आंध्र प्रदेश में ग्रामीण रोजगार का भविष्य खतरे में क्यों? VB-G RAM G को लेकर बढ़ी चिंता
x

आंध्र प्रदेश में ग्रामीण रोजगार का भविष्य खतरे में क्यों? VB-G RAM G को लेकर बढ़ी चिंता

MGNREGA में राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार योजना लागू करने की छूट थी। विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले आंध्र प्रदेश के लिए यह बेहद जरूरी था


Click the Play button to hear this message in audio format

MGNREGA की जगह VB-G RAM G अधिनियम लागू होने के बाद आंध्र प्रदेश के ग्रामीण गरीबों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या रोजगार की कानूनी गारंटी व्यवहार में भी बनी रहेगी? हालांकि, MGNREGA के तहत 100 दिन के काम की गारंटी थी, लेकिन बीते वर्ष राज्य में परिवारों को औसतन सिर्फ 51 दिन का ही रोजगार मिल पाया, जबकि केंद्र सरकार ने जरूरी फंड जारी किए थे।

रोजगार तक पहुंच कमजोर होने की आशंका

शोध संगठन लिबटेक (LibTech) की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि VB-G RAM G ढांचे में बदलाव से रोजगार तक पहुंच और अधिक कमजोर हो सकती है। यह योजना केवल केंद्र द्वारा अधिसूचित क्षेत्रों और निर्धारित बजट सीमा के भीतर ही लागू होगी, जिससे आंध्र प्रदेश जैसे कर्ज में डूबे राज्य को गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।

राज्यों पर बढ़ेगा आर्थिक बोझ

रिपोर्ट के मुताबिक, VB-G RAM G के तहत राज्यों की वित्तीय हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत हो जाएगी। आंध्र प्रदेश पहले ही लगभग ₹10 लाख करोड़ के कर्ज से जूझ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राज्य इस योजना को बड़े पैमाने पर लागू कर पाएगा।

सीमित दायरा, कमजोर अधिकार

MGNREGA के तहत ग्रामीण नागरिकों को काम मांगने का कानूनी अधिकार था और यदि 15 दिनों के भीतर काम नहीं मिला तो बेरोजगारी भत्ता देने का प्रावधान था। यह अधिकार पूरे ग्रामीण भारत में लागू था। इसके उलट VB-G RAM G केवल केंद्र के बजट तक सीमित है। केंद्र द्वारा चिन्हित क्षेत्रों में ही लागू होगा। हालांकि केंद्र सरकार का दावा है कि नए कानून में काम के दिनों की सीमा 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई है, लेकिन विशेषज्ञों को इस पर भरोसा नहीं है। MGNREGA के तहत भी औसतन सिर्फ 51.6 दिन का काम मिला। केवल 11% परिवारों को पूरे 100 दिन का रोजगार मिला।

ग्रामीणों पर भारी पड़ सकता है VB-G RAM G?

* रोजगार मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं

* गंभीर आर्थिक संकट के बीच राज्य पर बढ़ा खर्च

* केवल केंद्र द्वारा अधिसूचित क्षेत्रों तक सीमित कवरेज

* तकनीक आधारित प्रक्रिया से कमजोर वर्गों के बाहर होने का खतरा

* स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार योजना लागू करने की आज़ादी नहीं

विश्लेषकों का कहना है कि 125 दिन की सीमा बढ़ाने से रोजगार की गारंटी नहीं मिलती, क्योंकि काम अब अधिकार नहीं बल्कि प्रशासनिक निर्णय पर निर्भर होगा।

प्रभावित होंगे कमजोर वर्ग

लिबटेक के अनुसार, MGNREGA पर निर्भर लोगों में 19% अनुसूचित जाति (SC), 9.3% अनुसूचित जनजाति (ST) और 58–60% महिलाएं हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि रोजगार गारंटी योजनाएं हाशिए पर खड़े समुदायों के लिए कितनी जरूरी हैं। लिबटेक ने चेतावनी दी है कि नया कानून इन वर्गों की आजीविका को कमजोर कर सकता है।

