असम में ‘कांटों का ताज’, प्रियंका गांधी पर टिकी कांग्रेस की उम्मीदें
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असम में ‘कांटों का ताज’, प्रियंका गांधी पर टिकी कांग्रेस की उम्मीदें

असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को उम्मीदवार चयन की कमान सौंपी। यह कदम पार्टी के लिए मनोबल बढ़ाने वाला, लेकिन राजनीतिक रूप से बड़ा जोखिम भी है।


3 जनवरी को कांग्रेस पार्टी ने आगामी असम विधानसभा चुनावों के लिए प्रियंका गांधी को उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया। कांग्रेस की अंदरूनी कार्यप्रणाली से परिचित लोगों के लिए यह फैसला खासा दिलचस्प रहा। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि पिछले चार वर्षों से संगठन में कोई स्पष्ट जिम्मेदारी न संभाल रहीं प्रियंका गांधी को एक अहम भूमिका दी गई है, बल्कि यह भी पहली बार हुआ है जब कांग्रेस के प्रथम परिवार नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य किसी खास राज्य के लिए संभावित उम्मीदवारों की छंटनी की जिम्मेदारी संभाल रहा है।

पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते प्रियंका गांधी के भाई राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) के पदेन सदस्य हैं। राज्य स्तरीय स्क्रीनिंग कमेटियों द्वारा भेजे गए नामों पर अंतिम मुहर लगाने का काम इसी CEC का होता है, चाहे वह लोकसभा चुनाव हों या विधानसभा चुनाव। ऐसे में असम की स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्ष के रूप में प्रियंका गांधी की भूमिका का अर्थ यह है कि उनकी टीम—जिसमें इमरान मसूद, सप्तगिरि उलाका और सिरीवेल्ला प्रसाद शामिल हैं—जिन नामों की सिफारिश करेगी, उन पर अंतिम निर्णय उसी CEC को लेना होगा, जिसमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य वरिष्ठ नेता शामिल हैं।

कांग्रेस के लिए मनोबल बढ़ाने वाला कदम

इससे भी अहम बात यह है कि असम में प्रियंका गांधी की तैनाती यह संकेत देती है कि कांग्रेस अब इस राज्य को बीजेपी से छीनने को कितनी गंभीरता से ले रही है। पार्टी के भीतर कई लोगों की राय है कि नेहरू-गांधी परिवार इस चुनाव में अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगाने को तैयार है। यह मुकाबला ऐसा होगा, जिसमें बीजेपी के प्रमुख चुनावी चेहरों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की ओर से तीखे और आक्रामक हमले तय माने जा रहे हैं। सरमा खुद पूर्व कांग्रेसी रहे हैं और गांधी परिवार, खासतौर पर राहुल गांधी के प्रति उनकी पुरानी व्यक्तिगत नाराजगी जगजाहिर है।

असम कांग्रेस इकाई के लिए, जो सरमा के प्रयासों के चलते एक के बाद एक कई वरिष्ठ नेताओं के बीजेपी में जाने से कमजोर हो चुकी है, प्रियंका गांधी की यह जिम्मेदारी एक साथ मनोबल बढ़ाने वाला कदम भी है और चेतावनी भी। राज्य से जुड़े एक कांग्रेस सांसद ने, जिन्होंने इस नई भूमिका को “कांटों का ताज” बताया, कहा, “प्रियंका की मौजूदगी यह दिखाती है कि हाईकमान असम अभियान में अपनी पूरी ताकत झोंकने को तैयार है। इससे हमारे कार्यकर्ता उत्साहित हैं। साथ ही पार्टी के भीतर मौजूद गुटबाजों और तोड़फोड़ करने वालों को भी सतर्क हो जाना चाहिए। यह एक बहुत अच्छा फैसला है और हमें भरोसा है कि प्रियंका की भूमिका सिर्फ उम्मीदवारों की सूची तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वे पूरे चुनाव अभियान की कमान भी संभालेंगी।”

टिकट विवाद से बचाव की कोशिश

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग की जिम्मेदारी प्रियंका को देना एक तरह से बीमा पॉलिसी भी है। चुनाव के समय कांग्रेस ही नहीं, बल्कि लगभग हर पार्टी में यह विवाद आम हो जाता है कि टिकट बांटने में पैसों का लेन-देन हुआ है। कांग्रेस को ऐसे आरोपों का खामियाजा कई बार भुगतना पड़ा है। इसका ताजा उदाहरण पिछले साल अक्टूबर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव हैं, जहां टिकट न मिलने से नाराज कई नेताओं ने लंबे समय तक प्रदर्शन किए और राहुल गांधी के करीबी सहयोगी व बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरु, प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम और पूर्व विधायक दल नेता शकील अहमद खान पर टिकट बेचने के आरोप लगाए।

