
धामी सरकार के गले पड़ा VIP, अंकिता भंडारी मर्डर केस में विरोध प्रदर्शनोंं से घिरी सरकार
कोर्ट के जजमेंट में इस बात का जिक्र है कि इस मर्डर केस की जांच के दौरान न तो उत्तराखण्ड पुलिस और न ही इस मामलें में बनाई गई एसआईटी ही मुख्य अभियुक्त पुलकित आर्य का फोन बरामद कर पाई और न ही मृतका अंकिता भंडारी का फोन ही वो ढूंढ पाई।
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए उनके इस कार्यकाल का ये आखिरी साल है। इस तरह से देखें तो उत्तराखण्ड में ये चुनावी साल है क्योंकि 2027 के फरवरी महीने में यहां विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। तो लगभग सालभर ही बचा हुआ है लेकिन इस चुनावी साल में पुष्कर सिंह धामी सरकार के लिए मुश्किलोें का दौर शुरू हो गया है। धामी सरकार एक बड़े जनआंदोलन का ताप झेल रही है और वो आंदोलन है अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने का आंदोलन, जोकि 2022 के सितंबर महीने में एक बीजेपी नेता के बेटे पुलकित आर्य और उसके सहयोगियों के द्वारा मारी गई।
उत्तराखण्ड के दोनों महत्वपूर्ण इलाकों गढ़वाल और कुमाऊं के छोटे-छोटे कस्बों से लेकर नगरों तक और देहरादून से लेकर दिल्ली तक इस मुद्दे को लेकर इन दिनों लगातार प्रोटेस्ट हो रहे हैं। 4 जनवरी यानी रविवार को देहरादून में मुख्यमंत्री का आवास घेरो आंदोलन हुआ तो दिल्ली के जंतर-मंतर में भी प्रवासी संगठनों की तरफ से प्रोटेस्ट किया गया। अब अलग-अलग जन संगठनों ने इसी मुद्दे पर 11 जनवरी को उत्तराखण्ड बंद का एलान भी किया है।
हालांकि अंकिता भंडारी मर्डर केस में ट्रायल कोर्ट से तीनों अभियुक्तों, यानी रिजॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य और उसके दो सहयोगियों को सजा हो चुकी है। तीनों इस समय जेल में हैं। इस लिहाज इस केस का अंजाम पूरा हुआ, मान लिया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
तीन साल से एक केस में एक मिस्ट्री अभी तक अनसुलझी है और वो मिस्ट्री है कि वो वीआईपी कौन था जिसके लिए अंकिता भंडारी का मर्डर किया गया? वो वीआईपी कौन था, जिसे रिजॉर्ट में एक्सट्रा सर्विस देने यानी जिस्मफरोशी के लिए 19 साल की लड़की अंकिता भंडारी पर बीजेपी नेता के उस रिजॉर्ट का मालिक पुलकित आर्य दबाव डाल रहा था? और जब अंकिता तमाम दबावों के आगे नहीं झुकी तो उसे नहर में धक्का देकर मार दिया गया। उस वीआईपी का जिक्र एडिशनल सेशन जज की अदालत के फैसले में भी आया है लेकिन फिर भी वो मिस्ट्री ही बना रहा कि आखिर वो वीआईपी था कौन?
