बेटियों पर फोकस या तीसरी पारी की रणनीति? धामी सरकार का नंदा गौरा दांव
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बेटियों पर फोकस या तीसरी पारी की रणनीति? धामी सरकार का नंदा गौरा दांव

उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी ने नंदा गौरा योजना के जरिए 33 हजार से अधिक बेटियों के खाते में 145 करोड़ की धनराशि उनके खाते में भेजा।


क्या उत्तराखंड में तीसरी दफा बीजेपी सरकार बना पाएगी। इस सवाल का जवाब वैसे तो अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों पर निर्भर करेगा। इन सबके बीच पुष्कर सिंह धामी सरकार ने नंदा गौरा योजना के तहत 33,251 बेटियों के खातों में डीबीटी के माध्यम से 145 करोड़ रुपये की धनराशि हस्तांतरित की।

इस मौके पर मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार बेटियों के जन्म से लेकर उनकी शिक्षा, सुरक्षा और रोजगार तक हर स्तर पर उन्हें सशक्त बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। उन्होंने बताया कि जन्म के समय बेटा-बेटी के बीच होने वाले भेदभाव को समाप्त करने और कन्या जन्म को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से नंदा गौरा योजना संचालित की जा रही है। योजना के तहत बेटी के जन्म पर 11 हजार रुपये तथा 12वीं उत्तीर्ण करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए 51 हजार रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।

सतही तौर पर यह एक नियमित सरकारी कार्यक्रम लग सकता है, लेकिन जब इसे उत्तराखंड की राजनीति और आगामी विधानसभा चुनावों के संदर्भ में देखें तो इसके कई मायने निकलते हैं। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि सरकार बेटियों के जन्म से लेकर शिक्षा, सुरक्षा और रोजगार तक उन्हें सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। नंदा गौरा योजना के तहत बेटी के जन्म पर 11 हजार रुपये और 12वीं पास करने पर उच्च शिक्षा के लिए 51 हजार रुपये की सहायता दी जाती है। यह योजना न केवल आर्थिक सहयोग का माध्यम है, बल्कि सामाजिक मानसिकता में बदलाव का प्रयास भी है। विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां अब भी बेटा-बेटी के बीच भेदभाव देखा जाता है।

चुनावी राजनीति में कल्याणकारी योजनाएं केवल सामाजिक सरोकार तक सीमित नहीं रहतीं। वे सरकार की प्राथमिकताओं, उसकी संवेदनशीलता और वोटर समूहों तक उसकी पहुंच का संकेत भी देती हैं। उत्तराखंड जैसे छोटे लेकिन राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में महिलाओं का वोट प्रतिशत निर्णायक भूमिका निभाता रहा है।

महिला मतदाता निर्णायक कारक

उत्तराखंड में पिछले चुनावों में महिला मतदाताओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है। कई सीटों पर महिलाओं के मतदान प्रतिशत ने पुरुषों को पीछे छोड़ा है। ऐसे में बेटियों और महिलाओं को सीधे लाभ पहुंचाने वाली योजनाएं चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन जाती हैं। नंदा गौरा योजना के तहत डीबीटी के माध्यम से सीधे खातों में राशि ट्रांसफर करना पारदर्शिता और भरोसे का संदेश देता है। इससे एक ओर जहां बिचौलियों की भूमिका खत्म होती है, वहीं लाभार्थियों के मन में यह धारणा मजबूत होती है कि सरकार सीधे उनके जीवन में हस्तक्षेप कर सकारात्मक बदलाव ला रही है। चुनावी दृष्टि से यह सीधा जुड़ाव प्रभावी माना जाता है।

उत्तराखंड में नंदा केवल एक नाम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आस्था का प्रतीक है। नंदा देवी को राज्य की लोक आस्था और परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है। योजना का नाम ‘नंदा गौरा’ रखा जाना भी एक रणनीतिक संदेश देता है। यह योजना केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव का भी माध्यम है। राजनीति में प्रतीकों का महत्व कम नहीं होता। जब किसी योजना को स्थानीय संस्कृति और आस्था से जोड़ा जाता है, तो उसका भावनात्मक प्रभाव बढ़ जाता है। इससे सरकार खुद को ‘स्थानीय भावनाओं के प्रति संवेदनशील’ के रूप में प्रस्तुत करती है।

