
आरएन रवि का तबादला बना बहस का केंद्र, ममता बनर्जी उठाया परंपरा का मुद्दा
ममता बनर्जी ने आरएन रवि के तबादले से पहले परामर्श न होने पर आपत्ति जताई। विवाद ने राज्यपाल नियुक्ति से जुड़ी संवैधानिक परंपराओं और संघीय ढांचे की बहस फिर छेड़ दी।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने 5 मार्च 2026 को यह शिकायत की कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि (R. N. Ravi) को उनके राज्य में स्थानांतरित करने से पहले उनसे कोई परामर्श नहीं किया। ममता बनर्जी ने इसे स्थापित परंपरा का उल्लंघन बताया। उन्होंने कहा, “इस संबंध में प्रचलित परंपरा के अनुसार उन्होंने मुझसे कोई सलाह-मशविरा नहीं किया। इस तरह की कार्रवाई भारत के संविधान की भावना को कमजोर करती है और हमारे संघीय ढांचे की नींव पर चोट करती है।”
उनकी यह आपत्ति भारतीय संवैधानिक कानून के एक पुराने लेकिन अनसुलझे सवाल को सामने लाती है—संवैधानिक परंपरा (कन्वेंशन) कब एक बाध्यकारी नियम बन जाती है, कब उसका उल्लंघन माना जाता है और यदि ऐसा हो तो उसके खिलाफ क्या किया जा सकता है?
संवैधानिक परंपरा क्या होती है?
संवैधानिक परंपराओं की क्लासिक व्याख्या ब्रिटिश विद्वान A. V. Dicey की किताब Introduction to the Study of the Law of the Constitution (1885) में मिलती है। डाइसी ने “संविधान के कानून” और “संविधान की परंपराओं” के बीच स्पष्ट अंतर बताया था।
उनके अनुसार संविधान का कानून वह है जिसे अदालतें लागू कर सकती हैं, जबकि संवैधानिक परंपराएं वे व्यवहार और समझ होती हैं जो संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के आचरण को नियंत्रित करती हैं, लेकिन उन्हें अदालतें सीधे लागू नहीं करतीं। बाद में विद्वान Ivor Jennings ने इस सिद्धांत को और स्पष्ट किया और तीन सवालों के जरिए किसी परंपरा की पहचान करने का तरीका बताया:
क्या इस प्रथा का कोई उदाहरण या परंपरा मौजूद है?
क्या संबंधित लोग मानते थे कि वे इस नियम के पालन के लिए बाध्य हैं?
क्या इस नियम के पीछे कोई ठोस कारण है?
जेनिंग्स ने यह भी कहा कि यदि किसी परंपरा के पीछे मजबूत कारण हो तो केवल एक उदाहरण भी उसे स्थापित करने के लिए पर्याप्त हो सकता है।
राज्यपाल नियुक्ति में परामर्श की परंपरा
ममता बनर्जी जिस परंपरा का हवाला दे रही हैं कि किसी राज्य में राज्यपाल की नियुक्ति या तबादले से पहले मुख्यमंत्री से परामर्श किया जाना चाहिए वह जेनिंग्स की कसौटी पर काफी हद तक खरी उतरती है।
इस नियम का मुख्य कारण संघीय व्यवस्था की रक्षा है। यदि केंद्र सरकार राज्य की भागीदारी के बिना राज्यपाल नियुक्त करती है, तो इससे राज्य सरकारें केंद्र द्वारा नियुक्त प्रतिनिधियों की मात्र प्राप्तकर्ता बनकर रह जाती हैं।ऐसे कई उदाहरण भी हैं जब राज्यपाल की नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री से परामर्श किया गया। हालांकि कई बार, खासकर विपक्ष शासित राज्यों में, इस परंपरा का उल्लंघन भी हुआ है।
कई आयोगों ने दी यही सिफारिश
लगातार चार संवैधानिक आयोगों ने भी इस परंपरा का समर्थन किया है। इनमें शामिल हैं:
Sarkaria Commission (1988)
Venkatachaliah Commission (2002)
Punchhi Commission (2010)
Kurian Joseph Committee (2026)
इन सभी ने सुझाव दिया कि राज्यपाल की नियुक्ति से पहले राष्ट्रपति को संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श करना चाहिए। हालांकि, इन सिफारिशों को अब तक लागू नहीं किया गया।
