Prashant Kishore's Bihar Yatra : राजनीतिक रणनीतिकार से सक्रिय राजनेता बने प्रशांत किशोर एक बार फिर बिहार की गलियों और गांवों में अपनी पैठ जमाने के लिए तैयार हैं। आगामी 8 फरवरी से वे अपनी महत्वाकांक्षी राज्यव्यापी 'बिहार यात्रा' का आगाज करने जा रहे हैं। यह यात्रा उस समय हो रही है जब 2025 के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी 'जन सुराज' को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिल सकी। प्रशांत किशोर इस दौरे को महज एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनता के साथ एक गहरा संवाद और आत्ममंथन की प्रक्रिया मान रहे हैं। बिहार की वर्तमान राजनीति में जहां बेरोजगारी, पलायन और लचर शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दे आज भी ज्वलंत बने हुए हैं, वहां पीके की यह सक्रियता सत्ता और विपक्ष दोनों के समीकरण बिगाड़ सकती है। इस यात्रा के जरिए वे न केवल अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं में नया जोश भरना चाहते हैं, बल्कि चुनावी हार की बारीकियों को समझकर अपनी भविष्य की रणनीति को नया आकार देने की कोशिश में जुटे हैं।
चंपारण से होगा यात्रा का शंखनाद
प्रशांत किशोर अपनी इस यात्रा के पहले चरण की शुरुआत 8 फरवरी को ऐतिहासिक धरती पश्चिम चंपारण से करेंगे। इसके बाद वे पूर्वी चंपारण, दरभंगा, मुजफ्फरपुर और वैशाली जैसे उत्तर बिहार के प्रमुख जिलों का दौरा करेंगे। इस दौरान उनका मुख्य उद्देश्य केवल रैलियां करना नहीं, बल्कि हर जिले में संगठनात्मक बैठकें करना है। इन बैठकों के माध्यम से वे जन सुराज की जमीनी स्थिति की विस्तृत समीक्षा करेंगे। वे यह समझना चाहते हैं कि पार्टी का संदेश गांव-गांव तक क्यों नहीं पहुंच पाया और भविष्य में इसे कैसे सुधारा जाए।
कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना प्राथमिकता
विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद जन सुराज के कार्यकर्ताओं में छाई निराशा को दूर करना प्रशांत किशोर के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। वे खुद मैदान में उतरकर यह संदेश देना चाहते हैं कि राजनीति में हार एक अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत और सीखने का अवसर है। युवाओं के साथ सीधा संवाद उनकी रणनीति का अहम हिस्सा होगा। वे जानते हैं कि बिहार के युवाओं के लिए रोजगार और पलायन सबसे बड़े मुद्दे हैं, और वे इन्हीं मुद्दों को अपनी राजनीति का केंद्र बनाना चाहते हैं।
राजनीतिक आत्ममंथन और वैकल्पिक राजनीति
प्रशांत किशोर ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि चुनावी रणनीति और संगठन के स्तर पर उनसे कुछ कमियां रह गई थीं। यह यात्रा उनके लिए एक शोध की तरह है, जहां वे जनता से उनकी अपेक्षाओं के बारे में पूछेंगे। राजनीतिक विश्लेषक इसे पीके की छवि को एक रणनीतिकार से बदलकर एक जननेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश देख रहे हैं। वे बिहार में दशकों से चली आ रही जातिगत राजनीति के बजाय विकास और व्यवस्था परिवर्तन की वैकल्पिक राजनीति का चेहरा बनना चाहते हैं।
सिस्टम और नीतियों पर तीखा प्रहार
अपनी यात्रा के दौरान प्रशांत किशोर बिहार की वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था, भ्रष्टाचार और शिक्षा-स्वास्थ्य के निजीकरण जैसे गंभीर विषयों पर सरकार और विपक्ष दोनों को घेरने की तैयारी में हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि बिहार में चेहरे बदलते रहे हैं, लेकिन शासन करने का तरीका और आम आदमी की परेशानियां वैसी की वैसी ही हैं। इस यात्रा की सफलता यह तय करेगी कि क्या जन सुराज भविष्य में एक तीसरी बड़ी ताकत के रूप में उभर पाएगी या नहीं।