
नोएडा टेक इंजीनियर की मौत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तार बिल्डर को तुरंत रिहा करने को कहा
अदालत ने कहा कि पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तारी के कारण बताने वाला अरेस्ट मेमो नहीं दिया, जो हाईकोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन है।
नोएडा में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार समेत गड्ढे में गिरने से हुई मौत के मामले को अभी महीनाभर भी नहीं हुआ है कि इस मामले में गिरफ्तार बिल्डर की रिहाई के आदेश हो गए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुरुवार को रियल एस्टेट कंपनी विज़टाउन प्लानर्स लिमिटेड के निदेशक अभय कुमार को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है।
अदालत ने कहा कि पिछले महीने नोएडा में एक इंजीनियर की मौत के मामले में उनकी गिरफ्तारी अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना की गई थी। गौतम बुद्ध नगर पुलिस ने 20 जनवरी को अभय कुमार को गैर-इरादतन हत्या, लापरवाही से मौत और मानव जीवन को खतरे में डालने वाले कृत्य के आरोपों में गिरफ्तार किया था। यह इसलिए क्योंकि वर्ष 2019-20 से विज़टाउन के पास उस ज़मीन का कब्जा था जहां युवराज की मौत हुई।
16 जनवरी को सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत हो गई थी, जब उनकी कार नोएडा के सेक्टर 150 में पानी से भरे एक गहरे गड्ढे में गिर गई थी। बताया गया कि वह करीब दो घंटे तक मदद के लिए चिल्लाते रहे।
अभय कुमार की गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए दायर हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करते हुए, न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने संबंधित अधिकारियों को याचिकाकर्ता को रिहा करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि पुलिस ने गिरफ्तारी के कारणों का खुलासा करने वाला अरेस्ट मेमो आरोपी को नहीं दिया, जो हाईकोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन है।
उल्लेखनीय है कि 22 जनवरी को इसी खंडपीठ ने इसी आधार पर उमंग रस्तोगी नाम के व्यक्ति की रिहाई का भी आदेश दिया था, जिसने गौतम बुद्ध नगर पुलिस द्वारा की गई अपनी गिरफ्तारी को इसी वजह से चुनौती दी थी।
वर्तमान याचिका में, बिल्डर अभय कुमार ने अवैध हिरासत से रिहाई के निर्देश देने और निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन न करने के कारण गिरफ्तारी, हिरासत और रिमांड को अवैध, शून्य और निरस्त घोषित करने की मांग की। याचिका में गौतम बुद्ध नगर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित रिमांड आदेशों को भी रद्द करने का अनुरोध किया गया था।
उमंग रस्तोगी मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कुमार के वकील ने दलील दी कि इस मामले में भी अरेस्ट मेमो के क्लॉज 13 का पालन नहीं किया गया और गिरफ्तारी से पहले यह मेमो याचिकाकर्ता को उपलब्ध नहीं कराया गया।
दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने टिप्पणी की, “…हम पाते हैं कि इस मामले के तथ्य इस न्यायालय के उपर्युक्त निर्णय से आच्छादित हैं… अरेस्ट मेमो के क्लॉज 13 के उल्लंघन के कारण आरोपी की गिरफ्तारी की गई।” अदालत ने अपने आदेश में कहा, उपरोक्त के मद्देनज़र संबंधित प्राधिकरण को निर्देश दिया जाता है कि वह कॉर्पस/याचिकाकर्ता को तत्काल रिहा करे।
अपने 22 जनवरी के आदेश में, खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी को निर्देश दिया था कि गिरफ्तारी करते समय निर्धारित दस्तावेज़ में आरोपी को गिरफ्तारी के आधार न बताने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। अदालत ने यह भी कहा था कि ऐसी अवैधता में लिप्त अधिकारियों को निलंबन के बाद विभागीय जांच का सामना करना चाहिए, ताकि इस तरह की हरकतों पर रोक लग सके।

