
जहां कांग्रेस हारी वहां भाजपा उभरी, केरल की बदलती सियासत
मट्टाथुर पंचायत चुनावों ने दिखाया कि केरल में कांग्रेस की पकड़ कमजोर हो रही है और भाजपा मुख्य विपक्ष के रूप में उभर रही है। यह रुझान 2026 के संकेत देता है।
Kerala Local Government Election: केरल के त्रिशूर जिले की मट्टाथुर ग्राम पंचायत दिसंबर की शुरुआत में हुए स्थानीय स्वशासन (Local self Government) चुनावों के नतीजों के बाद कुछ समय के लिए राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गई। इसकी वजह भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा स्थानीय निकाय पर नियंत्रण हासिल करने के लिए किया गया राजनीतिक उलटफेर था। हालांकि, बाद में घटनाक्रम पर गहराई से नजर डालने पर यह स्पष्ट होता है कि यह बदलाव उस दिन शुरू नहीं हुआ जब कांग्रेस के बागी सदस्यों ने इस्तीफा दिया, बल्कि इसकी नींव मतदान केंद्रों पर ही पड़ चुकी थी।
वार्ड-स्तरीय मतदान आंकड़े कांग्रेस की जमीनी पकड़ में आई गंभीर गिरावट और भाजपा के लगातार मजबूत होते आधार की ओर इशारा करते हैं। यह मजबूती मुख्य रूप से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (United Democratic Front) की कीमत पर आई है, न कि माकपा-नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (Left Democratic Frons) के नुकसान से।
कांग्रेस के लिए अशुभ संकेत
मट्टाथुर की 24 वार्डों के नतीजों का विश्लेषण एक साफ रुझान दिखाता है। जहां-जहां एलडीएफ ने जीत दर्ज की, वहां यूडीएफ निर्णायक रूप से तीसरे स्थान पर खिसक गया। इसके विपरीत, जिन वार्डों में एलडीएफ हारा, वहां वह केवल दो मामलों में ही तीसरे स्थान पर गया।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा लाभार्थी भाजपा रही, जिसने बढ़ती संख्या में वार्डों में या तो जीत हासिल की या दूसरे स्थान पर रही। मट्टाथुर की 24 वार्डों में से 14 में यूडीएफ तीसरे स्थान पर रहा। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि पंचायत के बड़े हिस्सों में कांग्रेस अब एलडीएफ का स्वाभाविक विकल्प नहीं रही। उसकी जगह भाजपा मुख्य चुनौती के रूप में उभर आई है और कांग्रेस हाशिये पर चली गई है।
यह गिरावट उन वार्डों में खास तौर पर दिखी जहां भाजपा उम्मीदवार जीते या दूसरे स्थान पर रहे। इन जगहों पर कांग्रेस के वोट न सिर्फ कम थे, बल्कि कई बार तो 100 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाए। नूलुवल्ली वार्ड में, जहां भाजपा ने 768 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की, एलडीएफ को 629 वोट मिले, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार महज 44 वोटों पर सिमट गया। इसी तरह कोरेचल वार्ड में भाजपा उम्मीदवार अथुल कृष्णा की जीत के दौरान कांग्रेस को केवल 58 वोट मिले।
चेम्बुचिरा (63 वोट), नादिप्पारा (64 वोट) और मूलमकुडम (71 वोट) जैसे वार्डों में भी कांग्रेस की स्थिति बेहद कमजोर रही। लगातार कई वार्डों में कांग्रेस के वोट शेयर का इस तरह गिरना रणनीतिक हार से ज्यादा संगठनात्मक विघटन की तस्वीर पेश करता है।
वेल्लीकुलंगरा में दिखा कांग्रेस का क्षरण
वेल्लीकुलंगरा वार्ड का नतीजा इस राजनीतिक बदलाव को समझने में खास मदद करता है। यहां निर्दलीय उम्मीदवार ओसेफ ने 453 वोटों के साथ जीत दर्ज की। भाजपा दूसरे और एलडीएफ तीसरे स्थान पर रहे, दोनों को 300 से ज्यादा वोट मिले। कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार पी.आर. सुनीकुमार चौथे स्थान पर रहे और उन्हें सिर्फ 108 वोट मिले।