चुनावी माहौल में हर योजना का राजनीतिक मूल्यांकन भी होता है। विपक्ष ऐसे कार्यक्रमों को चुनाव से पहले वोट साधने की कोशिश के रूप में पेश कर सकता है। सवाल यह भी उठ सकता है कि क्या केवल आर्थिक सहायता से बेटियों की शिक्षा और सुरक्षा की व्यापक चुनौतियां हल हो सकती हैं? क्या ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की गुणवत्ता, उच्च शिक्षा के अवसर और रोजगार के वास्तविक विकल्प पर्याप्त हैं? विपक्ष यह भी मुद्दा बना सकता है कि क्या योजना का लाभ सभी पात्र परिवारों तक समान रूप से पहुंच रहा है या नहीं। इसलिए सरकार के लिए केवल राशि वितरण पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन का प्रमाण देना भी जरूरी होगा।

उत्तराखंड की राजनीति में विकास, रोजगार, पलायन और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दे लंबे समय से प्रमुख रहे हैं। पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार हो रहा पलायन एक गंभीर चुनौती है। ऐसे में बेटियों की शिक्षा और आर्थिक सहायता की योजनाएं दो स्तरों पर असर डाल सकती हैं। पहला परिवारों को आर्थिक राहत और दो, लड़कियों की शिक्षा के माध्यम से दीर्घकालिक सामाजिक बदलाव।

यदि योजना को सही तरीके से जमीन पर उतारा जाए तो बेटियों की उच्च शिक्षा व कौशल विकास को वास्तविक बढ़ावा मिलता है, तो यह राज्य की मानव संसाधन क्षमता को मजबूत कर सकता है। लेकिन यदि यह केवल आर्थिक अनुदान तक सीमित रह जाता है, तो इसे चुनावी रेवड़ियों के रूप में भी देखा जा सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से पहले सरकारें अपनी उपलब्धियों को रेखांकित करने के लिए ऐसे कार्यक्रमों को बड़े स्तर पर प्रस्तुत करती हैं। 145 करोड़ रुपये का एकमुश्त ट्रांसफर केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक मजबूत राजनीतिक संदेश भी है। सरकार सक्रिय है, प्रतिबद्ध है और समाज के कमजोर वर्गों के साथ खड़ी है।

मुख्यमंत्री की ओर से बेटियों की सुरक्षा और रोजगार पर जोर देना भी व्यापक चुनावी नैरेटिव का हिस्सा हो सकता है। आज के मतदाता केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होते। वे सुरक्षा, शिक्षा और रोजगार के ठोस अवसर चाहते हैं। इसलिए सरकार के लिए चुनौती यह होगी कि वह इस योजना को व्यापक महिला सशक्तिकरण नीति से जोड़कर पेश करे।

उत्तराखंड में चुनावी मुकाबला अक्सर कड़ा रहता है। सत्ता परिवर्तन की परंपरा भी राज्य की राजनीति का हिस्सा रही है। ऐसे में महिला और युवा मतदाताओं को साधने वाली योजनाएं चुनावी समीकरण बदल सकती हैं। यदि लाभार्थी परिवारों में सकारात्मक संदेश जाता है कि सरकार ने उनकी बेटियों के भविष्य के लिए ठोस कदम उठाए हैं, तो इसका सीधा असर मतदान व्यवहार पर पड़ सकता है। लेकिन साथ ही, विपक्ष की आलोचनाएं और जमीनी स्तर पर योजना के वास्तविक परिणाम भी मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित करेंगे।

आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह योजना महिला मतदाताओं के बीच सरकार के पक्ष में सकारात्मक माहौल बनाती है या विपक्ष इसे चुनावी रणनीति के रूप में पेश कर अपनी जमीन मजबूत करता है। इतना तय है कि उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में ‘बेटी’ अब केवल सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का भी केंद्र बन चुकी है।

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