
डेरा के जरिये पंजाब में सियासी घेरा?, पीएम मोदी के डेरा सच्चखंड के दौरे के राजनीतिक मायने क्या हैं?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डेरा सच्चखंड बल्लां के दौरे को रविदासिया दलित समुदाय को साधने की एक सोची-समझी राजनीतिक कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। वैसे भी बीजेपी पंजाब में राजनीतिक जमीन की तलाश में है।
जो डर गया, वो डेरा गया। पंजाब और हरियाणा की राजनीति में डेरों की अहमियत को इस एक लाइन से ही समझ सकते हैं। अक्सर चुनावी मौसम में हाईप्रोफाइल नेताओं का डेरों में आना-जाना बढ़ जाता है। हरियाणा में अगर बलात्कार के केस में दोषी साबित हो चुके और जेल में सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम को समय-समय पर पैरोल या फरलो मिलती रहती है, तो उसे कतई सामान्य घटना नहीं माना जा सकता। इसे उस डेरे के राजनीतिक असर के तौर पर भी देखा जाता है। जहां तक पंजाब में धार्मिक डेरों की बात है, तो इन डेरों से भी बड़ी तादाद में दलित आबादी जुड़ी हुई है, लिहाजा उनका भी एक अलग राजनीतिक प्रभाव है।
डेरों की चर्चा एक बार फिर से हो रही है तो इसकी दो बड़ी वजहे ंहैं। पहली तो यह कि इस बार गणतंत्र दिवस के दौरान केंद्र सरकार ने पंजाब के जालंधर स्थित डेरा सच्चखंड बल्लां प्रमुख संत निरंजन दास को पद्म श्री देने की घोषणा की है। और दूसरी बड़ी खबर यह है कि 1 फरवरी को गुरु रविदास की 649वीं जयंती के मौके पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डेरा सच्चखंड बल्लां जाने वाले हैं।
अब तक जो कार्यक्रम सामने आया है उसके मुताबिक, प्रधानमंत्री सुबह संसद में बजट सत्र में भाग लेने के बाद शाम 4 बजे डेरा सचखंड बल्लां डेरा पहुंचेंगे। डेरा प्रमुख को पद्म श्री से सम्मानित किए जाने से लगभग दो महीने पहले दिल्ली में प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकात हुई थी और मुमकिन है कि इस कार्यक्रम की रूपरेखा तब ही बन गई हो। पंजाब में ऐसी भी चर्चायें हैं कि प्रधानमंत्री की तरफ से उस दिन किसी बड़ी घोषणा की उम्मीद है। चर्चा है कि प्रधानमंत्री आदमपुर हवाई अड्डे का नाम गुरु रविदास के नाम पर रख सकते हैं।
प्रधानमंत्री के दौरे और डेरा प्रमुख को पद्मश्री दिए जाने, इन दोनों घटनाक्रम के राजनीतिक मायने समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि डेरा सच्चखंड बल्लां की अहमियत क्या है। दरअसल जालंधर के पास स्थित डेरा सच्चखंड बल्लां सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली रविदासिया संस्थान माना जाता है। ऐसे अनुमान हैं कि इस डेरे के अनुयायियों की संख्या दुनियाभर में 20 लाख से ज्यादा है, जिनमें से लगभग 15 लाख अनुयायी तो पंजाब में ही हैं, और इनमें से ज्यादातर दोआबा क्षेत्र में हैं।
2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक पंजाब के दोआबा क्षेत्र के चार जिलों जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और नवांशहर में दलित आबादी लगभग 37 प्रतिशत है। इनमें से करीब 61 प्रतिशत लोग खुद को रविदासिया मानते हैं। इस समुदाय का राजनीतिक असर कैसा है, इसे इसी बात से समझ सकते हैं कि रविदासिया समुदाय दोआबा क्षेत्र की कम से कम 23 विधानसभा सीटों और 2 लोकसभा सीटों में निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। रिपोर्ट्स बता रही हैं कि रविदासिया समुदाय के अधिकांश लोग दलित और सिख हैं, इनमें से अच्छी खासी संख्या में हिंदू भी हैं।
वैसे इस डेरे की खास बात यह है कि इसके मिजाज से ये पता नहीं चलता कि इसका समर्थक वर्ग का रुझान किस राजनीतिक पार्टी की तरफ है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यहां के दौरे को रविदासिया दलित समुदाय को साधने की एक सोची-समझी राजनीतिक कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। वैसे भी बीजेपी पंजाब में राजनीतिक जमीन की तलाश में है।
