शोक, सत्ता और सियासत, एनसीपी विलय पर क्यों उलझी गुत्थी?
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शोक, सत्ता और सियासत, एनसीपी विलय पर क्यों उलझी गुत्थी?

अजित पवार के निधन और सुनेत्रा पवार के उपमुख्यमंत्री बनने के बाद एनसीपी विलय की चर्चा तेज है, लेकिन राजनीतिक ध्रुवीकरण इसे फिलहाल असंभव बनाता है।


महाराष्ट्र में उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन और उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार के अचानक उपमुख्यमंत्री बनने के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के दोनों गुटों के पुनर्मिलन को लेकर अटकलें एक बार फिर तेज हो गई हैं। यह चर्चा तब और जोर पकड़ गई, जब शरद पवार ने बारामती में अजित पवार के बेटों जय और पार्थ से मुलाकात की। कई लोगों ने इस मुलाकात को महज़ शोक-संवेदना से आगे की राजनीतिक पहल के रूप में देखा।

टॉकिंग सेंस विद श्रीनि कार्यक्रम में इन घटनाक्रमों का विश्लेषण करते हुए द फेडरल के प्रधान संपादक एस. श्रीनिवासन ने कहा कि बारामती की बैठकों को जरूरत से ज्यादा राजनीतिक रंग दिया जा रहा है, हालांकि यह भी सच है कि इनके राजनीतिक निहितार्थ स्वाभाविक हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वास्तव में दो अलग-अलग घटनाएं हुई थीं। एक, विद्या भारती प्रतिष्ठान ट्रस्ट की बैठक, जिसका पवार परिवार से लंबे समय से जुड़ाव रहा है; और दूसरी, शरद पवार की सुनेत्रा पवार के निवास पर निजी शोक-संवेदना जताई।

श्रीनिवासन ने कहा कि ये बैठकें मूल रूप से व्यक्तिगत और संगठनात्मक थीं और बताया कि ट्रस्ट की बैठक में अजित पवार के निधन के बाद उनके बेटों को ट्रस्ट के कामकाज में शामिल करने का फैसला लिया गया। हालांकि, व्यापक राजनीतिक संदर्भ में विलय की चर्चा से बचना मुश्किल है। श्रीनिवासन ने कहा कि अजित पवार के निधन से पहले शरद पवार और अजित पवार के बीच पुनर्मिलन को लेकर बातचीत चल रही थी। उन्होंने बताया कि शरद पवार खेमे के अनुसार, 12 फरवरी के आसपास विलय की घोषणा की उम्मीद थी। लेकिन अजित पवार के अचानक निधन से यह पूरी प्रक्रिया बाधित हो गई।

यह स्थिति तब और नाटकीय रूप से बदल गई, जब पति के निधन के महज़ तीन दिन बाद ही सुनेत्रा पवार ने उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। श्रीनिवासन ने इस ओर इशारा किया कि शरद पवार ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि उन्हें इस कदम की जानकारी नहीं दी गई थी। उन्होंने कहा, “इस बयान ने परिवार के भीतर भरोसे, संवाद और राजनीतिक तालमेल को लेकर फिर से सवाल खड़े कर दिए।”

अब विलय की संभावनाओं का आकलन करते हुए श्रीनिवासन ने साफ शब्दों में कहा कि इस समय यह बेहद मुश्किल है। दोनों गुट राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं। जहां शरद पवार ने भाजपा और एनडीए के खिलाफ अपनी आलोचना तेज कर दी है। केंद्रीय बजट का विरोध करते हुए और किसानों के मुद्दे उठाते हुए वहीं अजित पवार का गुट, जो अब सुनेत्रा पवार के नेतृत्व में और प्रफुल्ल पटेल तथा सुनील तटकरे जैसे नेताओं के समर्थन से चल रहा है, भाजपा के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है।

श्रीनिवासन ने कहा कि यह वैचारिक अंतर तत्काल विलय को असंभव बना देता है,। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भाजपा के पास पुनर्मिलन को बढ़ावा देने का कोई खास कारण नहीं है। उन्होंने कहा कि मजबूत क्षेत्रीय दलों का विखंडन लंबे समय से भाजपा की रणनीति का हिस्सा रहा है, जैसा कि शिवसेना और एनसीपी दोनों के मामलों में देखा गया है।

श्रीनिवासन ने कहा कि असली बड़ा राजनीतिक सवाल उत्तराधिकार का है। सुनेत्रा पवार राजनीति में एक अज्ञात चेहरा हैं और यह भी स्पष्ट नहीं है कि उनके बेटे सक्रिय राजनीति में कदम रखेंगे या नहीं। उन्होंने यह भी नोट किया कि शरद पवार बारामती में पहले से ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहे हैं, ताकि असमंजस में पड़े पार्टी कार्यकर्ताओं को भरोसा दिलाया जा सके।

फिलहाल, एनसीपी के दोनों गुटों का विलय हकीकत से ज्यादा एक राजनीतिक मृगतृष्णा बना हुआ है जो शोक, विरासत और कठोर चुनावी गणित के बीच अटका हुआ है।

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