कांग्रेस अभी तक बिहार की उस अंदरूनी उथल-पुथल से पूरी तरह उबर नहीं पाई है और हाल ही में उसने तीन दर्जन से अधिक बागी नेताओं को निलंबित किया है, जो चुनाव में करारी हार के दो महीने बाद भी विरोध जारी रखे हुए थे।

चुनावों पर टिकट विवाद की छाया

असम के एक वरिष्ठ कांग्रेस विधायक ने कहा, “चुनाव के समय टिकट बिकने का आरोप लगाना सबसे आसान होता है। जिसे भी टिकट नहीं मिलता, वह अपने राजनीतिक कद की परवाह किए बिना ऐसा आरोप लगा सकता है। असम में स्थिति और जटिल है, क्योंकि हिमंता के नेतृत्व में बीजेपी लगभग पूर्व कांग्रेसी नेताओं की पार्टी बन चुकी है। ऐसे में जो लोग अभी कांग्रेस में हैं, उन्हें भी बीजेपी से ऑफर मिलते रहते हैं। चुनाव के वक्त रातोंरात दल बदलना आम हो जाता है और इसका सबसे आम बहाना यही होता है कि मूल पार्टी में टिकट बेचे जा रहे थे।”

विधायक ने आगे कहा, इसके अलावा गुटीय दबाव भी होते हैं। हर नेता चाहता है कि उसके समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा टिकट मिलें। जब ऐसा नहीं होता, तो हालात बिगड़ जाते हैं। अगर प्रियंका गांधी उम्मीदवार चयन की जिम्मेदारी संभालेंगी, तो कम से कम इस स्तर पर ऐसी समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।

बढ़ी जवाबदेही और राजनीतिक जोखिम

जहां असम कांग्रेस प्रियंका गांधी को मिली इस जिम्मेदारी से उत्साहित है, वहीं पार्टी के कुछ नेता इसके राजनीतिक नतीजों को लेकर चिंतित भी हैं। उनका मानना है कि अगर कांग्रेस एक बार फिर चुनावी रूप से पराजित होती है, तो इसकी जवाबदेही सीधे गांधी परिवार तक जाएगी।

एक पार्टी पदाधिकारी ने कहा, “यही वजह है कि नेहरू-गांधी परिवार आमतौर पर उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग से दूरी बनाए रखता रहा है। जब आप उम्मीदवार चुनते हैं, तो नतीजों की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है। 2022 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के सबसे खराब प्रदर्शन के समय प्रियंका वहां प्रभारी महासचिव थीं। उसके बाद से वे किसी राज्य में सीधे तौर पर शामिल होने से बचती रही हैं। आज का असम तरुण गोगोई के दौर वाला असम नहीं है। यहां भारी ध्रुवीकरण है और चुनावी व्यवस्था भी काफी हद तक प्रभावित हो चुकी है। इसमें कोई शक नहीं कि सरमा और बीजेपी सत्ता बनाए रखने के लिए हर संभव हथकंडा अपनाएंगे। ऐसे में प्रियंका का इतनी गहराई से जुड़ना साहसिक कदम है, लेकिन जोखिम भी उतना ही बड़ा है।”

प्रचार को भी मिलेगी नई धार

कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि असम में प्रियंका गांधी की भूमिका इस बार 2021 के चुनावों से कहीं ज्यादा व्यापक होगी। पिछली बार उन्होंने सीमित लेकिन हाई-प्रोफाइल प्रचार किया था, जिसमें चाय बागानों में महिला मजदूरों के साथ चाय की पत्तियां तोड़ने जैसे चर्चित दृश्य भी शामिल थे। ऐसे आयोजनों की पुनरावृत्ति भी इस बार संभव है।

एक वरिष्ठ नेता ने बताया, “उनके साथ मिलकर पूरी रणनीति तैयार की जा रही है। भले ही केरल जहां से प्रियंका लोकसभा सांसद हैं और तमिलनाडु व बंगाल जैसे अहम राज्यों में भी एक साथ चुनाव हों, फिर भी हम आश्वस्त हैं कि वे अपने समय का ऐसा बंटवारा करेंगी कि असम के सभी अहम इलाकों को कवर कर सकें।

कांग्रेस नेताओं का यह भी मानना है कि प्रियंका गांधी की मौजूदगी से असम में पार्टी एक मजबूत चुनावी नैरेटिव गढ़ पाएगी, लगातार सुर्खियों में बनी रहेगी और संगठन को चुस्त-दुरुस्त रखा जा सकेगा। साथ ही, संभावित सहयोगी दलों के साथ समन्वय में भी वे अड़चनें नहीं आएंगी, जैसी बिहार में पिछले साल आरजेडी के साथ देखने को मिली थीं।

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