पोखर में डूबती उम्मीदें, मखाना खेती में मेहनत ज्यादा, आमदनी कम
x

पोखर में डूबती उम्मीदें, मखाना खेती में मेहनत ज्यादा, आमदनी कम

बिहार के सीमांचल में मखाना किसान छह महीने पानी में मेहनत करते हैं, पर ठेकेदारी व्यवस्था और गिरते दामों से उनकी आमदनी बेहद कम रह जाती है।


डेढ़ लाख में एक पोखर खरीदता हूं। मखाना या जिसे लोग लावा भी कहते हैं उसकी फसल लगाता हूं। करीब 6 महीने तक मेहनत करता हूं और सीजन के खत्म होने पर कुल बचत करीब 25 हजार रुपए की होती है। कुछ इस तरह से मखाना की खेती करने वाले देवसुंदर कुमार अपनी बात रखते हैं। देवसुंदर जब मखाने की गुणा गणित समझा रहे थे तो जेहन में एक सवाल कौंधा कि आम किसान जो इस फसल से जुड़े हैं उनका क्या कुछ कहना है। अब जब बात मखाने की हो रही है तो बिहार के उन इलाकों की तस्वीर उभरने लगती है जिसे मोटे तौर पर सीमांचल के नाम से जाना जाता है। सीमांचल में कटिहार, पूर्णिया, अररिया, सुपौल,सहरसा और मधेपुरा को मखाने का गढ़ माना जाता है।

द फेडरल की टीम महागठबंधन के वोटर अधिकार यात्रा अपने कैमरे में कैद कर रही थी। लोगों से उनके मिजाज को समझने की कोशिश कर रही थी। लेकिन सड़क किनारे पोखर और उसमें लगी फसल ने उनके बीच जाने के लिए मजबूर किया जिनकी कमरतोड़ मेहनत हमारेकिचन और डाइनिंग का हिस्सा बनते हैं। उनके जरिए बनाए मखाने का इस्तेमाल रोजमर्रा या मेहमानों-रिश्तेदारों की आवभगत में करते हैं।मखाने की खेती का नजारा लेते हुए हुए द फेडरल की टीम आगे बढ़ रही थी। हमारे ठीक आगे एक टेंपो में बांस की बनी कुछ टोकरियां और लोग नजर आए। हमने उनकी टेंपो को रोका और पूछा कि भइया क्या करते हो जवाब मिला मखाने की खेती। यह सोने पर सुहागे की तरह था। ऐसा लगा कि मन में जितने सवाल हैं उनके जवाब मिल जाएंगे।



(पोखर से मखाना के बीज को निकाला जाता है।)

टेंपो सवार मखाना के किसान पश्चिम बंगाल के दालखोला जा रहे थे। हमने पूछा कि दालखोल क्यों तो जवाब मखाने की खेती का काम मिला है। मन में फिर सवाल कि जब मखाने की खेती कटिहार और पूर्णिया के इलाके में हो रही है तो पश्चिम बंगाल जाने की क्या जरूरत है। इस सवाल का जवाब देते हुए अपने दूसरे साथियों की तरफ इशारा करते हुए ज्ञानू महालदार ने कहा, " साहब वहां पैसे कुछ अधिक मिल रहे हैं, परिवार को चलाना है और यही सीजन है जब कमाई ठीकठाक हो जाती है, लिहाजा वहां जा रहे हैं। इस जवाब के तुरंत बाद उनके साथी रमेश कुमार विस्तार से बताते हैं कि मखाने की खेती में किस तरह की दिक्कत- परेशानी है।

रमेश कुमार कहते हैं," देखिए जी सीजन में यानी 6 से 7 महीने तक हम लोग हर रोज पानी में पांच से 6 घंटे रहते हैं। औसतन 10 किलोग्राम के करीब मखाने को निकालते हैं। लेकिन फसल का मालिक हमें 50 रुपए प्रति किलो की दर से भुगतान करता है। सबसे बड़ी बात यह है कि हर एक दस किलो पर भुगतान सिर्फ पांच किलो का होता है यानी कि हर रोज कमाई 250 रुपए होती है। रमेश कुमार से जब बात हो रही थी उनके एक सहयोगी सुरेंद्र के हाथों और पैरों पर पड़ी। पांव में सड़न और हाथों में कांटों के निशान नजर आ रहे थे। द फेडरल ने पूछा कि यह सब कैसे हुआ। इस सवाल के जवाब में सुरेंद्र कहते हैं कि साहब जब पानी में कोई भी शख्स पांच से 6 घंटे हर रोज रहेगा तो और क्या होगा। उनकी बातों पर रमेश कहते हैं कि सर यही जिंदगी है।


(मखाना के बीज को चालने की प्रक्रिया)

