे, जो पर्दे के पीछे रहकर सरकारों को स्थिर रखते थे और गठबंधनों की दरारों को भरते थे। उनके अचानक चले जाने से न सिर्फ एक अनुभवी राजनेता का अंत हुआ है, बल्कि महायुति की राजनीति की वह धुरी भी हिल गई है, जिस पर देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के बीच का संतुलन टिका था। इसकी बानगी तब देखने को मिली, जब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने गहरा शोक जाहिर किया। उन्होंने कहा कि “व्यक्तिगत रूप से मैंने एक मजबूत और बड़े दिल वाले दोस्त को खो दिया है।”
अजित पवार और फडणवीस के बीच वैचारिक मतभेदों के बावजूद अच्छा तालमेल और मजबूत कार्य संबंध रहे। एनसीपी और बीजेपी अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियां होने के बावजूद दोनों नेताओं ने मिलकर काम किया। अब पवार के निधन से सत्तारूढ़ महायुति में उथल-पुथल की आशंका है, क्योंकि फडणवीस ने एक ऐसे बहुमुखी नेता को खो दिया है, जो गठबंधन के दूसरे सहयोगी शिवसेना के एकनाथ शिंदे जैसे कड़े मोलभाव करने वाले नेता को संतुलन में रखते थे।
‘दादा’ के नाम से लोकप्रिय अजित पवार के गुणों का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है। वे एक व्यावहारिक राजनेता थे, जो कांग्रेस, शिवसेना और बीजेपी—तीनों के साथ काम करने में सक्षम थे। पवार का असमय निधन फडणवीस के लिए बड़ा झटका है। 2019 में दोनों ने तड़के सुबह सरकार बनाने की शपथ लेकर सबको चौंका दिया था, तभी से उनके बीच करीबी संबंध बने रहे।
72 घंटे की सरकार
हालांकि, वह सरकार सिर्फ 72 घंटे चली। इसके बाद अजित पवार उद्धव ठाकरे सरकार में उपमुख्यमंत्री बने और फडणवीस विपक्ष में चले गए। इसके बावजूद दोनों के बीच कोई कड़वाहट नहीं रही। बाद में फडणवीस ने खुद कहा था कि भले ही वह कदम एक गलती थी, लेकिन उन्हें उसका पछतावा नहीं है। 2023 में पवार-फडणवीस की जोड़ी फिर साथ आई, जब बारामती के नेता अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार के खिलाफ बगावत कर एनसीपी को विभाजित किया। उनकी गुटीय एनसीपी सरकार में शामिल हुई और अजित पवार उपमुख्यमंत्री बने रहे। यह वही दौर था जब 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना में बगावत कर उद्धव ठाकरे सरकार को गिरा दिया था।
2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद असली परीक्षा का समय आया। महायुति को स्पष्ट जनादेश मिलने के बावजूद मुख्यमंत्री पद को लेकर तनाव पैदा हो गया, क्योंकि एकनाथ शिंदे ने कड़ा रुख अपनाया। 2024 के राजनीतिक घटनाक्रम की एक यादगार तस्वीर फडणवीस, पवार और शिंदे की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस रही, जिसमें ताकत का प्रदर्शन किया गया। हालांकि अंदरूनी खींचतान साफ नजर आ रही थी। जब शिंदे ने सरकार में शामिल होने को लेकर पत्रकारों के सवालों पर टालमटोल की, तब अजित पवार ने आगे बढ़कर बीजेपी-नेतृत्व वाले गठबंधन को स्थिर करने के लिए एनसीपी के बिना शर्त समर्थन की घोषणा कर दी।
शिंदे ने कहा कि शाम तक इंतजार कीजिए। इस पर पवार ने चुटकी लेते हुए कहा कि शाम तक शिंदे के बारे में पता चल जाएगा। मैं शपथ ले लूंगा, इंतजार नहीं करूंगा। आखिरकार शिंदे मान गए और चुनाव परिणामों के दो सप्ताह बाद देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। पिछले एक वर्ष में पश्चिमी महाराष्ट्र की सहकारी राजनीति से उभरे अजित पवार ने कृषि, जल संसाधन और ग्रामीण विकास जैसे अहम क्षेत्रों में फडणवीस सरकार की नीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अब अजित पवार के निधन और एनसीपी में किसी अन्य मजबूत शीर्ष नेता की कमी के चलते फडणवीस को अकेले ही एकनाथ शिंदे से निपटना होगा। पवार ही वह एकमात्र दबाव बिंदु थे, जिसके सहारे बीजेपी शिवसेना के इस मजबूत नेता को संतुलित रख पाती थी। इसका ताजा उदाहरण बीएमसी और अन्य नगर निगम चुनाव हैं। स्पष्ट जनादेश के बावजूद बीजेपी-शिवसेना गठबंधन अब तक मेयर पद पर फैसला नहीं कर पाया है। माना जा रहा है कि इसकी वजह शिंदे का कड़ा रुख और मेयर पद के लिए रोटेशन की मांग है। चुनाव परिणामों के बाद शिंदे ने 29 नवनिर्वाचित बीएमसी पार्षदों को दो दिनों के लिए मुंबई के एक रिसॉर्ट में ले जाकर सभी को चौंका दिया था।
अब अजित पवार जैसे मजबूत एनसीपी नेता की अनुपस्थिति में एकनाथ शिंदे का प्रभाव बढ़ेगा और सरकार में उनकी आवाज और मजबूत होगी। यह स्थिति फडणवीस के लिए असहज हो सकती है और उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति के इस नए यथार्थ—अजित पवार के बिना महायुति—से सावधानीपूर्वक निपटना होगा।

