
सादगी और संघर्ष की विरासत, 101 की उम्र में जननायक नल्लाकन्नू का निधन
आर. नल्लाकन्नू ने 101 वर्ष की उम्र तक मजदूरों, किसानों और पर्यावरण के लिए संघर्ष किया। सादगी, त्याग और ईमानदार राजनीति के वे जीवंत प्रतीक रहे।
आज के दौर में, जब राजनीति और कारोबार के बीच की रेखा बेहद पतली हो गई है, आम धारणा यह बन चुकी है कि राजनेता कुछ भी बेच सकते हैं। कुछ लोग अपार संपत्ति जुटा लेते हैं, जबकि अन्य उनके प्रवक्ता बनकर काम करते हैं। युवाओं का एक बड़ा वर्ग राजनीति को भ्रष्ट मानता है और उससे दूरी बनाए रखता है। ऐसे निराशाजनक माहौल में एक ऐसा व्यक्तित्व था, जिसका जीवन इन धारणाओं को झुठलाता रहा। उम्र के उस पड़ाव पर भी, जब उनके कदम लड़खड़ाने लगे थे, उन्होंने तामिराबरानी नदी में हो रहे अवैध रेत खनन के खिलाफ लड़ाई लड़ी और अदालत से रोक का आदेश हासिल किया। वे थे कॉमरेड आर. नल्लाकन्नू।
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता, स्वतंत्रता सेनानी, आजीवन जनयोद्धा और तमिलनाडु के सबसे सम्मानित राजनीतिक व सामाजिक व्यक्तित्वों में से एक आर. नल्लाकन्नू (जिन्हें स्नेह से आरएनके या अय्या नल्लाकन्नू कहा जाता था) का बुधवार (25 फरवरी) को चेन्नई में 101 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
“बिना त्याग के कुछ भी हासिल नहीं होता” इस विचार को उन्होंने आठ दशकों से अधिक समय तक अपने जीवन में उतारा। उन्होंने मजदूर वर्ग, कृषि श्रमिकों, दलितों, अल्पसंख्यकों, पर्यावरण और उत्पीड़ितों के संघर्ष को हमेशा सर्वोपरि रखा।
26 दिसंबर 1925 को तूतुकुडी जिले (तत्कालीन तिरुनेलवेली) के श्रीवैगुंडम में एक कृषक परिवार में जन्मे नल्लाकन्नू के पिता का नाम रामासामी और माता का नाम करुप्पैयम्मल था। मात्र 15 वर्ष की आयु में उन्होंने सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता की राह पकड़ ली। स्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश समर्थन में खेले जा रहे एक नाटक का विरोध किया, जो महात्मा गांधी के ब्रिटिश युद्ध प्रयासों के खिलाफ आह्वान के अनुरूप था। पुलिस के लाठीचार्ज के बावजूद वे पीछे नहीं हटे और अगले ही दिन फिर आंदोलन का नेतृत्व किया।
समाजवादी विचारधारा की ओर झुकाव
प्रारंभ में वे कांग्रेस से जुड़े, लेकिन जवाहरलाल नेहरू के समाजवादी और सार्वजनिक स्वामित्व के विचारों से वे गहराई से प्रभावित हुए। 1943 में, 18 वर्ष की आयु में, उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और श्रीवैगुंडम शाखा के सचिव बने। 1946 में वे चेन्नई गए और पार्टी के अखबार ‘जनसक्ति’ में कार्य किया। युद्धकालीन अकाल के दौरान उन्होंने पथिनिकोट्टई में चावल की बड़े पैमाने पर जमाखोरी का खुलासा किया। उनकी रिपोर्ट के बाद हजारों बोरी धान बरामद हुईं, जिससे भूखे लोगों को भोजन मिला। आज भी स्थानीय लोग कहते हैं, “यदि यह इलाका आज खा रहा है, तो वह नल्लाकन्नू की वजह से है।”
जनसंघर्षों के अगुआ
