
भाषा बनी शक की वजह, देशभर में प्रवासियों पर दोहरी मार
नागरिकता जांच के नाम पर हिरासत, भेदभाव और असुरक्षा के बीच प्रवासी मजदूर पहचान, रोज़गार और सम्मान की दोहरी लड़ाई लड़ रहे हैं।
पिछले वर्ष 5 मई को गुजरात के पाटन में पुलिस ने ईंट-भट्ठे पर काम कर रहे खंडाकर, उनकी पत्नी, बच्चों और कुछ अन्य बांग्ला-भाषी मजदूरों को नागरिकता सत्यापन के नाम पर हिरासत में ले लिया। खंडाकर का दावा है कि वैध आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज दिखाने के बावजूद उन्हें एक गेस्ट हाउस में एक सप्ताह से अधिक समय तक रोके रखा गया, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे बांग्ला की ऐसी बोली बोलते हैं जो बांग्लादेश में प्रचलित भाषा से मिलती-जुलती है। “क्या बांग्ला बोलना अपराध है?” उन्होंने सवाल किया। 13 मई को पश्चिम बंगाल प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा किया गया।
यह घटना पश्चिम बंगाल में प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा को लेकर आक्रोश का कारण बनी। जो मामला पहले एक अलग-थलग घटना माना गया, वह जल्द ही एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा दिखने लगा—खासकर तब, जब केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने राज्यों को बांग्लादेश और म्यांमार से कथित अवैध प्रवासियों की पहचान और निर्वासन के लिए विशेष टास्क फोर्स बनाने के निर्देश दिए।
इसी महीने पुणे में एक बांग्ला-भाषी मजदूर की मौत ने एक बार फिर पश्चिम बंगाल के प्रवासियों को ‘निशाना’ बनाए जाने के आरोपों को हवा दी। हालांकि प्रवासी मजदूरों की कठिनाइयों की कहानी नई नहीं है। वर्षों से वे भेदभाव, उपहास, हिंसा और असुरक्षा का सामना करते रहे हैं। 2020 के कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान जब शहर ठहर गए थे, तब लाखों मजदूरों का पैदल घर लौटना उनकी असुरक्षा का प्रतीक बन गया था। पिछले वर्ष ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारत-पाक तनाव बढ़ने पर पंजाब, हरियाणा, गुजरात और राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों में भी प्रवासी मजदूरों के बीच असुरक्षा की खबरें सामने आईं।
दिल्ली के चांदनी चौक में पिछले 15 वर्षों से हाथ की कढ़ाई का काम कर रहे पश्चिम बंगाल के शेख समुल्ला बताते हैं कि लॉकडाउन के बाद काम की स्थिति बेहद खराब हो गई। “कभी 15,000 रुपये मिलते हैं, कभी कुछ भी नहीं। घंटों इंतजार करना पड़ता है, भुगतान भी समय पर नहीं होता।” उनके लिए आजीविका की चिंता इतनी बड़ी है कि सम्मान या पहचान जैसे सवाल पीछे छूट जाते हैं।
विकास नीति एवं अभ्यास केंद्र (CDPP) के 2024 के एक लेख के अनुसार, भारत में आंतरिक प्रवासियों की संख्या 2001 में 30.9 करोड़ से बढ़कर 2011 में 45 करोड़ हो गई। 2025 में ही करीब 15 करोड़ लोगों ने बेहतर अवसरों की तलाश में राज्यों के बीच पलायन किया। महाराष्ट्र में लगभग 2 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं, दिल्ली में 1.5 करोड़ और तमिलनाडु में 1 करोड़।
इसके बावजूद, भारत की प्रवासन नीति ढांचा आंतरिक प्रवास, विशेषकर अंतर-राज्यीय गतिशीलता और श्रम अधिकारों की चुनौतियों से जूझ रहा है। 1979 का इंटरस्टेट माइग्रेंट वर्कमेन एक्ट जैसे कानूनी प्रावधान होने के बावजूद, उनका क्रियान्वयन कमजोर है। सामाजिक सुरक्षा लाभों जैसे आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा की पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय ढांचे की कमी भी बड़ी बाधा है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी सेवाएं अक्सर मूल निवास स्थान पर निर्भर होती हैं। आधार के माध्यम से पोर्टेबिलिटी की कोशिशें हुई हैं, पर उनका कार्यान्वयन असमान है।
दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता सुनील अहलेदिया बताते हैं कि प्रवासी मजदूर शहरों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। घरेलू कामगार, सफाईकर्मी, निर्माण मजदूर, सेवा और आतिथ्य क्षेत्र में काम करने वाले फिर भी उन्हें सम्मान और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती। 2014 के बाद क्षेत्र और भाषा के आधार पर भेदभाव बढ़ा है। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में राजनीतिक बयानबाजी ने प्रवासियों को ‘बाहरी’ करार देकर स्थानीय नौकरियों के लिए खतरा बताया है।
पश्चिम बंगाल से आए करीब 22 लाख बांग्ला-भाषी प्रवासी देशभर में काम कर रहे हैं। केंद्र के हालिया निर्देशों के बाद वे अचानक संदेह के घेरे में आ गए। गुजरात, ओडिशा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और असम में कई प्रवासियों ने पुलिस और स्थानीय लोगों द्वारा उत्पीड़न की शिकायत की है। दक्षिण दिनाजपुर के उस्मान गनी गुरुग्राम से लौट आए, जहां उन्हें ‘बांग्लादेशी’ कहकर आधार और वोटर आईडी को फर्जी बताया गया। लेकिन घर लौटने पर उन्हें सिर्फ 250–300 रुपये दिहाड़ी मिलती है, जबकि बाहर 500–800 रुपये तक कमाने का अवसर होता है।
अक्सर, अपराध की अलग-थलग घटनाएं भी प्रवासियों के खिलाफ माहौल बना देती हैं। 2018 में गुजरात में एक दुष्कर्म मामले के बाद बिहारी मजदूरों पर हमले हुए। 2012 में बेंगलुरु में अफवाहों के चलते पूर्वोत्तर के 30,000 लोग शहर छोड़ने को मजबूर हुए। केरल और तमिलनाडु में भी अफवाहों ने समय-समय पर भय का माहौल बनाया।
दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले बिहार के मोहम्मद इंताब बताते हैं कि पहले ‘बिहारी’ शब्द गाली की तरह इस्तेमाल होता था, हालांकि अब हालात कुछ बदले हैं। असम के शाहेर अली कहते हैं कि उनकी बोली बांग्लादेशी बोली से अलग है, फिर भी लोग फर्क नहीं कर पाते। दिल्ली में 35 साल से रह रहे कुद्दूस अली के लिए पुलिस जांच सामान्य बात है जब तक दस्तावेज देख संतुष्ट न हो जाएं।
रहने की स्थिति भी अक्सर दयनीय होती है झुग्गियों का ध्वस्तीकरण, शहरों के बाहर तंग शेडों में रहना, साफ पानी और शौचालय की कमी। फिर भी प्रवास जारी है। कर्नाटक और तमिलनाडु के छोटे शहरों तक प्रवासियों की संख्या बढ़ रही है। भाषा की बाधा सबसे बड़ी चुनौती है, जो स्थानीय समाज में घुलने-मिलने को कठिन बनाती है।
फिर भी सपने जीवित हैं। अरुणाचल प्रदेश की 26 वर्षीय नीमा यामंग, जो कोच्चि में एक सैलून चेन में लीड हेयर स्टाइलिस्ट हैं, कहती हैं कि अब वह अकेली नहीं हैं परिवार भी उनके साथ है और वे स्वतंत्र जीवन जी रही हैं। असम की रूपा और उत्तर प्रदेश के अशफाक, जो कोच्चि में काम करते हैं, अपने पहले बच्चे की उम्मीद कर रहे हैं। वे कहते हैं कि अपने गांवों में अंतर-धार्मिक रिश्ते को स्वीकार नहीं किया जाता, पर शहर में उन्हें अपने फैसले लेने की स्वतंत्रता मिली है।
प्रवासी मजदूर शहरों की अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य हैं, लेकिन नीतिगत निर्णयों में अक्सर अदृश्य रह जाते हैं। वे बदलाव का असर सबसे पहले और सबसे गहराई से महसूस करते हैं। बेहतर भविष्य की उम्मीद ही उन्हें रोज संघर्ष करने की ताकत देती है। भले ही उनका कल दूसरों की तुलना में कहीं अधिक अनिश्चित क्यों न हो।