रविवार 4 जनवरी को देहरादून में विरोध प्रदर्शन के दौरान लहराया गया एक पोस्टर
कोर्ट के जजमेंट में इस बात का जिक्र है कि इस मर्डर केस की जांच के दौरान न तो उत्तराखण्ड पुलिस और न ही इस मामलें में बनाई गई एसआईटी ही मुख्य अभियुक्त पुलकित आर्य का फोन बरामद कर पाई और न ही मृतका अंकिता भंडारी का फोन ही वो ढूंढ पाई। कोर्ट के जजमेंट में जिक्र है कि पुलकित आर्य ने फोन गायब कर दिए। तो उस कथित वीआईपी की मिस्ट्री अनसुलझी रह गई।
अब तीन साल बाद पिछले दिनों उस रहस्यमयी वीआईपी का जिन्न अचानक बाहर निकल आया। हुआ ये कि हरिद्वार ज़िले से बीजेपी के पूर्व विधायक सुरेश राठौर की कथित पत्नी उर्मिला सनावर ने अचानक सोशल मीडिया पर कुछ ऑडियो रिकॉर्डिंग सार्वजनिक करके खलबली मचा दी। उनका दावा है कि वो ऑडियो रिकॉर्डिंग उनके और सुरेश राठौर के बीच हुई टेलीफोनिक बातचीत की है, जिसमें बीजेपी के पूर्व विधायक सुरेश राठौर कथित तौर पर अंकिता भंडारी मर्डर केस के इस वीआईपी का नाम बता रहे हैं। जिसमें दो बीजेपी नेताओं के नाम आए हैं। इनमें एक बीजेपी का राष्ट्रीय महामंत्री है जबकि दूसरा उत्तराखंड में संगठन मंत्री है। उर्मिला सनावर के सोशल मीडिया पर शेयर की गई ऑडियो रिकॉर्डिंग वायरल हो गईं और उत्तराखंड में लोगों में गुस्सा पनपने लगा। तभी से लगातार प्रोटेस्ट चल रहे हैं।
बीजेपी के पूर्व विधायक सुरेश राठौर की ऑडियो रिकॉर्डिंग को सार्वजनिक करके उत्तराकण्ड की राजनीति में भूचाल लाने वाली उर्मिला सनावर तब से अंडरग्राउंड हैं। उन्होने सोशल मीडिया पर अज्ञात जगह से वीडियो पोस्ट करके अपनी जान को खतरा बताया। वो इसलिए क्योेंकि उत्तराखंड पुलिस ने किसी अन्य मामले में उन पर मुकदमा किया है। उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट भी जारी हुआ है लेकिन इस पुलिसिया कार्रवाई ने लोगों का गुस्सा भड़काने का ही काम किया।
देहरादून में अलग-अलग जन संगठनों के आह्वान पर हुई इस विरोध प्रदर्शन में हज़ारों लोग पहुंचे
पूरे राज्य में जनाक्रोश फैलने के बाद सरकार इस कदर दबाव में हैं कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं जबकि वो लगभग हर मुद्दे पर मीडिया पर अपनी बात रखने में पीछे नहीं रहते। सरकार ने इस मुद्दे पर बोलने के लिए अपने कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल को आगे किया लेकिन उससे लोगों का और गुस्सा भड़क गया क्योकि उन्होंने कहा कि जिसके पास सबूत है, वो सरकार को दे. हम कार्रवाई करेंगे। फिर अगले ही दिन सरकार ने अंकिता मर्डर केस की जांच करने वाली एसआईटी के मेंबर और हरिद्वार ग्रामीण के एसपी शेखर सुयाल की प्रेस कॉन्फ्रेंस करवा दी जिसमें उन्होंने दावा किया कि जिस वीआईपी को लेकर इतना शोर मचा है, वो वीआईपी तो कोई है ही नहीं। इससे ये मैसेज जा रहा है कि धामी सरकार अपनी पार्टी के बड़े नेताओं को बचा रही है।
चुनावी साल में सरकार घिरी हुई है। कांग्रेस ने भी ये मुद्दा लपक लिया है और उसके भी समानांतर प्रोटेस्ट चल रहा है। चुनावी साल में आए इस संकट ने सीएम धामी की परेशानी बढ़ा दी है। वैसे भी उत्तराखंड का राजनीति अतीत बताता है कि इन 25-26 साल में आज तक बीजेपी का कोई भी मुख्यमंत्री पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है। फिलहाल तो धामी के सामने ये यक्ष प्रश्न है कि वो पब्लिक का गुस्सा थामें या उस रहस्यमयी वीआईपी को बचाएं।