मांग और रोजगार के बीच बड़ा अंतर

वर्ष 2024-25 में, जब MGNREGA के तहत 100 दिन का काम कानूनी अधिकार था, तब भी औसतन 51.6 दिन का ही रोजगार मिला। सिर्फ 11% परिवार 100 दिन तक पहुंच पाए। लिबटेक का कहना है कि VB-G RAM G में रोजगार को अधिकार नहीं माना गया है, इसलिए 125 दिन की सीमा केवल कागजी दावा बनकर रह सकती है। यह चिंता 2023-24 के आर्थिक सर्वेक्षण में भी सामने आई थी, जिसमें कहा गया था कि ग्रामीण रोजगार की मांग के अनुरूप काम नहीं मिल पा रहा है। कई बार जमीनी स्तर पर काम की मांग दर्ज ही नहीं होती, जिससे असल संकट आंकड़ों में दिखता ही नहीं।

ग्राम सभाओं को लेकर भी सवाल

लिबटेक ने आंध्र प्रदेश सरकार की आलोचना करते हुए कहा है कि अधिकारियों को ग्राम सभाओं में VB-G RAM G के “फायदे” बताने के निर्देश दिए गए हैं, जबकि इसके जोखिमों पर चर्चा नहीं हो रही। लिबटेक कार्यकर्ता चक्रधर बुद्धम का कहना है कि योजना केवल केंद्र द्वारा अधिसूचित क्षेत्रों में लागू होगी, लेकिन ग्राम सभाएं पूरे राज्य में हो रही हैं। ऐसे में संख्यात्मक रूप से छोटे आदिवासी समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।

बढ़ता खर्च, घटती संभावना

चक्रधर बुद्धम के मुताबिक, वर्तमान स्तर पर रोजगार देने पर राज्य का खर्च ₹517 करोड़ से बढ़कर ₹3,470 करोड़ हो जाएगा। 125 दिन का काम देने पर सालाना खर्च करीब ₹8,400 करोड़ होगा। 60:40 के केंद्र-राज्य हिस्सेदारी फार्मूले में कुल खर्च ₹11,700 करोड़ तक पहुंच सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि केंद्र अपनी 60% हिस्सेदारी पूरी नहीं देता तो अतिरिक्त बोझ राज्यों को ही उठाना पड़ेगा। आर्थिक रूप से कमजोर राज्य मजबूरन योजना में कटौती करेंगे।

तकनीक के कारण बाहर होते मजदूर

VB-G RAM G में मजदूरों की पहचान, उपस्थिति दर्ज, काम की निगरानी और मजदूरी भुगतान हर चरण में तकनीक अनिवार्य कर दी गई है। चक्रधर बुद्धम के अनुसार, आंध्र प्रदेश में MGNREGA के दौरान आधार लिंकिंग से 78 लाख नाम हटाए गए। आधार आधारित e-KYC से **16 लाख नाम** एक महीने में हटे। इससे बुजुर्ग, अकेली महिलाएं, दिव्यांग और दूरदराज के आदिवासी सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। कई मामलों में काम पूरा होने के बावजूद मजदूरी नहीं मिली।

स्थानीय नियंत्रण भी होगा कमजोर

MGNREGA में राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार योजना लागू करने की छूट थी। विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले आंध्र प्रदेश के लिए यह बेहद जरूरी था। VB-G RAM G में प्राथमिकताएं केंद्र की ‘विकसित भारत’ नीति के अनुसार तय होंगी, जिससे पंचायतों और राज्यों की भूमिका सीमित हो जाएगी। नए कानून में खेती के मौसम में 60 दिनों तक काम रोकने का भी प्रावधान है। इस पर सवाल उठाते हुए चक्रधर कहते हैं कि आंध्र प्रदेश में कोई एक कृषि मौसम नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग चक्र होते हैं। MGNREGA में काम कम होता था, बंद नहीं।

रोजगार सुरक्षा पर बड़ा सवाल

MGNREGA ने दलितों और महिलाओं की मोलभाव की ताकत बढ़ाई थी, क्योंकि उनके पास आय का एक सुरक्षित विकल्प था। लिबटेक का कहना है कि VB-G RAM G के प्रशासनिक नियंत्रण और शर्तें इन उपलब्धियों को पीछे धकेल सकती हैं। केंद्र के निर्देशों और सीमित राज्य संसाधनों के बीच फंसी यह नई योजना क्या वाकई आंध्र प्रदेश के ग्रामीण गरीबों के लिए सुरक्षा कवच बन पाएगी, यह अब भी एक खुला सवाल बना हुआ है।

Read More
Next Story