इन किसानों के जवाब पर द फेडरल की टीम ने पूछा कि क्या आपको मखाना बोर्ड के बारे में जानकारी है। इस सवाल पर ज्ञानू महालदार ने कहा "साहब हमने भी कुछ सुना है। लेकिन आम किसानों को कहां उसका फायदा मिलता है। सरकार कहती है कि तस्वीर बदल देंगे लेकिन तस्वीर तो बदली नहीं, हमें लगता है कि सीजन भर काम मिलता रहे, घर परिवार को चलाना आसान हो जाएगा। हां, हम लोगों को इंतजार रहेगा कि मखाना बोर्ड से हमारी जिंदगी में कुछ बदलाव नजर आए। दिल को झकझोरने वाली इन बातों को सुन हम पूर्णिया के रानीपतरा इलाके पहुंचे जहां पोखर में किसान मखाना निकालते हुए मिले। यहां पर एक किसान प्रवीण उरांव ने कहा, "साहब परेशानी तो है लेकिन हम लोग कमजोर नहीं हैं, इसे अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया है। उनकी इन बातों पर हमने सवाल किया कि आप हर एक दिन कितना कमाते हैं, जवाब था कि एक हजार रुपए। उनका यह जवाब थोड़ा हैरान कर गया। हमने पूछा कि अभी कुछ और किसान मिले थे वो 250 रुपए की बात कर रहे थे, इतना सुनते ही प्रवीण उरांव कहते हैं कि साहब यह सबकुछ फसल के ठेकेदार पर भी निर्भर करता है। संयोग से फसल के एक ठेकेदार देवसुंदर कुमार भी थे जिन्होंने पूरी गणित समझाई।


(मखाना के बीज को सुखाकर और भट्टी में तपाकर लावा निकाला जाता है।)

देवसुंदर कुमार कहते हैं, " किसानों को पहले मेहनताना कम मिलता था। लेकिन अब ऐसी तस्वीर नहीं है। उदाहरण के साथ बताते हैं कि एक सामान्य पोखर जिसमें 6 से सात क्विंटल लावा 6 से 7 महीने में निकलता है उसके लिए उन्हें पोखर मालिक को डेढ़ लाख अदा करना पड़ता है। लेकिन यह रकम पोखर के आकार से बढ़ती जाती है। अब अगर मखाना निकालने वालों की कमी होती है तो मेहनताना बढ़ जाता है,संख्या अधिक होने पर मेहनताना कम। यानी कि यहां डिमांड सप्लाई का सिद्धांत काम करता है। फिर भी इसे और व्यवस्थित करने की जरूरत है।

देवसुंदर कुमार से बातचीत के बाद हमारी मुलाकात रुपेश महालदार और उनकी पत्नी जूली से हुई। मखाने पर हमारा सवाल कमोबेश वही थे। रुपेश महालदार कहते हैं, " देखिए इस धंधे में अलग अलग तरह की मुश्किल है, यह श्रमसाध्य है, इस समय बाजार में मखाने का भाव गिरा हुआ है। पिछले सीजन में एक हजार रुपए प्रति किलो के भाव से मखाना बेचा था। लेकिन इस दफा थोक बाजार में यह भाव 750 रुपए प्रति किलो है। वो भाव के चढ़ने का इंतजार कर रहे हैं। सवाल जवाब के इस क्रम में रुपेश की पत्नी जूली ने कहा, " सर, मखाने का काम कितना मुश्किल भरा है इसे आप ऐसे समझिए। हर रोज तड़के चार बजे से काम शुरू होता है और रात 9 बजे तक चलता है। इसके अलावा और कोई काम नहीं है। जहां तक घर चलाने का सवाल है तो इतनी आमदनी हो जाती है। लेकिन एक बेहतर जिंदगी के लिए पर्याप्त नहीं है। जहां तक सरकारी योजनाओं का सवाल है उसका कुछ ही हद तक फायदा मिल पाता है। दरअसल यहां के लोग उतने पढ़े लिखे नहीं हैं, बड़े ठेकेदार और व्यापारी जो बताते हैं उसे मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।


(रुपेश कुमार और उनकी पत्नी जूली मखाना का कारोबार करते हैं)

मखाना खेती में संघर्ष की यह कहानी अकेले ज्ञानू, रमेश, सुरेंद्र, रुपेश कुमार की नहीं है। अलग अलग नाम से इनकी संख्या लाखों में है। केंद्र की सरकार या बिहार राज्य की सरकार या अलग अलग राजनीतिक दल बेहतरी के वादों के साथ दावे भी करते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। मखाना की खेती करने वाले किसानों को परेशानियों के बीच उम्मीद है कि एक ना एक दिन वो समय जरूर आएगा जब उनके दिमाग में सुकून और चेहरे पर खुशी का भाव होगा।

Read More
Next Story