जन्मदिन पर मायावती का ‘ब्राह्मण राग’, क्या BSP दोहरा पाएगी 2007 का करिश्मा?
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जन्मदिन पर मायावती का ‘ब्राह्मण राग’, क्या BSP दोहरा पाएगी 2007 का करिश्मा?

मायावती ने 70वें जन्मदिन पर ब्राह्मण उपेक्षा का मुद्दा उठाकर 2007 के सर्वजन फॉर्मूला की ओर संकेत दिया है। सवाल है, क्या BSP दोबारा सत्ता की दौड़ में लौट पाएगी?


Mayawati Brahman Politics: यूपी की सियासत में बीजेपी के खिलाफ चुनौती तीनों मुख्य दल यानी समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के सामने है। 2012 के बाद से बीएसपी (Bahujan Samaj Party) सत्ता से बाहर है, वहीं समाजवादी पार्टी 2017 और कांग्रेस की कहानी तो दशकों पुरानी है। यहां पर बात हम करेंगे बीएसपी सुप्रीमो मायावती की जो अपना 70वां जन्मदिन मना रही है। इस खास मौके पर उन्होंने उस प्रसंग को छूआ जिसकी चर्चा जबरदस्त तरीके से हो रही है।

मायावती ने कहा कि मौजूदा बीजेपी सरकार में जिस तरह से ब्राह्मणों (Brahman Community in Uttar Pradesh) की उपेक्षा हो रही है वो ठीक नहीं है। ब्राह्मण, उपेक्षा और उन्होंने अपनी सरकार में प्रदेश की इस 10 फीसद आबादी के लिए क्या कुछ किया उसके बारे में बताया। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण हित बीएसपी में ही सुरक्षित है। ऐसे में क्या वो 2007 के सर्वजन फॉर्मूला पर बढ़ने की तैयारी कर रही हैं।

यूपी की सियायत में मायावती ने सक्रिय तौर पर 1990 के दशक में कदम रखा। लखनऊ की गद्दी तक पहुंचने के लिए 1993 में समाजवादी पार्टी के साथ रिश्ता गांठा और 67 सीट भी हासिल की। यहां बता दें कि उस दौर की राजनीति में वो बहुजन की बात करती थीं। तिलक, तराजू और तलवार इनको मारों जूते चार जैसे नारे का इस्तेमाल करती थीं। लेकिन यूपी (Uttar Pradesh Politics) की गद्दी पर इन नारों के दम पर वो सरकार बनाने में कामयाब तो रहीं लेकिन उन सरकारों की जिंदगी दूसरे के ऑक्सीजन पर निर्भर थी।

लोकसभा में प्रदर्शन

14 अप्रैल 1984 को बीएसपी का गठन कांशीराम ने किया था।

1984 लोकसभा चुनाव में कामयाबी नहीं मिली

1985 लोकसभा उपचुनाव में मायावती की हार

1996 लोकसभा चुनाव में बीएसपी को 11 सीटें

1998 लोकसभा चुनाव में बीएसपी के खाते में 14 सीट

1999 में लोकसभा की 14 सीटों पर जीत

2004 में प्रदर्शन में गिरावट, लोकसभा की 6 सीटों पर जीत

2009 में लोकसभा की 21 सीटों पर जीत

2014 में लोकसभा में एक भी सीट नहीं

2019 में लोकसभा में 10 सीट

2024 में लोकसभा में एक भी सीट नहीं

विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन

2007 में यूपी विधानसभा चुनाव में 40.43 फीसद मत, सीट संख्या-206

2012 में 25.91 फीसद मत, सीट संख्या- 80

2017 में 22.23 फीसद मत, सीट संख्या- 19

2022 में 12.83 फीसद मत, सीट संख्या- 1

2024 लोकसभा चुनाव में 7 फीसद, सीट संख्या- शून्य

साल 2007 (UP Assembly Elections 2027) में मायावती की नये कलेवर के साथ लोगों के बीच उतरीं और बहुजन की जगह नारा सर्वजन का लगाया। बीएसपी को उसका फायदा हुआ। मंडल कमीशन (Mandal Commission) के सुनहले दौर में जहां वो महज 67 सीट हासिल कीं। वहीं सर्वजन का नारा बुलंद कर 2007 में 206 सीटों के साथ अपने दम पर सरकार बनाने में कामयाब हुईं। अब इस सर्वजन में वो कौन जन खास थे इसे भी समझना जरूरी है।

