महिलाएं, जनसंख्या और राजनीति,मारन के बयान से क्यों भड़की उत्तर-दक्षिण की बहस?
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महिलाएं, जनसंख्या और राजनीति,मारन के बयान से क्यों भड़की उत्तर-दक्षिण की बहस?

दयानिधि मारन का बयान उत्तर भारत की महिलाएं बच्चे पैदा करती हैं और दक्षिण में शिक्षा पर जोर है। इस बयान को जानकार जमीनी हकीकत से ज्यादा राजनीतिक शोर बता रहे हैं।


Dayanidhi Maran Statement: डीएमके के कद्दावर नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री दयानिधि मारन का कहना है कि उत्तर भारत की औरतें सिर्फ बच्चे पैदा करती हैं और दक्षिण भारत की महिलाओं में शिक्षा पर जोर दिया जाता है। उनके इस बयान पर तहलका मच गया, पूरजोर आलोचना हुई। इस खास बयान पर संकेत के साथ एनालिटिकल इंटेलिजेंस के खास कार्यक्रम में द फेडरल के एडिटर-इन-चीफ एस श्रीनिवासन ने बड़े फलक को विस्तार से बताया। 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले तमिलनाडु में हाल ही में उत्तर-दक्षिण टिप्पणियों से उठे राजनीतिक विवाद को समझाया। वह बताते हैं कि ऐसी टिप्पणियां - जो अक्सर आबादी, संस्कृति और महिलाओं की भूमिकाओं के इर्द-गिर्द होती हैं - ज़मीनी हकीकत को क्यों नहीं दिखातीं, खासकर ऐसे राज्य में जो उत्तरी भारत से आने वाले प्रवासी मज़दूरों पर बहुत ज़्यादा निर्भर है।

पूरे भारत में रहने और काम करने के अपने अनुभव के आधार पर, श्रीनिवासन बताते हैं कि कैसे प्रवासन, जनसांख्यिकीय बदलाव और आर्थिक निर्भरता राजनीतिक बयानबाजी से टकराते हैं। वह इस चर्चा को चलाने वाली गहरी संघीय चिंताओं को भी समझाते हैं, खासकर परिसीमन, वित्त आयोग के आवंटन, केंद्र-राज्य तनाव और आबादी नियंत्रण में शुरुआती सफलता के बावजूद दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व खोने की संभावना के बारे में डर।

सवाल- डीएमके सांसद दयानिधि मारन के बयान को लेकर विवाद क्यों हुआ?
जवाब- दयानिधि मारन ने कहा कि उत्तर भारत की महिलाएँ बच्चे पैदा करती हैं, जबकि दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु की महिलाएं स्कूल जाती हैं। इस बयान को कई लोगों ने अपमानजनक, विभाजनकारी और महिलाओं को लेकर असंवेदनशील माना। आलोचकों का कहना है कि यह उत्तर-दक्षिण के बीच अनावश्यक ध्रुवीकरण पैदा करता है।

सवाल-क्या यह बयान चुनावी रणनीति का हिस्सा है?

जवाब- विश्लेषकों के अनुसार, 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं और ऐसे बयानों का उद्देश्य यह दिखाना हो सकता है कि डीएमके का सामाजिक रिकॉर्ड उत्तर भारत की तुलना में बेहतर है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसे बयान ज़मीनी स्तर पर वोट दिलाने में मदद करेंगे।

सवाल- क्या उत्तर-दक्षिण की तुलना का तमिलनाडु में कोई वास्तविक प्रभाव पड़ता है?

जवाब- नहीं। तमिलनाडु के शिक्षित वर्ग में इस तरह की बयानबाज़ी को गंभीरता से नहीं लिया जाता। लोग जानते हैं कि राजनीति में ऐसे बयान अक्सर ध्यान खींचने के लिए दिए जाते हैं, न कि किसी ठोस समाधान के लिए।

सवाल- क्या इस तरह के बयान गठबंधन सहयोगियों को नुकसान पहुँचाते हैं?

जवाब- हां। पहले भी ऐसे उदाहरण रहे हैं जब डीएमके नेताओं के बयानों की वजह से कांग्रेस जैसे गठबंधन सहयोगियों को सफ़ाई देनी पड़ी। इससे गठबंधन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

सवाल- तमिलनाडु में उत्तर भारतीय प्रवासियों को लेकर ज़मीनी सच्चाई क्या है?

जवाब- तमिलनाडु में बड़ी संख्या में उत्तर भारत से आए प्रवासी मज़दूर काम कर रहे हैं—होटल, निर्माण, उद्योग और सेवा क्षेत्र में। आम तौर पर उनके साथ कोई बड़ा सामाजिक टकराव नहीं है और स्थानीय अर्थव्यवस्था इन मज़दूरों पर काफी निर्भर है।


सवाल- जनसंख्या और डिलिमिटेशन (सीमांकन) का मुद्दा क्यों उठाया जा रहा है?

जवाब- दक्षिणी राज्यों की चिंता है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई, लेकिन भविष्य में लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण जनसंख्या के आधार पर हुआ तो उनकी राजनीतिक ताक़त कम हो सकती है, जबकि उत्तर भारत की बढ़ती जनसंख्या वाले राज्यों को ज़्यादा सीटें मिल सकती हैं।

सवाल- क्या यह डर जायज़ है कि दक्षिण को सज़ा मिलेगी?

जवाब-यह डर वास्तविक है और इसे एक संघीय (फेडरल) मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है। सिर्फ़ राजनीतिक प्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि वित्त आयोग के ज़रिए मिलने वाले केंद्रीय फंड के बँटवारे में भी जनसंख्या एक बड़ा मानदंड है।

सवाल- क्या ज़्यादा बच्चे पैदा करना समाधान हो सकता है?

जवाब- नहीं। विशेषज्ञों के मुताबिक, जनसंख्या बढ़ाने के लिए लोगों को प्रेरित करना एक ख़तरनाक और अव्यावहारिक विचार है। असली समाधान बेहतर नीति, संसाधनों का न्यायपूर्ण बँटवारा और संतुलित डिलिमिटेशन फ़ॉर्मूला है।

सवाल- क्या तमिल पहचान बनाम राष्ट्रीय पहचान की राजनीति हो रही है?

जवाब- हाँ, कुछ हद तक। जब केंद्र और राज्य के बीच तनाव बढ़ता है जैसे भाषा, शिक्षा, राज्यपाल की भूमिका या फंडिंग को लेकर तो पहचान की राजनीति तेज़ हो जाती है। लेकिन यह ज़्यादातर राजनीतिक विमर्श तक सीमित रहती है।

सवाल-निष्कर्ष क्या है?

जवाब-ऐसे बयान ज़्यादा शोर पैदा करते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इनका प्रभाव सीमित होता है। असली मुद्दे संघवाद, संसाधनों का बंटवारा और भविष्य की डिलिमिटेशन प्रक्रिया हैं, जिन पर गंभीर और संतुलित चर्चा की ज़रूरत है।

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