बुंदेलखंड से लखनऊ तक, क्या सपा के लिए नसीमुद्दीन बनेंगे गेमचेंजर?
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बुंदेलखंड से लखनऊ तक, क्या सपा के लिए नसीमुद्दीन बनेंगे गेमचेंजर?

यूपी चुनाव से पहले नसीमुद्दीन सिद्दीकी के सपा में शामिल होने की चर्चा तेज हो गई है। ओवैसी के प्रभाव को रोकने के लिए सपा की रणनीति मानी जा रही है।


अगले साल यूपी में विधानसभा चुनाव से पहले अब सूबे में सियासी चेहरे ठिकानों की तलाश कर रहे हैं। अब इस तरह की कवायद से कितना फायदा उस विशेष चेहरे या पार्टी को मिलता है उस पर राजनीतिक पंडित विश्लेषण कर सकते हैं हालांकि सियासी दल खुद के लिए कामयाबी मानते हैं। मसलन इस समय चर्चा नसीमुद्दीन सिद्दीकी लेकर है। ऐसा बताया जा रहा है कि वो 15 फरवरी को समाजवादी पार्टी का दामन थाम सकते हैं। बता दें कि मौजूदा समय में नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस में हैं और उससे पहले बहुजन समाज पार्टी के कद्दावर नेता हुआ करते थे।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी को लेकर कहा जा रहा है कि समाजवादी पार्टी उन्हें एआईएमआईएम मुखिया असदुद्दीन ओवैसी के काट के तौर पर पेश करना चाहती है। ऐसे में यह सवाल वाजिब है कि जमीनी स्तर पर सिद्दीकी कितने प्रभावी हैं। यहां बता दें कि सिद्दीकी का नाता सूबे के बुंदेलखंड इलाके से है और बीएसपी की सरकार में वो नंबर 2 की हैसियत में काम करते थे। हालांकि ऐसा कहा जाता है कि नंबर एक से लेकर नंबर 10 तक मायावती ही होती थी। लेकिन माया का भरोसा नसीमुद्दीन सिद्दीकी में था। लेकिन रिश्ता ऐसा बिगड़ा कि उन्हें बीएसपी से अलग होना पड़ा और सियासी गाड़ी को आगे ले जाने के लिए कांग्रेस का हिस्सा बनना पड़ा। यह बात अलग है कि जिस उम्मीद के साथ वो कांग्रेस में शामिल हुए या कांग्रेस को जो उम्मीद थी उसे वो पूरी नहीं कर सके। ऐसे में नसीमुद्दीन ने अलग ठौर की तलाश शुरू की। सियासी जानकार कहते हैं कि वो बीएसपी में वापसी करना चाहते थे। लेकिन जिस तरह से मायावती का बुरा भला कह कर वो अलग हुए थे वो वापसी की राह में बाधा बन गया।

अब सवाल यह है कि समाजवादी पार्टी, नसीमुद्दीन सिद्दीकी को क्यों अपने पाले में लाना चाहती है। सियासी जानकार कहते हैं कि जिस तरह से यूपी में ओवैसी अपनी ताकत बढ़ाने में लगे हैं उसकी वजह से समाजवादी पार्टी किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहती है। यह बात सच है कि ओवैसी, यूपी में उतने प्रभावी नहीं बन सके हैं, मुस्लिम समाज भी बीजेपी के खिलाफ टैक्टिकल मतदान करता है। हालांकि अगर ओवैसी मुस्लिम समाज में थोड़ा बहुत असर डालने में कामयाब होते हैं तो उसका सीधा नुकसान समाजवादी पार्टी को होगा। इसके अलावा समाजवादी पार्टी में बड़े स्तर का मुस्लिम चेहरा आजम खान हुआ करते थे। लेकिन उनके खिलाफ अदालती मामले और उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता है।

यूपी में मुस्लिम विधायकों की संख्या

2012 में कुल 69 मुस्लिम विधायक। सपा के 45, बसपा के 19, कांग्रेस के चार और अन्य-1

2017 में कुल 24 विधायक। सपा के 17, बसपा के 5 कांग्रेस के दो

2022 में कुल 34 विधायक। सपा के 31, सुभासपा-1, रालोद- 2

अगर इन आंकड़ों को देखें तो 2012 से 2022 तक मुस्लिम विधायकों की संख्या घटी है। लेकिन पार्टी के स्तर पर समाजवादी पार्टी में इस समाज का भरोसा बना रहा है। लेकिन एआईएमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी बार बार कहते हैं कि यूपी के स्थापित दल जो मुस्लिम समाज के उत्थान की बात करते हैं दरअसल वो इस समाज को सिर्फ वोटबैंक के तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं। यह बात अलग है कि समाजवादी पार्टी के नेता बार बार यह कहते हैं कि ओवैसी बीजेपी के एजेंट के तौर पर काम करते हैं। हकीकत में वो बीजेपी विरोधी मतों के एकीकरण से अधिक विभाजन का काम कर रहे हैं।

देश की कुल आबादी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 16.51 प्रतिशत है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा करीब 20 प्रतिशत यानी लगभग 3.84 करोड़ तक पहुंचता है। अनुपात के लिहाज से असम, जम्मू-कश्मीर, केरल और पश्चिम बंगाल के बाद उत्तर प्रदेश मुस्लिम आबादी के मामले में प्रमुख राज्यों में शामिल है। असम में मुस्लिम आबादी लगभग 34 प्रतिशत, जम्मू-कश्मीर में 68 प्रतिशत, केरल में 26.6 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 27 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में करीब 20 प्रतिशत है।

उत्तर प्रदेश की सियासत में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जाती है। राज्य में 80 लोकसभा और 403 विधानसभा सीटें हैं। इनमें से लगभग एक-तिहाई यानी 143 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक प्रभाव रखते हैं। करीब 43 सीटें ऐसी मानी जाती हैं, जहां मुस्लिम उम्मीदवार अपने बलबूते जीत दर्ज करने की स्थिति में होते हैं और इन इलाकों से अक्सर मुस्लिम विधायक चुने जाते रहे हैं।

भौगोलिक दृष्टि से देखें तो पूर्वांचल के कुछ हिस्सों और विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी का घनत्व अधिक है। पश्चिमी यूपी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 26.21 प्रतिशत है। राज्य के सात जिलों में मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत से अधिक है। उल्लेखनीय है कि इन सात जिलों में से छह में वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम सांसद निर्वाचित हुए थे। हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में इन्हीं जिलों में भारतीय जनता पार्टी को समाजवादी पार्टी के मुकाबले राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा।

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