SC में चुनाव आयोग पर ममता का हमला, बोलीं—न्याय बंद दरवाजों के पीछे रो रहा
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SC में चुनाव आयोग पर ममता का हमला, बोलीं—न्याय बंद दरवाजों के पीछे रो रहा

मतदाता सूची के SIR को लेकर ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाया। SC ने EC को नोटिस जारी किया, अगली सुनवाई 9 फरवरी को होगी।


पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार (4 फरवरी) दोपहर सुप्रीम कोर्ट में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अदालत में चुनाव आयोग (EC) पर तीखा हमला बोला। वह अपने चुनाव-पूर्व राज्य में मतदाता सूचियों के विवादास्पद विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को चुनौती देने के लिए अदालत पहुंची थीं। इस मामले की अगली सुनवाई सोमवार (9 फरवरी) को होगी।

तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी राष्ट्रीय राजधानी में इस प्रक्रिया को चुनौती देने आई हैं, जिसे उनकी पार्टी ने आगामी चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को फायदा पहुंचाने के लिए की जा रही “राजनीतिक प्रतिशोध” करार दिया है। ममता ने CJI से अपनी बात रखने के लिए पांच मिनट का समय मांगा, जिस पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने उन्हें 15 मिनट दिए।

ममता ने अदालत में कहा,

“सर, समस्या यह है कि आखिरकार हमें कहीं भी न्याय नहीं मिल रहा है। मैंने चुनाव आयोग को छह बार लिखा, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला। न्याय बंद दरवाजों के पीछे रो रहा है।”

धीरे-धीरे उनकी शिकायत चुनाव आयोग के खिलाफ सीधे हमले में बदल गई। गौरतलब है कि वह सोमवार (2 फरवरी) को आयोग के शीर्ष अधिकारियों से भी मिली थीं, लेकिन वहां से भी उन्हें निराशा हाथ लगी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने, रिपोर्ट्स के मुताबिक, ममता की याचिका को वास्तविक बताते हुए कहा कि हर समस्या का समाधान संभव है। सुप्रीम कोर्ट ने ममता की याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस भी जारी किया।

सुप्रीम कोर्ट में ममता ने क्या कहा

मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया का एकमात्र उद्देश्य मतदाताओं के नाम हटाना है। उन्होंने कहा कि शादी के बाद ससुराल जाने वाली महिलाओं के नाम, उपनाम बदलने के कारण हटाए जा रहे हैं। इसी तरह, गरीब लोगों के नाम भी केवल इसलिए काटे जा रहे हैं क्योंकि उन्होंने अपना पता बदला है।

ममता के अनुसार, पश्चिम बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जो प्रक्रिया सामान्य तौर पर दो साल में पूरी होती है, उसे सिर्फ दो महीने में जल्दबाजी में लागू किया जा रहा है, जिससे आम लोगों को भारी परेशानी हो रही है।

“मैं यहां पार्टी के लिए नहीं, बल्कि लोगों के अधिकारों के लिए आई हूं,” ममता ने कहा और CJI से लोकतंत्र को बचाने की अपील की।

उन्होंने आगे कहा,

“SIR प्रक्रिया सिर्फ नाम काटने के लिए है। मान लीजिए शादी के बाद बेटी ससुराल चली जाती है, तो सवाल उठता है कि वह पति का सरनेम क्यों इस्तेमाल कर रही है। गरीब लोग कभी फ्लैट खरीदते हैं, कभी शिफ्ट होते हैं, और उनके नाम हटा दिए जाते हैं। चुनाव आयोग ने आपके आदेश का उल्लंघन किया है और इसे गलत मैपिंग बताया है।”

‘असम क्यों नहीं?’

ममता ने सवाल उठाया कि आधार कार्ड होने के बावजूद लोगों से अतिरिक्त प्रमाणपत्र क्यों मांगे जा रहे हैं।

“अन्य राज्यों में डोमिसाइल या जाति प्रमाणपत्र नहीं मांगे जाते, लेकिन चुनाव के ठीक पहले केवल पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया गया। जो काम दो साल में होता है, उसे दो महीने में करने की कोशिश की गई। जब लोग बाहर थे, तब यह सब किया गया,” उन्होंने कहा।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) पर अत्यधिक दबाव डाला गया, जिससे कुछ ने आत्महत्या तक कर ली, और इसके लिए चुनाव अधिकारियों को दोषी ठहराया गया। ममता ने पूछा, “अगर बंगाल में यह हो रहा है, तो असम में क्यों नहीं?”

मुख्यमंत्री ने यह भी दावा किया कि निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों की भूमिका को दरकिनार कर दिया गया है और BJP शासित राज्यों से माइक्रो ऑब्जर्वर्स नियुक्त किए गए हैं ताकि नाम हटाए जा सकें।

“पहले चरण में ही 58 लाख नाम काट दिए गए, कई लोगों को मृत घोषित कर दिया गया। यह चुनाव आयोग नहीं, बल्कि ‘व्हाट्सऐप आयोग’ है,” ममता ने तंज कसते हुए कहा।

दिसंबर 2025 में प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची में SIR के पहले चरण में 58 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए थे।

गौरतलब है कि 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले भी चुनाव आयोग ने SIR कराया था। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल फेडरेशन फॉर इंडियन वूमन समेत कई संगठनों ने इसकी वैधता को चुनौती दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से रोक न मिलने के कारण आयोग ने प्रक्रिया जारी रखी।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

नामों में कथित गड़बड़ी की शिकायत पर CJI सूर्यकांत ने बंगाल सरकार को सलाह दी कि वह बंगाली भाषा में दक्ष अधिकारियों की एक टीम आयोग को उपलब्ध कराए, ताकि नामों के मिलान की समस्या को सुलझाया जा सके।

“उन्हें एक दिन का समय दीजिए,” उन्होंने कहा।

साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को “वास्तविक मतदाताओं” के नाम न हटाने की चेतावनी दी।

CJI ने कहा,

“एक उद्देश्य मृत लोगों के नाम हटाना है, दूसरा अयोग्य लोगों को हटाना, लेकिन प्रवासी या वास्तविक व्यक्ति सूची में बने रहने चाहिए। सिर्फ नामों की गलती के कारण किसी bona fide व्यक्ति को बाहर नहीं किया जा सकता। पूरी प्रक्रिया की एक समयसीमा है। हमने इसे 10 दिन बढ़ाया था और अब सिर्फ चार दिन बचे हैं। हम एक हफ्ते की अतिरिक्त मोहलत नहीं दे सकते। अगर रॉय, दत्ता गांगुली जैसे नाम छूट रहे हैं, या टैगोर के उच्चारण में फर्क है, तो इसका मतलब यह नहीं कि टैगोर टैगोर नहीं है।”

इस तरह, ममता बनर्जी की तीखी दलीलों और सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बीच, पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर सियासी और संवैधानिक टकराव और गहरा गया है।

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