क्या बेटे के लिए रास्ता साफ कर रहे थे नीतीश? 10 साल की सियासी रणनीति पर चर्चा
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क्या बेटे के लिए रास्ता साफ कर रहे थे नीतीश? 10 साल की सियासी रणनीति पर चर्चा

नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री का रास्ता साफ माना जा रहा है। जेडीयू के भीतर उन्हें भविष्य के नेतृत्व के रूप में देखने की चर्चा तेज हो गई है।


नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की सियासत में एंट्री का रास्ता पूरी तरह साफ हो चुका है। निशांत कुमार को लेकर पहले भी चर्चा होती रही कि नीतीश जी को उन्हें राजनीतिक मैदान में उतारना चाहिए। यह बात अलग है कि बिहार के सीएम नीतीश कुमार इस विषय पर चुप्पी साधे रहते थे। लेकिन जब उन्होंने राज्यसभा जाने का फैसला किया तो एक बार फिर निशांत के मुद्दे पर जेडीयू के अंदर से आवाज उठी कि यह सही समय है जब उन्हें सियासी पारी शुरू करनी चाहिए। ऐसे में कई तरह के सवाल भी हैं कि क्या नीतीश कुमार को सही मौके की तलाश थी। क्या नीतीश कुमार ने बेहद चतुराई से अपने बेटे के लिए रास्ता बनाया। क्या उन्हें ऐसा लगता था कि अगर निशांत के संबंध में वो कोई फैसला पहले करते तो शायद उसका विरोध होता।

बिहार की सियासत पर नजर रखने वाले कहते हैं कि नीतीश की उम्र, स्वास्थ्य को देखते हुय यह सवाल था कि उनके बाद कौन। इसके लिए थोड़ा इतिहास में चलने की जरूरत है। साल 2003 में नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडिस, शरद यादव के साथ मिलकर जेडीयू का गठन किया। जॉर्ज फर्नांडिस उस समय पार्टी के अध्यक्ष हुआ करते थे। लेकिन जमीनी स्तर पर प्रभाव नीतीश कुमार का था। 2005 में जब नीतीश कुमार बिहार के सीएम बने तो पहला काम यह किया कि साल 2006 में जॉर्ज को राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से हटा दिया। शरद यादव को कमान सौंपी। इस तरह से जॉर्ज का दखल जेडीयू में खत्म हो गया।

शरद यादव को जब जेडीयू की कमान मिली तो वे अपने हिसाब से पार्टी को चलाना चाहते थे। लेकिन व्यवहारिक तौर पर उनकी पार्टी में नहीं चलती थी। नीतीश का ही निर्णय सर्वोपरि होता था। दोनों के बीच खटास बढ़ती गई और साल 2016 में नीतीश कुमार खुद पार्टी के अध्यक्ष बन गए। दो साल बाद यानी साल 2018 में शरद यादव ने नीतीश से अलग राह चुन ली और खुद की पार्टी बनाई। यानी कि 2003 से लेकर 2016 यानी 13 साल में पार्टी के दो दिग्गजों के दखल को पूरी तरह खत्म दिया।

2006 से लेकर 2017 के दौर में जेडीयू के अंदर कई और चेहरों का उभार हुआ। जैसे आरसीपी सिंह, 2020 में उन्हें जेडीयू की कमान मिली। लेकिन दो साल में ही रिश्ते तल्ख हो गए और उन्होंने अलग रास्ता चुन लिया। आरसीपी सिंह पहले बीजेपी और बाद में जनसुराज के हिस्सा बने। 2015 में नीतीश- लालू की सरकार बनवाने में प्रशांत किशोर की अहम भूमिका रही। ऐसी तस्वीर बनने लगी कि नीतीश के बाद जेडीयू का बड़ा चेहरा प्रशांत किशोर हैं। लेकिन दोनों का रिश्ता लंबा नहीं चला। इसी तरह कोइरी समाज से आने वाले उपेंद्र कुशवाहा भी नीतीश के खास रहे। लेकिन महत्वाकांक्षा की लड़ाई में उपेंद्र कुशवाहा भी अलग हो गए।

नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार साल 2025 से मीडिया के सामने आने लगे। पहली बार बख्तियारपुर में 17 जनवरी 2025 को कहा कि उनके पिता ने अच्छा काम किया है। इस वजह से आप लोग जेडीयू और उनकी पार्टी को मत दीजिए। लेकिन सियासी एंट्री पर जवाह न तो हां और न ही ना में था। हालांकि अब धीरे धीरे सियासी बयान सामने आने लगे। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए जब सीएम चेहरे को लेकर गहमागहमी थी तब उन्होंने कहा कि अमित अंकल(अमित शाह) को उनके पिता को सीएम चेहरा घोषित कर देना चाहिए था। लेकिन निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री के लिए जेडीयू के नेता तब लामबंद होने लगे जब विधानसभा चुनाव में 85 सीटों पर जीत मिली। पार्टी के नेता यह कहने लगे कि अब नीतीश जी को अपने बेटे को राजनीति में उतार देना चाहिए।

5 दिसंबर 2025 को पटना एयरपोर्ट पर संजय झा ने कहा कि पार्टी के कार्यकर्ता, शुभचिंतक और समर्थक चाहते हैं कि निशांत कुमार सक्रिय भूमिका में नजर आएं। हालांकि निर्णय तो उन्हें ही करना है। हालांकि इस बयान से कुछ दिन पहले उन्होंने गोलमोल जवाब दिया था।

निशांत के सक्रिय राजनीति में आने के क्या माएने हैं। बिहार के सियासी पंडित कहते हैं कि इससे जेडीयू का भविष्य तय हो गया। नीतीश के बाद भी पार्टी चलती रहेगा क्योंकि नीतीश के बाद ऐसा कोई बड़ा नेता निशांत कुमार को छोड़कर नहीं है जिस पर सबकी सहमति बन सके। नीतीश के करीब नेताओं में ललन सिंह, संजय झा, विजय चौधरी, अशोक चौधरी हैं। लेकिन नीतीश के आधार वोट बैंक कुर्मी-कोइरी और आर्थिक तौर पर पिछड़ा वर्ग में वो फिट नहीं बैठते।

सियासी जानकार कहते हैं कि निशांत कुमार के राजनीतिक आगाज का मतलब यह है कि नीतीश के बाद कौन सवाल का जवाब मिल जाएगा। निशांत के अलावा किसी चेहरे को आगे बढ़ाने का अर्थ यह था कि कई गुटों का निर्माण होता जो पार्टी के लिए सही नहीं होता। निशांत कुमार के बार में यह कहा जाता है कि भले ही वो अभी राजनीतिक तौर पर परिपक्व ना हों। लेकिन सियासी माहौल में पले बढ़े हैं तो सियासत की कड़वी सच्चाई को वो समझते हैं। भले ही उनके पिता ने अपनी राजनीति के अंतिम बेला में दिल्ली का चयन किया हो लेकिन वो कहते हैं कि पटना उनके दिल के करीब रहा है और रहेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि मुश्किल की घड़ी में निशांत को अपने पिता से बेहतर सियासी नफा नुकसान को समझाने वाला दूसरा कौन होता।

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