यूपी की सियासत पर नजर रखने वाले बताते हैं कि मायावती और उनके रणनीतिकारों को यह बात समझ में आई कि बहुजन के जरिए वो निश्चित सीटों को हासिल कर सकते हैं। लेकिन 203 के जादुई आंकड़ों को हासिल करने के लिए समाज के सभी वर्गों को संदेश देना होगा कि वो सबके बारे में सोचती हैं। उस क्रम में प्रदेश की ब्राह्मण आबादी को साधने की कोशिश की गई जिनकी संख्या करीब 10 फीसद है। मायावती के करीबी सतीश चंद्र मिश्रा (Satish Chandra Mishra) ने प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में दलित-ब्राह्मण भाइचारा सम्मेलन को आयोजित करना शुरू किया और उसका फायदा यह हुआ कि बीएसपी ने हाशिए पर चल रही बीजेपी को और पीछे धकेल दिया और समाजवादी पार्टी की साइकिल की सत्ता की सड़क से बेपटरी कर दी।

साल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह से यूपी में अगड़ों में जातीय गोलबंदी देखी जा रही है खासतौर से अगड़ों (ठाकुर और ब्राह्मण समाज) में उसमें समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के साथ साथ बीएसपी को भी लगने लगा है कि अगर वो ब्राह्मण समाज को अपने पाले में लाने में कामयाब हुए तो निश्चित तौर पर कमल नहीं खिल पाएगा।

अब आप सोच रहे होंगे कि बीएसपी को फायदा क्यों मिल सकता है। दरअसल यूपी सरकार खासतौर से सीएम योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) पर विपक्षी दल आरोप लगाते हैं वो अपने स्वजातीय लोगों को बढ़ावा देते हैं। स्वजातीय आरोपी होते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती। वहीं ब्राह्मणों के साथ साथ दूसरे समाज के लोगों के खिलाफ सौतेला व्यवहार होता है। ऐसे में ठाकुर विधायकों के भोज के बाद बीजेपी के विधायक पी एन पाठक ने ब्राह्मण भोज किया तो सियासत गर्मा गई। बता दें कि बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने कहा कि बीजेपी की संस्कृति जाति आधारित भोज की कभी नहीं रही है, भविष्य में इस तरह के आयोजन नहीं होने चाहिए।

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने जब इस तरह से कहा तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेता खुलकर मैदान में उतरे। उन्होंने कहा कि इसमें दो मत नहीं कि ब्राह्मण समाज के खिलाफ दोहरा व्यवहार किया जा रहा है। ऐसे में बीएसपी प्रमुख को लगने लगा कि प्रदेश का यह समाज जो कभी उनके साथ था वो 19-20 साल बाद ही सही उनके साथ आ सकता है और उनके मदद से उनकी हाथी अपनी चाल चलते हुए सबको रौंद देगी। लेकिन यहां एक कड़वी सच्चाई को समझना भी जरूरी है। 1993 से लेकर 2014 तक दहाई के अंकों में वोट शेयर हासिल करने वाली बीएसपी एक अंक वाले आंकड़े में सिमट गई है। लोकसभा में पार्टी का कोई भी सांसद नहीं है, वहीं विधानसभा में महज एक बलिया जिले की रसड़ा से विधायक उमाशंकर सिंह (BSP MLA Umashankar Singh) है जिनकी जीत को उनकी अपनी कामयाबी कहा जाता है।

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