पंजाब की राजनीति में शिरोमणि अकाली दल बीजेपी के बड़े भाई की तरह भूमिका में रहा है लेकिन रद्द हो हो चुके तीन कृषि कानूनों को लेकर अकाली दल की बीजेपी से ठन गई थी और दोनों में अलगाव के बाद बीजेपी पंजाब में राजनीतिक जमीन तलाशने के लिए जूझ रही है। इसीलिए प्रधानमंत्री का मोदी का रविदास जयंती के दिन डेरा जाने का कार्यक्रम ऐसे समूह से दोबारा जुड़ने की कोशिश का संकेत है, जिसकी आस्था, पहचान और संख्या असाधारण रूप से एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। जाहिर है, इससे पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी और प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस को ज़रूर असहज होना पड़ सकता है क्योंकि पीएम को डेरा के दौरे के राजनीतिक मायने बहुत साफ दिख रहे हैं।
पंजाब में वैसे भी देश में अनुसूचित जाति की आबादी का सबसे बड़ा अनुपात है, जो राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 32 प्रतिशत है। इस डेमोग्रेफी के भीतर रविदासिया समुदाय एक बड़ा और महत्वपूर्ण समूह माना जाता है। खासकर दोआबा क्षेत्र में जिसे लंबे समय से राज्य में दलित राजनीति का सेंटर माना जाता रहा है।राजनीतिक नज़रिये से डेरा सच्चखंड बल्लां की सबसे बड़ी खासियत उसकी मानी जाने वाली तटस्थता है। तमाम दलों के नेताओं द्वारा दशकों से चुनाव से पहले किए जाते रहे दौरों के बावजूद, डेरा ने कभी भी औपचारिक रूप से किसी पार्टी या गठबंधन का समर्थन नहीं किया है।
हालांकि, इस डेरा सच्चखंड बल्लां के प्रभाव को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है। आपको याद होगा कि चुनाव आयोग द्वारा साल 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों को गुरु रविदास जयंती के मद्देनज़र री-शेड्यूल करना पड़ा था। तब कई लोगों ने उस फैसले समुदाय के डेरे के राजनीतिक वजन की संस्थागत मान्यता के रूप में देखा। हालांकि राजनीतिक दलों के लिए बल्लां का डेरा इस मायने में एक विरोधाभास की तरह रहा है क्योंकि ये किसी को खुला समर्थन तो नहीं देता, लेकिन इसे नजरअंदाज करना चुनावी जोखिम से खाली नहीं है।
राजनीतिक मामलों के जानकार कह रहे हैं कि हालांकि मोदी का ये दौरा बीजेपी के लिए चुनावी लाभ की गारंटी नहीं देता, क्योंकि पंजाब में दलितों का मतदान उप-जातियों, पार्टियों और नेताओं के बीच बंटा हुआ है। फिर भी ये दौरा बीजेपी को एक प्रभावशाली दलित धार्मिक समूह के भीतर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का अवसर जरूर देता है। इस प्रतीकात्मकता को बल्लां का वाराणसी से पुराना जुड़ाव और भी गहरा बनाता है।
वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र भी है। संत सरवण दास और बाद में संत निरंजन दास के नेतृत्व में, सीर गोवर्धनपुर स्थित गुरु रविदास जन्मस्थान मंदिर रविदासिया आस्था का धार्मिक केंद्र बनकर उभरा। दशकों से बल्लां डेरा बड़े पैमाने पर तीर्थ यात्राओं का आयोजन करता रहा है, जिनमें गुरु रविदास जयंती के अवसर पर जालंधर से वाराणसी तक चलने वाली ‘बेगमपुरा स्पेशल ट्रेन’ भी शामिल है।
जिन संत निरंजन दास को इस बार केंद्र सरकार ने पद्मश्री देने की घोषणा की, वह वाराणसी और बल्लां डेरा दोनों के धार्मिक स्थलों के प्रमुख हैं। हर साल रविदास जयंती की पूर्व संध्या पर वह लगभग 2,000 श्रद्धालुओं को लेकर एक विशेष ट्रेन से वाराणसी जाते हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि संत निरंजन दास इस बार ट्रेन में सवार होकर हवाई मार्ग से बल्लां लौट सकते हैं, ताकि प्रधानमंत्री के डेरा सच्चखंड बल्लां आने के दौरान वे उपस्थित रह सकें।
वैसे संत निरंजन दास के नेतृत्व वाले डेरा सच्चखंड बल्लां ने कभी किसी राजनीतिक दल से बातचीत करने में परहेज नहीं किया है। इसका फायदा ये होता है कि डेरा की पहचान और महत्व देश भर में बढ़ता है, लेकिन वो किसी एक पार्टी का खुला समर्थन नहीं करता। दूसरी ओर, बीजेपी के लिए ये कदम पंजाब की राजनीति में खुद को बाहरी कहे जाने की छवि से बाहर निकालने की एक सोच-समझकर उठाई गई, लेकिन जरूरी कोशिश है। पीएम मोदी का डेरा सच्चखंड बल्लां जाना सिर्फ तुरंत चुनावी फायदा पाने की बात नहीं है। इसका असली मतलब यह है कि पंजाब की राजनीति कैसे बदल रही है, जहां धार्मिक संस्थाएं, जनसंख्या की ताकत और पहचान से जुड़े मुद्दे राजनीति को तेजी से दिशा दे रहे हैं।

