
तमिलनाडु के आदिवासी इलाके में सख्ती के बाद भी बाल विवाह, आखिर वजह क्या?
तमिलनाडु के सत्यमंगलम क्षेत्र में गरीबी, पलायन और परंपरा के कारण आदिवासी बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं। बाल विवाह बढ़ रहे हैं हालांकि इसे रोकने की कोशिश भी जारी है।
तमिलनाडु के सत्यमंगलम टाइगर रिजर्व के भीतर, चेन्नई से लगभग 500 किलोमीटर दूर, 19 वर्षीय रवि और 18 वर्षीय राधा (नाम बदले हुए) रहते हैं। दोनों ने स्कूल छोड़ दिया, विवाह कर लिया और चार महीने बाद अपने पहले बच्चे की उम्मीद कर रहे हैं। रोज़गार की तलाश में उनके माता-पिता में से एक जोड़ा पड़ोसी राज्य की ओर पलायन कर गया, जिसके कारण किशोर दंपती ने जल्दबाज़ी में शादी कर ली। उनकी कहानी इस क्षेत्र में व्याप्त एक गहरे और व्यवस्थित संकट को दर्शाती है। सख्त कानूनों के बावजूद, गरीबी, पलायन और परंपराओं का संगम आदिवासी समुदायों में स्कूल छोड़ने और कम उम्र में गर्भधारण की समस्या को बढ़ावा देता जा रहा है। रवि और राधा की तरह पहाड़ी इलाकों के कई आदिवासी बच्चे पढ़ाई बीच में छोड़कर बाल श्रम या बाल विवाह की ओर धकेल दिए जाते हैं। उनके सामने अक्सर दो ही विकल्प होते हैं—सरकारी आवासीय छात्रावास में रहकर पढ़ाई जारी रखें या माता-पिता के साथ शहरों की ओर पलायन कर मजदूरी करें।
तमिलनाडु के इस टाइगर रिजर्व क्षेत्र में 11 आदिवासी गांव फैले हुए हैं। यहां घर एक-दूसरे से काफी दूरी पर स्थित हैं और पूरे इलाके में एक अजीब-सी खामोशी पसरी रहती है।
अधूरे सपने
अपने मिट्टी के घर के बाहर बैठे रवि और राधा ने बताया, “हमने गांव में ही रहकर खेती करने का फैसला किया है। हमने अपने जीवन को लेकर कोई बड़ी योजना नहीं बनाई है,” रवि ने कहा। “हम एक बड़ा घर बनाना चाहते हैं। हमारी शादी माता-पिता की सहमति से हुई। दहेज का कोई लेन-देन नहीं हुआ। हमने अपने पूर्वजों की परंपरा का पालन किया।”
आगे चलकर वे अपने गांव से लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित निटवेयर उद्योग के केंद्र तिरुप्पुर जाने की योजना बना रहे हैं, ताकि वहां रोज़गार मिल सके। मातृत्व की तैयारी कर रही राधा कहती हैं, “भविष्य के बारे में हमने कुछ और नहीं सोचा है।”
राज्य सरकार के सख्त कदमों के बावजूद राधा और रवि का विवाह हुआ। इरोड ज़िले में पिछले तीन वर्षों में लगभग 250 बाल विवाह दर्ज किए गए हैं, जिनमें से 2025 में ही 55 मामले सामने आए।
तमिलनाडु के आर्थिक सर्वेक्षण (2025) के अनुसार, राज्य में बाल विवाह की दर 12.8 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 23.3 प्रतिशत है। यह आंकड़ा उन महिलाओं (आयु 20–24 वर्ष) का प्रतिशत दर्शाता है जिनकी शादी 18 वर्ष की कानूनी आयु से पहले हुई। हालांकि तमिलनाडु की दर राष्ट्रीय औसत से कम है, लेकिन हर साल इसमें वृद्धि चिंता का विषय है। ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह की दर 15.2 प्रतिशत है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 10.4 प्रतिशत है।
प्रमुख कारण: पलायन और परंपराएं
विशेषज्ञों के अनुसार, माता-पिता का पलायन और गहरी जड़ें जमा चुकी सांस्कृतिक प्रथाएं इस समस्या के मुख्य कारण हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, तमिलनाडु के इरोड ज़िले की ग्रामीण साक्षरता दर 65.4 प्रतिशत थी, जबकि आदिवासी क्षेत्रों में यह और भी कम है। इन इलाकों में लड़कियां अक्सर कक्षा 8 के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं।
इरोड ज़िले के कलेक्टर एस. कंदसामी ने बताया कि हाल के वर्षों में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के माता-पिता के लिए आर्थिक अवसरों की कमी को दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा, “जब माता-पिता पलायन कर जाते हैं और बच्चों की देखभाल नहीं कर पाते, तो बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं।”
शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जद्दोजहद
सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षक इन बच्चों को दोबारा स्कूल से जोड़ने के लिए प्रयासरत हैं। सरकारी स्कूल की शिक्षिका पी. पूंगोड़ी जंगलों और खेतों में जाकर उन बच्चों को ढूंढती हैं जिन्होंने बेजेलेटी सरकारी आदिवासी आवासीय मध्य विद्यालय आना बंद कर दिया है।
उन्होंने बताया, “कुछ माता-पिता पड़ोसी राज्यों में पलायन करते समय बच्चों को रिश्तेदारों या पड़ोसियों के पास छोड़ देते हैं। घर में निगरानी न होने के कारण बच्चे स्कूल आना बंद कर देते हैं। कभी-कभी हम उन्हें समझाकर कुछ दिन के लिए स्कूल ला पाते हैं, लेकिन वे फिर गायब हो जाते हैं। मैं उनके घरों, खेतों, जंगलों और मंदिरों तक जाकर उन्हें वापस स्कूल लाने की कोशिश करती हूं।”
कई बार उन्हें छात्राओं के बाल संवारने और चोटी बनाने तक का काम करना पड़ा, क्योंकि उनके माता-पिता काम की तलाश में बाहर गए थे। पूंगोड़ी कहती हैं, “कई परिवार कक्षा 10 के बाद अपनी बेटियों की शादी कर देते हैं। वे नहीं चाहते कि लड़कियां आवासीय विद्यालय में रहें। कुछ आदिवासी परिवार अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के कारण बाल विवाह को जारी रखना चाहते हैं। उन्हें कानून की जानकारी है, फिर भी वे अपनी परंपरा को अधिक महत्व देते हैं। इन शादियों को रोकना बहुत कठिन है।”
उन्होंने यह भी बताया कि कई आदिवासी बच्चे अंतर्मुखी होते हैं और तेलुगु बोली बोलने के कारण संवाद में हिचकते हैं। “मैंने उनकी बोली सीखने की कोशिश की ताकि उनसे बेहतर संवाद कर सकूं। हमारे प्रयासों से इस वर्ष चार छात्र प्रतिष्ठित सरकारी मॉडल स्कूल में दाखिला लेने में सफल हुए हैं। इससे अन्य छात्रों में भी उत्साह आया है, लेकिन कुछ माता-पिता अपने बच्चों को दूर के स्कूल नहीं भेजना चाहते।”
परिवहन सुविधा से बदलाव
इरोड के आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता आर. करुप्पुसामी (READ NGO) और एस.सी. नटराज (सुदर NGO) ने हाल ही में सत्यमंगलम और बरगुर पहाड़ियों के दुर्गम इलाकों में मुफ्त वैन सेवा शुरू की है। उनका कहना है कि इससे स्कूलों में उपस्थिति में सुधार हुआ है। कई बच्चे जो आवासीय स्कूल में रहने के बजाय घर लौटना पसंद करते थे, परिवहन की कमी के कारण पढ़ाई छोड़ देते थे। जंगली जानवरों, बारिश और कोहरे के जोखिम के बीच यह वैन सेवा छात्रों को नियमित रूप से स्कूल पहुंचाने में सहायक सिद्ध हो रही है।
आदिवासी कल्याण विभाग के निदेशक एस. अन्नादुरई ने बताया कि आदिवासी गांवों से सरकारी स्कूलों तक नियमित परिवहन सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए गए हैं। स्वयंसेवी संगठनों के साथ मिलकर छात्रों को घर से लाने-ले जाने की व्यवस्था की गई है। हाल ही में 100 स्कूल छोड़ चुके बच्चों को दो दिवसीय परामर्श सत्र के लिए इरोड ज़िला कलेक्टर से मिलवाया गया, जिसके बाद अधिकांश बच्चे उसी सप्ताह स्कूल लौट आए।
जब माता-पिता अपने बच्चों को दोबारा स्कूल भेजते हैं, तो स्थानीय प्रशासन उन्हें सम्मानित करता है, ताकि अन्य परिवारों को भी प्रेरणा मिल सके।
एसओपी अभी तक लागू नहीं
2021 में तमिलनाडु सरकार ने बाल विवाह रोकने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने हेतु समिति गठित की थी, क्योंकि बाल विवाह निषेध नियमों में विभिन्न पक्षों की भूमिकाओं को लेकर स्पष्टता की कमी थी। हालांकि सूत्रों के अनुसार एसओपी तैयार हो चुका है, लेकिन अब तक उसे जारी या लागू नहीं किया गया है।
जब तक व्यापक और ठोस बदलाव नहीं होते, तब तक बच्चों को स्कूल में बनाए रखने की जिम्मेदारी कुछ अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षकों पर ही टिकी रहेगी—जो जंगलों और खेतों से होकर, कभी पैदल चलकर, अपना प्रयास जारी रखे हुए हैं।
(बाल विवाह की सूचना देने के लिए हेल्पलाइन: 1098, 1091; पुलिस हेल्पलाइन: 100)
यह रिपोर्ट पॉपुलेशन फर्स्ट की लाडली मीडिया फैलोशिप 2026 के अंतर्गत तैयार की गई है।

