25 लाख हेल्थ बीमा गारंटी पर विवाद, केरल के स्वास्थ्य मॉडल पर सियासी जंग
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25 लाख हेल्थ बीमा गारंटी पर विवाद, केरल के स्वास्थ्य मॉडल पर सियासी जंग

राहुल गांधी के 25 लाख हेल्थ इंश्योरेंस वादे पर केरल में बहस तेज हो गई है। थॉमस आइजैक ने कहा इससे राज्य का मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य मॉडल कमजोर हो सकता है।


केरल के स्वास्थ्य मॉडल के भविष्य को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। इसकी वजह कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा किया गया 25 लाख रुपये के स्वास्थ्य बीमा का चुनावी वादा है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) का कहना है कि इस योजना से राज्य के परिवारों को व्यापक चिकित्सा सुरक्षा मिलेगी। हालांकि, सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) ने इस प्रस्ताव की कड़ी आलोचना की है।

सबसे तीखी प्रतिक्रिया वरिष्ठ CPI(M) नेता और पूर्व वित्त मंत्री थॉमस आइजैक की ओर से आई है। उनका कहना है कि यह प्रस्ताव केरल की लंबे समय से चली आ रही मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को कमजोर कर सकता है।आइज़ैक की आलोचना के बाद स्वास्थ्य बीमा का मुद्दा राज्य की राजनीति के केंद्र में आ गया है। दोनों राजनीतिक गठबंधन केरल में स्वास्थ्य सेवाओं को वित्तपोषित और संचालित करने के तरीकों पर अलग-अलग दृष्टिकोण पेश कर रहे हैं।

केरल का मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य मॉडल

केरल लंबे समय से अपनी मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए जाना जाता है। यहां स्वास्थ्य व्यवस्था का आधार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सरकारी अस्पतालों पर टिका है, जो माध्यमिक और तृतीयक स्तर की सेवाएं प्रदान करते हैं।लेफ्ट सरकार का तर्क है कि इसी मॉडल के कारण राज्य में बड़ी आबादी को अपेक्षाकृत सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं मिल पाती हैं और निजी अस्पतालों पर अत्यधिक निर्भरता से बचाव होता है, जैसा कि कई अन्य राज्यों में देखने को मिलता है।

कांग्रेस प्रस्ताव पर थॉमस आइजैक की आलोचना

थॉमस आइज़ैक का कहना है कि कांग्रेस का प्रस्ताव केरल को बीमा आधारित स्वास्थ्य प्रणाली की ओर धकेल सकता है, जिसमें निजी क्षेत्र की भूमिका अधिक होगी।राहुल गांधी की घोषणा पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह वादा राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक संरचना को समझे बिना किया गया है।

उनके अनुसार “राहुल गांधी की केरल को गारंटी यह है कि वे हमारे विश्व प्रसिद्ध सार्वजनिक स्वास्थ्य सिस्टम को खत्म कर देंगे। उनकी गारंटी 25 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा है।” आइज़ैक का कहना है कि केरल में अधिकांश चिकित्सा उपचार इतने महंगे नहीं होते कि 25 लाख रुपये तक की बीमा कवरेज की जरूरत पड़े। ऐसे में सरकार को भारी बीमा प्रीमियम देना पड़ेगा, जबकि इसका लाभ बहुत कम मरीजों को मिलेगा।

अधिकांश इलाज 5 लाख रुपये से कम

राज्य के स्वास्थ्य क्षेत्र के आंकड़ों का हवाला देते हुए आइज़ैक ने कहा कि यदि कॉर्पोरेट लक्जरी अस्पतालों को छोड़ दिया जाए तो लगभग 99 प्रतिशत उपचार की लागत 5 लाख रुपये से कम होती है। हृदय सर्जरी की लागत आमतौर पर 1.5 लाख से 3.5 लाख रुपये के बीच होती है। कैंसर उपचार का खर्च लगभग 2 लाख से 4 लाख रुपये तक होता है। उन्होंने कहा कि केवल कुछ मामलों जैसे अंग प्रत्यारोपण में ही खर्च 5 लाख रुपये से ज्यादा होता है।

आइज़ैक के अनुसार “सिर्फ लगभग एक प्रतिशत मरीजों को ही इतनी बड़ी कवरेज की जरूरत होती है, लेकिन इसके लिए राज्य को बहुत बड़ा बीमा प्रीमियम देना पड़ेगा। यह पूरी तरह फिजूलखर्ची है।”उनका सुझाव है कि ऐसे महंगे इलाज के लिए अलग से लक्षित योजना अधिक व्यावहारिक होगी।

