दलित वोटों की जंग- कांशीराम जयंती पर सपा मनाएगी पीडीए दिवस’, मायावती ने याद दिलाया पुराना हिसाब
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कांशीराम जयंती पर सपा का आयोजन, मायावती ने साधा निशाना

दलित वोटों की जंग- कांशीराम जयंती पर सपा मनाएगी 'पीडीए दिवस’, मायावती ने याद दिलाया पुराना हिसाब

सपा 15 मार्च को कांशीराम जयंती को 'पीडीए दिवस’ के रूप में मनाएगी।हर ज़िले में कार्यक्रम होंगे।इस ऐलान के बाद मायावती ने निशाना साधते हुए इसे राजनीतिक नाटकबाज़ी कहा है।


Mayawati slams SP’s 'PDA day’ plan on Kanshiram Jayanti : 'मिले मुलायम कांशीराम…‘ का नारा देकर 90 के दशक में कमंडल की राजनीति को चुनौती देने वाले कांशीराम और मुलायम सिंह यादव की याद एक बार फिर ताज़ा करने के लिए और यूपी के दलित वोटरों को संदेश देने के लिए समाजवादी पार्टी कांशीराम की जयंती मनाएगी।15 मार्च को बीएसपी संस्थापक कांशीराम की जयंती को समाजवादी पार्टी अपने सबसे सफल नारे और चुनावी समीकरण पीडीए (PDA) से जोड़ते हुए PDA दिवस के रूप में मनाएगी।सपा के इस फैसले के बाद प्रदेश भर में कार्यकर्ताओं ने आयोजन की तैयारी शुरू कर दी है तो वहीं मायावती ने इसपर पलटवार किया है और गेस्ट हाउस कांड की याद दिलाते हुए कांशीराम का अपमान करने का आरोप लगा दिया है।

कांशीराम की जयंती पर सपा मनाएगी 'PDA दिवस’

यूपी में 2027 के चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने अपने आज़माए हुए फ़ॉर्म्युले पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक (PDA) को साधने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया है।सपा ने पीडीए के 'D’ पर फोकस करते हुए दलित वोटरों को ख़ास संदेश देने की तैयारी की है।इसके लिए दलित समाज को जोड़ने की योजना बनायी गई है। सपा के दलित जोड़ो अभियान की शुरुआत 15 मार्च को BSP संस्थापक कांशीराम की जयंती से होगी।सपा कांशीराम जयंती को 'PDA दिवस’ के रूप में मनाएगी।

कांशीराम की जयंती पर प्रदेश भर में PDA दिवस के तहत जो आयोजन किए जाएँगे उसमें सभी पदाधिकारियों और जन प्रतिनिधियों को शामिल होना है।इसके लिए अखिलेश यादव की ओर से सभी जिला अध्यक्षों, पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को पत्र लिखकर निर्देश दिए हैं कि इस दिन प्रदेश भर में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएं जिसमें कांशीराम को श्रद्धांजलि दी जाए और पीडीए की एकता पर ज़ोर दिया जाए।इन कार्यक्रमों में ख़ास तौर पर दलित वर्ग के लोगों को भी जोड़ा जाए।जन प्रतिनिधियों को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि कांशीराम ने मंडल आयोग की रिपोर्ट के समर्थन में आंदोलन किया था।कांशीराम ने 1993 में समाजवादी पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव के साथ समझौता कर बहुजन समाज के लिए आंदोलन को तेज़ किया था।

मायावती ने कहा 'राजनीतिक नाटकबाज़ी’, याद दिलाया गेस्ट हाउस कांड-

इधर बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने इस घोषणा को 'विशुद्ध राजनीतिक नाटकबाज़ी’ बताते हुए सपा को दलित विरोधी और जातिवादी बता दिया है।सोशल मीडिया फ़्लैटफ़ॉर्म एक्स पर लंबी पोस्ट के ज़रिए मायावती ने गेस्ट हाउस कांड की याद दिलाते हुए कहा है कि सपा ने कांशीराम तक का अपमान किया।बीएसपी सरकार में कासगंज ज़िले का नाम बदलकर ' कांशीराम नगर’ करने और लखनऊ में कांशीराम के नाम से बनाये गए उर्दू अरबी फ़ारसी यूनिवर्सिटी का नाम सपा सरकार द्वारा बदलने की बात को भी मायावती ने याद दिलाया है।सपा-बसपा की दोस्ती और सरकार बनाने में सहयोग की बात पर मायावती ने याद दिलाया है कि दलित विरोधी रवैये की वजह से 1 जून 1995 को बीएसपी ने सरकार से समर्थन वापस लिया था।मायावती ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए पुराने विवादों का जिक्र किया, जिसमें 2 जून 1995 को गेस्ट हाउस कांड तक शामिल है की याद दिलायी।उन्होंने कहा कि सपा दलित-बहुजन महापुरुषों का अपमान करती रही है और कांशीराम की जयंती को पीडीए दिवस बनाना महज दिखावा है।साफ़ तौर पर मायावती ने अपने वोटरों को सपा की इस मुहिम से आगाह किया है।