यह परिणाम कांग्रेस से बड़े पैमाने पर वोटों के खिसकने की ओर इशारा करता है। ओसेफ की जीत को यूडीएफ और एलडीएफ दोनों के पारंपरिक वोट बैंक से आए समर्थन का नतीजा माना जा रहा है, जिससे यह साफ होता है कि यहां कांग्रेस-विरोधी भावना का एकीकरण हुआ, न कि केवल त्रिकोणीय मुकाबला।
इस तरह कांग्रेस चुनावी प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका निभाने में विफल रही और पंचायत परिषद के भीतर उसकी सौदेबाजी की ताकत भी कमजोर पड़ गई। बाद में कांग्रेस के निर्वाचित सदस्यों का इस्तीफा और भाजपा के साथ जाना अचानक नहीं हुआ, बल्कि उस चुनावी फैसले की परिणति था जिसने पार्टी को पहले ही कमजोर कर दिया था।
पंचायत से आगे, राज्यव्यापी संकेत
अंततः भाजपा के नेतृत्व वाले मोर्चे ने मट्टाथुर पंचायत पर नियंत्रण हासिल कर लिया, लेकिन यह सीधी चुनावी जीत से ज्यादा कांग्रेस के टूटने से संभव हुआ। मतदान आंकड़े बताते हैं कि इसकी जमीन पहले ही तैयार हो चुकी थी, जब कांग्रेस अपने मूल समर्थन को बचाने में नाकाम रही और भाजपा को वामपंथ के खिलाफ मुख्य चुनौती बनने दिया।
मट्टाथुर में जो हुआ, वह केरल के अन्य हिस्सों में उभर रहे व्यापक रुझान का हिस्सा है, खासकर 2026 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए। वामपंथ को हराने के लक्ष्य में कांग्रेस कई बार जानबूझकर या परिस्थितिवश भाजपा के लिए राजनीतिक जगह छोड़ती दिखी है। कई जिलों के पंचायत नतीजे बताते हैं कि भाजपा एलडीएफ को सीधे हटाकर नहीं, बल्कि कांग्रेस की जगह लेकर मजबूत हो रही है।
एलडीएफ के लिए राहत और चेतावनी
एलडीएफ के लिए मट्टाथुर के नतीजे जहां एक ओर उसकी चुनावी मजबूती का भरोसा देते हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा के उभार से स्थानीय राजनीति का गणित बदलने की चेतावनी भी देते हैं। भाजपा के लिए मट्टाथुर केवल एक पंचायत नहीं, बल्कि कांग्रेस के कमजोर होते आधार पर आधारित क्रमिक विस्तार का मॉडल है।
आखिरकार, मट्टाथुर का विवाद व्यक्तिगत इस्तीफों से ज्यादा गहरे राजनीतिक पुनर्संयोजन की कहानी कहता है। मतदान के आंकड़े साफ बताते हैं कि भाजपा का वोट बढ़ रहा है और कांग्रेस सत्ता गंवाने से पहले ही मतदाताओं द्वारा हाशिये पर धकेली जा चुकी थी। इसके बाद जो हुआ, वह अपवाद नहीं बल्कि उसी प्रक्रिया का अंतिम अध्याय था।
त्रिशूर जिले की पड़ोसी पंचायतों—वल्लाचिरा और परलम—में भी इसी तरह का रुझान दिखता है, जहां भाजपा ने बढ़त बनाई, एलडीएफ दूसरे स्थान पर रहा और कांग्रेस तीसरे स्थान पर फिसल गई। यह वही इलाका है जहां 2024 के लोकसभा चुनाव में सुरेश गोपी ने एलडीएफ और यूडीएफ दोनों को हराया था।
भाजपा का आत्मविश्वास और दीर्घकालिक रणनीति
एलडीएफ नेताओं का आरोप है कि भाजपा ने जिले की चार पंचायतों—मट्टाथुर, परलम, अविनिस्सेरी और वल्लाचिरा—में यूडीएफ, खासकर कांग्रेस के सदस्यों को अपने पाले में करने की कोशिश की, लेकिन यह प्रयास केवल मट्टाथुर में सफल रहा। वहीं भाजपा सूत्रों का कहना है कि तत्काल नतीजे उनका मुख्य लक्ष्य नहीं थे और यह कदम एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा था।
यह रुझान केवल त्रिशूर तक सीमित नहीं है। तिरुवनंतपुरम जैसे इलाकों में, जहां भाजपा ने नगर निगम पर कब्जा किया, वहां भी कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। आंकड़े बताते हैं कि राज्यभर में भाजपा-नीत एनडीए ने बड़ी संख्या में सीटें जीतीं और अधिकांश जगहों पर एलडीएफ ही उसका मुख्य मुकाबिल रहा, जबकि कांग्रेस पीछे छूटती गई।
इन आंकड़ों से उभरती तस्वीर साफ है—केरल की राजनीति में मुकाबला धीरे-धीरे एलडीएफ बनाम भाजपा की ओर बढ़ रहा है और कांग्रेस लगातार इस संघर्ष के केंद्र से बाहर होती जा रही है।