स्वतंत्रता के बाद जब सरकार ने कम्युनिस्टों पर कार्रवाई शुरू की, तो 1950 में उन्हें नेल्लै साजिश केस में फंसाया गया। 1952 में 27 वर्ष की आयु में उन्हें कथित सशस्त्र क्रांति की साजिश के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। बाद में सजा में बदलाव हुआ, लेकिन विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत उन्हें सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा मिली। वे लगभग 22 वर्ष के थे जब पहली बार गिरफ्तार हुए और अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष जेल में बिताए।
हिरासत में उन्हें क्रूर यातनाएं दी गईं। पुलिस ने उन्हें उल्टा लटकाया और उनकी मूंछ सिगरेट से जलाई। वर्षों बाद उन्होंने विनम्रता से कहा, “मूंछ से मुझे कोई खास लगाव नहीं था, उसे मैंने गाल के निशान को ढकने के लिए बढ़ाया था।”
जेल सुधार और रिहाई
जेल के भीतर उन्होंने कैदियों के अधिकारों, विशेषकर शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष किया। बाहर जनआंदोलनों ने उनकी रिहाई की मांग की। 13 दिसंबर 1956 को सात साल की सजा पूरी कर वे रिहा हुए। इसके बाद वे पूर्णकालिक पार्टी कार्यकर्ता बने और कृषि मजदूरों के संगठन में राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारियां निभाईं। 1992 से 2005 तक वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तमिलनाडु राज्य सचिव रहे। उन्होंने 1967, 1977 और 1999 में चुनाव लड़े, लेकिन कभी विजयी नहीं हुए। फिर भी उनका विश्वास था कि विधानसभाओं से अधिक महत्वपूर्ण “मक्कल मंद्रम” यानी जनता का मंच है।
पर्यावरण और न्याय के लिए संघर्ष
नल्लाकन्नू निर्भीक पर्यावरण योद्धा भी थे। उन्होंने तामिराबरानी नदी को बर्बाद कर रहे रेत माफिया के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी और मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ से ऐतिहासिक प्रतिबंध आदेश हासिल किया।चेन्नई बाढ़ के दौरान जब उनका घर भी जलमग्न हो गया, तो बचाव दल के आने पर उन्होंने कहा, “जब तक इस इलाके के हर व्यक्ति को नहीं बचाया जाता, मैं नाव पर नहीं चढ़ूंगा।” 90 वर्ष से अधिक आयु में भी वे जनता के साथ अडिग खड़े रहे।
सादगी भरा जीवन
उनका निजी जीवन सादगी और त्याग का उदाहरण था। उन्होंने कभी घर या कार नहीं खरीदी। 2007 से वे तमिलनाडु हाउसिंग बोर्ड के फ्लैट में किराए पर रहे, जबकि उसे मुफ्त देने की पेशकश हुई थी। 80वें जन्मदिन पर पार्टी द्वारा दिए गए 1 करोड़ रुपये उन्होंने तुरंत पार्टी फंड में लौटा दिए। अंबेडकर पुरस्कार की राशि और थगैसल तमिलर विरुधु सम्मान की राशि भी उन्होंने राहत कोष में दान कर दी। वे 58 वर्षों तक रंजीथम अम्मल के साथ वैवाहिक जीवन में रहे। उनके दो बेटियां कासी भारती और आंडाल हैं।
अटूट ईमानदारी की राजनीति
90 वर्ष की आयु के बाद भी वे आंदोलनों में सक्रिय रहे। राजनीतिक विरोधी भी उन्हें सम्मान से अय्या नल्लाकन्नू कहकर संबोधित करते थे। युवाओं के लिए वे इस बात का जीवंत उदाहरण थे कि सिद्धांतों, वैचारिक स्पष्टता और भ्रष्टाचार-मुक्त जीवन के साथ राजनीति संभव है।
उनके निधन के साथ तमिलनाडु और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने अपना एक नैतिक प्रकाशस्तंभ खो दिया। मगर उनके द्वारा जलाई गई मशाल मेहनतकश लोगों के दिलों में हमेशा जलती रहेगी।