कांशीराम-मुलायम की दोस्ती को याद दिलाने की तैयारी में सपा-

दरअसल उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक को मजबूत करने के लिए सपा की ओर से इस फैसले को एक बड़ा कदम माना जा सकता है।2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा की यह दलित जोड़ो कार्यक्रम पार्टी की चुनावी रणनीति का हिस्सा है।लखनऊ में 9 अक्टूबर को कांशीराम की पुण्यतिथि पर आयोजित बीएसपी की 'कमबैक रैली’ में जुटी भीड़ ने यह बता दिया है कि कांशीराम से दलित वर्ग का जुड़ाव अब भी काम कर सकता है।ख़ुद मायावती भी इसके बाद उत्साहित हैं।ऐसे में सपा इस मौके पर ‘कांशीराम-मुलायम’ की पुरानी दोस्ती को याद दिलाना चाहती है।सपा का उद्देश्य साफ़ है कि कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के एकसाथ आने को याद दिलाया जाए।सपा दलित वर्ग को यह भी बताएगी कि कांशीराम ने मुलायम सिंह यादव की सरकार बनायी थी।इस बात को याद दिलाकर सपा दलितों के साथ ख़ुद को खड़ा करना चाहती है।सपा इस बात को लेकर भी बीएसपी अध्यक्ष मायावती पर निशाना साधती रही है कि मायावती बीजेपी और केंद्र और राज्य की सरकारों पर 'सॉफ्ट’ हैं और यहाँ तक कि बीएसपी को बीजेपी की 'बी टीम’ भी कहती रही है।सपा का कहना है कि कांशीराम बहुजनों के नायक हैं और उनपर बीएसपी का कोई कॉपीराइट नहीं है।


हम समाजवादी बहुजन की लड़ाई लड़ रहे : सपा प्रवक्ता-

सपा प्रवक्ता फ़ख़रूल हसन चांद कहते हैं ''कांशीराम जी ने सामाजिक न्याय के लिए काम किया।वो किसी एक के नहीं हो सकते। कांशीराम सबके हैं इसलिए किसी को उनकी जयंती मनाने पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए।कांशीराम जी ने जिस बीजेपी के ख़िलाफ़ राजनीति की मायावती जी उसी बीजेपी का समर्थन करती रही हैं।वो बीएसपी को जिस रास्ते पर लेकर चली गई हैं वो कांशीराम की का रास्ता नहीं था।’’

सपा ही बहुजन समाज की सच्ची हितैषी है इसकी बात करते हुए फ़ख़रूल हसन चाँद कहते हैं ''अभी जब बीएसपी में लंबे समय तक रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी, फूल बाबू जैसे नेता सपा में शामिल हुए थे तब भी अखिलेश यादव जी ने इसका संकेत देते हुए कहा था कि हम समाजवादी लोग बहुजन की लड़ाई लड़ रहे हैं।’’

ग़ैर जाटव दलित वोटों का गणित -

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगे विधानसभा चुनाव है और सपा को पता है कि इसका राजनीतिक लाभ सपा को मिल सकता है।बीएसपी अभी यूपी की राजनीति में हाशिए पर है।2022 के चुनाव में दलित वोटों का बड़ा हिस्सा ‘लाभार्थी वर्ग’ के रूप में बीजेपी को मिला था।इसमें मूलतः 'ग़ैर जाटव वोट’ थे।जबकि मायावती की अपनी जाति ( जाटव वोट) मायावती के साथ ही रहे।27 प्रतिशत ग़ैर जाटव वोट बीएसपी को मिले थे जबकि 41 प्रतिशत ग़ैर जाटव वोट NDA को मिले थे। पर 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन को ग़ैर जाटव वोटों का बड़ा हिस्सा मिला था।BSP को 15 प्रतिशत ग़ैर जाटव वोट मिले थे जबकि NDA को 29 प्रतिशत और सपा-कांग्रेस गठबंधन को 56 प्रतिशत ग़ैर जाटव वोट मिले थे।दरअसल लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन के 'संविधान बचाओ’ नैरेटिव की वजह से दलित वोटरों का एक बड़ा हिस्सा सपा की ओर आकर्षित हुआ था लेकिन इस बार यह मुद्दा नहीं है।ऐसे में सपा यह संदेश दलित वोटरों को देना चाहती है कि उनकी लड़ाई सपा ही लड़ सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन कहते हैं ''राजनीति में संदेश देना भी अहम होता है, और ऐसा नहीं है कि बीएसपी को छोड़कर दलित कोई दूसरा विकल्प नहीं देख सकते।ऐसा होता तो पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को और लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन को दलित वोट नहीं मिलता।ऐसे में सपा का दलित वोटों के लिए कोशिश करना स्वाभाविक है।अभी तो कांशीराम के साथ काम कर चुके नसीमुद्दीन जैसे नेता भी सपा में हैं।हालाँकि गाँव-गाँव में दलित और यादव समुदाय के लोगों में जो एक टकराव की बात कही जाती रही है अखिलेश यादव को इस मामले को देखना होगा।’’


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