सार्वजनिक धन निजी अस्पतालों की ओर जाने का खतरा

आइज़ैक ने यह भी चेतावनी दी कि बड़े पैमाने पर बीमा योजना लागू होने से सरकारी धन निजी अस्पतालों की ओर चला जाएगा, जबकि जरूरत सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की है।उनके अनुसार केरल का स्वास्थ्य मॉडल ऐतिहासिक रूप से सार्वजनिक अस्पतालों के माध्यम से सेवाएं देने पर आधारित रहा है, जो काफी हद तक ब्रिटेन की National Health Service जैसी व्यवस्था से मिलता-जुलता है।

लंबे समय से चल रही वैचारिक बहस

इस मुद्दे ने केरल में लंबे समय से चल रही एक वैचारिक बहस को फिर से जीवित कर दिया है—स्वास्थ्य व्यवस्था में बीमा और निजी अस्पतालों की भूमिका कितनी होनी चाहिए।लेफ्ट का मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली ही व्यवस्था की रीढ़ बनी रहनी चाहिए, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट मानता है कि व्यापक बीमा व्यवस्था और निजी अस्पतालों की अधिक भागीदारी से स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ेगी।

कांग्रेस की स्वास्थ्य आयोग रिपोर्ट

कांग्रेस का कहना है कि राहुल गांधी की घोषणा अचानक किया गया चुनावी वादा नहीं है। यह पिछले साल गठित स्वास्थ्य आयोग की सिफारिशों पर आधारित है।इस आयोग ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियों का अध्ययन करने के बाद पिछले महीने अपनी रिपोर्ट सौंपी।रिपोर्ट के अनुसार केरल की मौजूदा सार्वजनिक बीमा व्यवस्था में कई समस्याएं हैं, जैसे भुगतान में देरी, उपचार पैकेज की कम कीमत, अस्पतालों के बकाया भुगतानइसी कारण कई निजी अस्पतालों ने सरकारी योजनाओं के तहत मरीजों को भर्ती करना कम कर दिया है।

‘ओमन चांडी हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम’

रिपोर्ट में प्रस्तावित योजना का नाम पूर्व मुख्यमंत्री Oommen Chandy के नाम पर “ओमन चांडी हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम” रखने का सुझाव दिया गया है।इस योजना के तहत हर परिवार को 25 लाख रुपये तक का इलाज कवरेज देने का प्रस्ताव है।

कांग्रेस नेता Ramesh Chennithala ने इस योजना का बचाव करते हुए कहा “यह योजना केरल की सामाजिक कल्याण योजनाओं के इतिहास में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगी। इसका उद्देश्य हर परिवार को बिना आर्थिक बोझ के गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उपचार उपलब्ध कराना है।”

केरल की मौजूदा मिश्रित स्वास्थ्य व्यवस्था

लेफ्ट सरकार का कहना है कि केरल पहले से ही एक मिश्रित स्वास्थ्य प्रणाली (हाइब्रिड सिस्टम) पर काम कर रहा है, जिसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के साथ सीमित बीमा सहायता भी शामिल है। राज्य की Karunya Arogya Suraksha Padhathi के तहत लाखों परिवारों को 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज मिलता है और इसमें सरकारी अस्पतालों की बड़ी भूमिका है।

लेफ्ट नेताओं का तर्क है कि बीमा कवरेज को बहुत अधिक बढ़ाने से सबसे ज्यादा फायदा बड़े निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों को होगा, जबकि इससे राज्य के खजाने पर भारी बोझ पड़ेगा।

‘पैसा कहां से आएगा?’

थॉमस आइज़ैक ने यह भी सवाल उठाया है कि इस योजना के लिए धन कहां से आएगा।उनके अनुमान के अनुसार, यदि हर परिवार को 25 लाख रुपये का बीमा कवर दिया गया, तो सरकार को हर साल दसियों हजार करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं।

आने वाले चुनावों में बड़ा मुद्दा

इस बहस ने केरल की स्वास्थ्य नीति की दिशा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। एक पक्ष सरकारी अस्पतालों को मजबूत करने और बीमा आधारित निजी इलाज पर निर्भरता कम करने की बात कर रहा है, जबकि दूसरा पक्ष व्यापक बीमा ढांचे के माध्यम से निजी अस्पतालों को स्वास्थ्य व्यवस्था में अधिक भूमिका देने का समर्थन कर रहा है।राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही स्वास्थ्य नीति फिर से एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है।राहुल गांधी के वादे ने केरल के मशहूर स्वास्थ्य मॉडल के भविष्य को लेकर एक नई राजनीतिक बहस की शुरुआत कर दी है।

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