PCS अधिकारी का विद्रोह या नियमों का उल्लंघन? अलंकार अग्निहोत्री मामले में विवाद बढ़ा
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PCS अधिकारी का विद्रोह या नियमों का उल्लंघन? अलंकार अग्निहोत्री मामले में विवाद बढ़ा

पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे के बाद निलंबन और विभागीय जांच शुरू हो चुकी है। सोशल मीडिया पोस्ट, कंडक्ट रूल्स और गणतंत्र दिवस टिप्पणी से मामला बढ़ गया।


Alankar Agnihotri suspension: बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे ने प्रशासनिक अमले में हड़कंप मचा दिया है। इस्तीफे के बाद देर रात तक जिले के वरिष्ठ अधिकारी उन्हें समझाने और मनाने की कोशिश करते रहे, लेकिन अलंकार अपने फैसले पर अडिग रहे। इसके बाद आधी रात को उनके निलंबन के आदेश जारी कर दिए गए।

इस्तीफे के साथ ही शासन ने न केवल उन्हें निलंबित किया, बल्कि शामली से संबद्ध (Attached) करते हुए उनके खिलाफ विभागीय जांच के भी आदेश दे दिए हैं। प्रशासनिक हलकों में अब यह सवाल उठ रहा है कि आईटी सेक्टर में करीब 10 साल का कॉर्पोरेट अनुभव रखने वाले और पहली ही कोशिश में पीसीएस परीक्षा पास करने वाले अधिकारी से यह चूक आखिर कहां हुई?

सर्विस कंडक्ट रूल्स की अनदेखी

अलंकार अग्निहोत्री की सबसे बड़ी चूक उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली (Service Conduct Rules) की अनदेखी मानी जा रही है।नियमों के तहत किसी भी सेवारत अधिकारी को किसी राजनीतिक दल या विचारधारा के खिलाफ सार्वजनिक रूप से मोर्चा खोलने की अनुमति नहीं होती।

अलंकार अग्निहोत्री ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में Boycott BJP जैसे शब्दों का प्रयोग किया, जिसे सीधे तौर पर अनुशासन की लक्ष्मण रेखा लांघना माना गया। इसी आधार पर शासन को उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई का स्पष्ट कारण मिल गया।

इस्तीफे की प्रक्रिया में भी हुई चूक

सरकारी सेवा में इस्तीफा देने की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है, जिसके तहत इस्तीफा नियुक्ति प्राधिकारी (Appointing Authority) को सौंपा जाता है।अलंकार अग्निहोत्री ने न केवल इस्तीफा सोशल मीडिया पर सार्वजनिक किया बल्कि सरकारी नीतियों को काला कानून करार दिया।

प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वे व्यक्तिगत कारणों का हवाला देकर इस्तीफा देते, तो मामला शायद इतना नहीं बढ़ता। लेकिन राजनीतिक और वैचारिक भाषा ने इस पूरे प्रकरण को प्रशासनिक विद्रोह के रूप में पेश कर दिया।

गणतंत्र दिवस पर टिप्पणी ने बढ़ाई मुश्किलें

जिस दिन राज्य में मुख्यमंत्री और राज्यपाल संविधान, कानून और लोकतंत्र की मजबूती की बात कर रहे थे, उसी दिन एक अधिकारी द्वारा व्यवस्था को गनतंत्र कहे जाने को शासन ने गंभीरता से लिया।गणतंत्र दिवस जैसे संवेदनशील मौके पर इस तरह की टिप्पणी को प्रशासन ने अति-उत्साह और अनुशासनहीनता की श्रेणी में माना, जिससे शासन की छवि को नुकसान पहुंचने की आशंका जताई गई।

पद की गरिमा बनाम व्यक्तिगत विचारधारा

अलंकार अग्निहोत्री को एक सुलझा हुआ और लक्ष्य-केन्द्रित अधिकारी माना जाता रहा है। लेकिन प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य के शिष्यों के साथ हुए व्यवहार और UGC से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने अपनी व्यक्तिगत विचारधारा और धार्मिक संवेदनशीलता को प्रशासनिक दायित्वों से ऊपर रख दिया।प्रशासनिक सेवाओं में तटस्थता (Neutrality) को सबसे आवश्यक गुण माना जाता है, जिसकी कमी इस प्रकरण में स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

जांच का शिकंजा

बरेली मंडलायुक्त को सौंपी गई जांच में अब अलंकार अग्निहोत्री के पिछले सेवा रिकॉर्ड, सोशल मीडिया गतिविधियों और सार्वजनिक बयानों की गहन समीक्षा की जाएगी। निलंबन अवधि के दौरान उन्हें शामली डीएम कार्यालय में उपस्थिति देनी होगी और केवल आधा वेतन (गुजारा भत्ता) मिलेगा। यदि जांच में यह साबित हो गया कि उन्होंने जानबूझकर सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है, तो उनकी सेवा स्थायी रूप से समाप्त भी की जा सकती है।

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