
पांच दशक बाद बदल रहा बिहार का राजनीतिक समीकरण, जेपी दौर ढलान पर
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के साथ बिहार की राजनीति में जेपी आंदोलन से निकली पीढ़ी का दौर खत्म होने की ओर है। अब सामाजिक समीकरण साधना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती होगी।
बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का राज्यसभा के लिए नामांकन सिर्फ एक व्यक्तिगत राजनीतिक फैसला नहीं है, बल्कि यह राज्य की राजनीति के एक लंबे दौर के अंत और नए राजनीतिक चरण की शुरुआत का संकेत भी माना जा रहा है। करीब पांच दशकों तक बिहार की राजनीति जिस पीढ़ी के नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही, वह अब धीरे-धीरे राजनीतिक केंद्र से बाहर होती दिख रही है। खासतौर पर जेपी आंदोलन से निकले नेताओं का प्रभाव, जिसने 1980 के दशक से राज्य की राजनीति को आकार दिया, अब लगभग समाप्ति की ओर है।
दरअसल बिहार की राजनीति को लंबे समय तक तीन प्रमुख चेहरों ने दिशा दी। लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान। इन तीनों नेताओं की राजनीति की जड़ें जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में थीं, जिसने आपातकाल के बाद देश की राजनीति में एक नई पीढ़ी को जन्म दिया था। इन नेताओं ने न सिर्फ बिहार की सत्ता संरचना को प्रभावित किया, बल्कि कई मौकों पर राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों में भी निर्णायक भूमिका निभाई। हालांकि अब यह तिकड़ी सक्रिय राजनीति के केंद्र में नहीं रह गई है। रामविलास पासवान का निधन हो चुका है, लालू प्रसाद यादव स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय राजनीति से दूर हैं और नेतृत्व की जिम्मेदारी अपने बेटे तेजस्वी यादव को सौंप चुके हैं। वहीं नीतीश कुमार, जो पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में रहे, अब राज्यसभा के जरिए दिल्ली की राजनीति की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं।
इस दौर के अन्य महत्वपूर्ण नेता सुशील कुमार मोदी भी थे, जो लंबेसमय तक बिहार की राजनीति में भाजपा का चेहरा रहे और नीतीश कुमार के साथ उपमुख्यमंत्री के रूप में सरकार चलाते रहे। उनका भी निधन हो चुका है। ऐसे में यह साफ दिखता है कि बिहार की राजनीति उस पीढ़ी से आगे बढ़ रही है जिसने 1990 के दशक से लेकर अब तक राज्य की सत्ता और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया।
नीतीश कुमार के संभावित तौर पर सक्रिय राज्य की राजनीति से हटने के बाद सबसे बड़ा सवाल सामाजिक और जातीय समीकरणों का है। 2005 में सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार ने जिस सामाजिक गठजोड़ को तैयार किया, वह उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बना। उन्होंने अति पिछड़ा वर्ग और अति दलित समुदाय को राजनीति के केंद्र में लाकर एक ऐसा वोट बैंक तैयार किया, जिसने उन्हें लंबे समय तक सत्ता में बनाए रखा। इसी सामाजिक समीकरण के कारण आरजेडी कई बार मजबूत चुनौती देने के बावजूद स्पष्ट बहुमत हासिल करने से चूकती रही।
इसके अलावा कुर्मी-कुशवाहा यानी तथाकथित ‘लव-कुश’ समीकरण भी नीतीश कुमार की राजनीति का अहम आधार रहा। यह भले ही कुल आबादी का सीमित हिस्सा हो, लेकिन राजनीतिक रूप से प्रभावशाली रहा है। हालांकि नीतीश कुमार की खासियत यह रही कि वे सिर्फ अपनी जातीय पहचान तक सीमित नेता नहीं रहे, बल्कि अलग-अलग सामाजिक वर्गों में उनकी एक व्यापक स्वीकार्यता बनी रही।
अब अगर बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री बनता है, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह इस व्यापक सामाजिक संतुलन को किस हद तक बनाए रख पाता है। बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से निर्णायक रहे हैं और उन्हें साधना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होता।
राजनीतिक छवि के स्तर पर भी नीतीश कुमार ने एक स्पष्ट नैरेटिव खड़ा किया था। उन्होंने आरजेडी के शासन को ‘जंगलराज’ का नाम देकर अपनी राजनीति को ‘सुशासन’ की अवधारणा से जोड़ा। इस रणनीति ने उन्हें एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में स्थापित करने में मदद की। अब भाजपा के सामने चुनौती होगी कि वह ऐसा नेतृत्व सामने लाए जो कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक सुधार और विकास की उसी छवि को आगे बढ़ा सके।
इसके साथ ही महिलाओं के बीच नीतीश कुमार का समर्थन भी उनकी राजनीति की एक बड़ी ताकत रहा है। शराबबंदी, जीविका समूहों को बढ़ावा और महिलाओं के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं ने उन्हें महिला मतदाताओं के बीच खासा लोकप्रिय बनाया। यही कारण है कि चुनावी राजनीति में महिलाओं का समर्थन अक्सर उनके पक्ष में जाता रहा।
इन सभी वजहों को देखते हुए स्पष्ट है कि नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना सिर्फ एक पद परिवर्तन नहीं है बल्कि बिहार की राजनीति के एक संक्रमण काल की शुरुआत भी है। आने वाले समय में भाजपा के सामने कानून-व्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और जातीय संतुलन जैसे मुद्दों को साधने की चुनौती होगी। यदि पार्टी इन तीनों मोर्चों पर संतुलन बना पाती है, तो वह बिहार में अपनी राजनीतिक पकड़ को लंबे समय तक मजबूत बनाए रख सकती है।

