सम्मान, संकेत और सियासत, किताब के मंच से भारत रत्न तक, क्यों अलग-थलग पड़े केसी त्यागी
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सम्मान, संकेत और सियासत, किताब के मंच से भारत रत्न तक, क्यों अलग-थलग पड़े केसी त्यागी

जेडीयू के कद्दावर नेता केसी त्यागी द्वारा नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग के बाद पार्टी से उनकी दूरी बढ़ गई। यह विवाद भारत रत्न के नियमों और सियासत दोनों को नई बहस में ले आया।


सियासत में कोई भी व्यक्ति अपरिहार्य नहीं होता। यह बात केसी त्यागी के मौजूदा हालात से साफ झलकती है। दशकों तक जेडीयू का वैचारिक चेहरा रहे केसी त्यागी ने जब नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग उठाई, तो शायद उन्होंने इसे सम्मान और विचारधारा की लड़ाई माना। लेकिन पार्टी ने इसे राजनीतिक असहजता के रूप में देखा। लेकिन क्या बात सिर्फ इतनी सी भर है। यहां बता दें कि विश्व पु्स्तक मेले में केसी त्यागी की किताब का संकट की खेती का लोकार्पण हो रहा था। जिसमें आरएलडी के अध्यक्ष जयंत चौधरी भी मौजूद थे।

भारत रत्न का मुद्दा यहां केवल सम्मान का नहीं बल्कि टाइमिंग और सियासी संदर्भ का भी है। जिस दौर में जेडीयू राष्ट्रीय राजनीति में संतुलन साधने की कोशिश कर रही है उसी वक्त प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर भारत रत्न की मांग उठाना पार्टी नेतृत्व को जोखिम भरा लगा। नतीजा यह हुआ कि जेडीयू ने खुद को इस मांग से अलग कर लिया और केसी त्यागी धीरे-धीरे संगठन से हाशिये पर चले गए। सियासी जानकार कहते हैं भले ही बिहार के सीएम नीतीश कुमार की तरफ से के सी त्यागी को लेकर किसी तरह की टिप्पणी ना आई हो। जेडीयू के दूसरे नेताओं को यह लगता है कि के सी त्यागी भले ही जेडीयू के बड़े चेहरे हों। लेकिन उनके बेटे अमरीश त्यागी बीजेपी की ओर से सियासत करते हैं। वैसे राजनीति में यह कोई अलहदा उदाहरण नहीं है जब बाप किसी और दल में बेटा किसी और दल में या उसके सगे संबंधी तीसरे दल में ना हों।

जिस तरह से नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग पर विवाद गहराया और के सी त्यागी हासिए पर गए उससे साबित होता है कि भारत रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान भी पूरी तरह राजनीति से अछूते नहीं हैं। सम्मान की पात्रता से ज्यादा अहम हो जाता है कि कौन-सी मांग किस समय और किस मंच से उठाई जा रही है। केसी त्यागी के मामले में यह मांग उनके लंबे राजनीतिक अनुभव के बावजूद पार्टी लाइन से बाहर मानी गई।

भारत रत्न भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है लेकिन इसे लेकर अक्सर यह भ्रम रहता है कि यह सम्मान किन शर्तों पर और किन लोगों को दिया जा सकता है। हाल ही में जेडीयू नेता केसी त्यागी द्वारा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग के बाद यह सवाल फिर चर्चा में है कि क्या जीवित नेताओं को भारत रत्न दिया जा सकता है यहां आपको बताएंगे कि इसकी प्रक्रिया क्या है?

भारत रत्न की शुरुआत 1954 में हुई थी। शुरुआती नियमों के तहत यह सम्मान केवल जीवित व्यक्तियों को उनकी असाधारण सेवाओं के लिए दिया जाता था। वर्ष 1966 में नियमों में बदलाव कर मरणोपरांत सम्मान देने का प्रावधान जोड़ा गया। इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री पहले ऐसे व्यक्ति बने जिन्हें मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया।

नियमों के अनुसार भारत रत्न के लिए कोई औपचारिक नामांकन प्रक्रिया नहीं होती। प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति यह सम्मान प्रदान करते हैं। सामान्य तौर पर एक वर्ष में अधिकतम तीन व्यक्तियों को यह पुरस्कार दिया जाता है, हालांकि विशेष परिस्थितियों में इससे अधिक लोगों को भी सम्मानित किया गया है।

आंकड़ों के अनुसार अब तक कुल 53 व्यक्तियों को भारत रत्न से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें से अधिकांश को यह सम्मान उनके जीवनकाल में ही मिला। हाल के वर्षों में देखें तो 2024 में लालकृष्ण आडवाणी को जीवित रहते हुए भारत रत्न दिया गया। उनसे पहले सचिन तेंदुलकर (सबसे कम उम्र में) अटल बिहारी वाजपेयी, लता मंगेशकर और अमर्त्य सेन जैसी विभूतियों को भी यह सम्मान उनके जीवनकाल में प्राप्त हुआ इससे साफ है कि भारत रत्न जीवित व्यक्तियों को दिया जाना कोई अपवाद नहीं है।

नीतीश कुमार के समर्थकों तर्क गढ़ते हैं कि बिहार में बुनियादी ढांचे, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सुधारों में उनका योगदान उन्हें इस सम्मान के योग्य बनाता है। वहीं आलोचकों का कहना है कि भारत रत्न का चयन पूरी तरह राजनीतिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर के योगदान के आधार पर होना चाहिए। यही वजह है कि यह मांग नियमों से ज्यादा राजनीतिक बहस का विषय बन गई है।

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