
नोएडा के गांवों में बच्चा चोरी की अफवाहों से दहशत, अभिभावकों ने छोड़ी नौकरियां और बदली दिनचर्या
हाल के हफ्तों में गांवों में लड़कियों के लापता होने की अफवाहें तेजी से फैली हैं। पुलिस के हवाले से बताया गया कि जनवरी में दिल्ली में कथित रूप से लड़कियों के गायब होने से जुड़ी एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद यह डर बढ़ा।
नोएडा के कई गांव इन दिनों बच्चा चोरी की अफवाहों की चपेट में हैं। सोशल मीडिया पर फैल रहे अपुष्ट संदेशों और मोहल्लों में चल रही चर्चाओं ने अभिभावकों के बीच ऐसा डर पैदा कर दिया है कि कई महिलाओं ने नौकरियां छोड़ दी हैं, पुरुषों ने अपनी ड्यूटी शिफ्ट बदल ली है और कुछ परिवारों ने बच्चों को स्कूल भेजना तक बंद कर दिया है।
मीडिया रिपोर्ट बता रही है कि सरफाबाद गांव की रहने वाली गुड्डी ने दो घरों में खाना बनाने का काम छोड़ दिया है ताकि वह दोपहर में अपने छह वर्षीय बेटे के स्कूल से लौटने के समय घर पर रह सके। उनका कहना है कि स्कूल से बाहर निकलने के बाद बच्चों की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट जिम्मेदारी न होने की बात ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। “हम जोखिम नहीं उठा सकते,” उन्होंने कहा।
हाल के हफ्तों में गांवों में लड़कियों के लापता होने की अफवाहें तेजी से फैली हैं। मीडिया रिपोर्ट में पुलिस के हवाले से बताया गया कि जनवरी में दिल्ली में कथित रूप से लड़कियों के गायब होने से जुड़ी एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद यह डर बढ़ा। हालांकि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि बच्चे के अपहरण की कोई शिकायत या सत्यापित मामला सामने नहीं आया है। पुलिस ने लोगों से अपुष्ट जानकारी साझा न करने की अपील की है।
फिर भी अफवाहों का असर जमीनी स्तर पर साफ दिख रहा है। कई परिवारों ने एहतियातन बच्चों को अकेले बाहर भेजना बंद कर दिया है। कुछ इलाकों में स्थानीय लोग संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए स्वयं निगरानी कर रहे हैं। एक घरेलू सहायिका ने बताया कि वह अब हर दिन काम से जल्दी लौट आती हैं, क्योंकि “भले ही अफवाह हो, डर तो असली है।”
गैर-सरकारी संगठनों और स्कूलों पर भी इसका प्रभाव पड़ा है। नगला, तुगलपुर और हल्दोनी में संचालित कुछ शिक्षा केंद्रों में उपस्थिति में तेज गिरावट दर्ज की गई है। एक एनजीओ संचालक ने बताया कि फील्ड विजिट में कोई घटना सामने नहीं आई, लेकिन अभिभावकों ने एहतियात के तौर पर बच्चों को भेजना बंद कर दिया।
पास के गांवों के प्राथमिक विद्यालयों में भी उपस्थिति घटी है। कुछ निजी स्कूलों ने सुरक्षा उपायों को सख्त करते हुए अभिभावकों से लिखित सहमति पत्र लेना शुरू कर दिया है, जिसमें बच्चों के आने-जाने की व्यवस्था और अधिकृत अभिभावक की जानकारी अनिवार्य की गई है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की अफवाहें पहले भी सामने आती रही हैं और बाद में गलत साबित होती हैं। उनका मानना है कि सोशल मीडिया के जरिए फैलने वाली भ्रामक सूचनाएं सामुदायिक जीवन को प्रभावित कर सकती हैं और अनावश्यक भय का माहौल बना सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि 2018-19 में देश के कई हिस्सों में बच्चा चोरी की अफवाहों के चलते भीड़ हिंसा की घटनाएं हुई थीं। ऐसे में प्रशासन और नागरिकों दोनों की जिम्मेदारी है कि किसी भी अपुष्ट सूचना को साझा करने से पहले उसकी पुष्टि करें, ताकि अफवाहें सामाजिक ताने-बाने को नुकसान न पहुंचाएं।