नियुक्ति और तबादले का फर्क
ममता बनर्जी के मामले में एक जटिलता यह भी है कि परंपरा मुख्यतः राज्यपाल की नियुक्ति से जुड़ी है, जबकि यहां मामला एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरण का है। संविधान इस विषय पर स्पष्ट नहीं है। अनुच्छेद 156 के अनुसार राज्यपाल राष्ट्रपति की इच्छा तक पद पर बने रहते हैं।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश D. Y. Chandrachud ने अपनी पुस्तक Why the Constitution Matters में कहा है कि संविधान की कुछ “खामोशियां” अधिकारों का विस्तार करती हैं, जबकि कुछ खामोशियां सत्ता को सीमित करती हैं। राज्यपाल के तबादले पर संविधान की चुप्पी को केंद्र सरकार ने अपने अधिकार के रूप में इस्तेमाल किया है।
परंपरा से कानून तक का सफर
लिखित संविधान अक्सर कई सवालों को खुला छोड़ देता है और उन खाली जगहों को परंपराएं भरती हैं। 1993 के प्रसिद्ध Second Judges Case में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संवैधानिक परंपराएं संविधान की व्याख्या और विकास में मदद करती हैं। न्यायमूर्ति Kuldip Singh ने अपने फैसले में कहा था कि जब कोई परंपरा स्थापित हो जाती है और संवैधानिक पदाधिकारी उसका पालन करते हैं, तो उसे कानून का दर्जा देने से इंकार करने का कोई कारण नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
भारतीय न्यायपालिका ने कई मामलों में संवैधानिक परंपराओं को कानूनी महत्व दिया है। Second Judges Case में न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायपालिका की प्रधानता को मान्यता दी गई। NJAC Case (2015) में अदालत ने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। Rameshwar Prasad Case (2006) में सरकार गठन से जुड़ी परंपराओं को भी महत्वपूर्ण माना गया। S. R. Bommai Case (1994) में संघवाद को संविधान की मूल संरचना बताया गया।
क्या अदालत में चुनौती संभव है?
ममता बनर्जी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकती हैं। वे तीन प्रमुख आधारों पर याचिका दायर कर सकती हैं। मुख्यमंत्री से परामर्श की परंपरा अब कानून का रूप ले चुकी है।बिना परामर्श के तबादला संघीय ढांचे का उल्लंघन है। 2010 के BP Singhal Case में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल को हटाने का अधिकार भी मनमाना नहीं हो सकता।
परंपराओं के लागू होने में असमानता
संवैधानिक परंपराओं के लागू होने में एक असमानता भी है। जो संस्थान किसी परंपरा को लागू कर सकते हैं, अक्सर वही उसे मजबूत भी करते हैं। उदाहरण के लिए न्यायपालिका से जुड़ी परंपराएं इसलिए मजबूत हुईं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट खुद उनका संरक्षक था। लेकिन राज्यपाल नियुक्ति की परंपरा केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन से जुड़ी है, और इसे लागू कराने के लिए कोई समान रूप से शक्तिशाली संस्थान मौजूद नहीं है।
असली सवाल
आरएन रवि का तबादला सिर्फ एक राजनीतिक विवाद नहीं है। यह इस बात की परीक्षा है कि क्या भारत का संवैधानिक ढांचा मुख्यमंत्री से परामर्श की परंपरा को वास्तव में बाध्यकारी नियम मानने के लिए तैयार है। अंततः यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या इस मामले को अदालत में चुनौती दी जाती है और क्या सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक परंपराओं को इस संदर्भ में लागू करने के लिए तैयार है।

