साथानकुलम कांड के दोषी 9 पुलिसवालों को मौत की सजा, तड़पाकर ली थी जान
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मुख्य गवाह कांस्टेबल रेवती की गवाही और उनके साहस की कहानी

साथानकुलम कांड के दोषी 9 पुलिसवालों को मौत की सजा, तड़पाकर ली थी जान

साथानकुलम कांड में मुख्य गवाह कांस्टेबल रेवती की गवाही और उनके साहस की पूरी कहानी। यह भी कि 9 पुलिसवालों ने कैसे बाप-बेटे को हिरासत में तड़पाकर मार डाला था...


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तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले में स्थित साथानकुलम पुलिस स्टेशन में जून 2020 में जो हुआ, उसने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था। पी. जयराज और उनके बेटे इमैनुएल बेनिक्स की पुलिस हिरासत में हुई मौत ने पुलिस बर्बरता और जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े किए थे। इस मामले में हाल ही में (6 अप्रैल को) मदुरै की एक अदालत ने सभी नौ दोषी पुलिस अधिकारियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। इस न्याय की प्राप्ति में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उस समय की हेड कांस्टेबल रेवती की रही, जिनकी गवाही ने इस केस का रुख पूरी तरह बदल दिया।

सच्चाई बताने के बाद सुरक्षा का डर

जुलाई 2020 में जब यह मामला चरम पर था, तब रेवती ने 'द फेडरल' के साथ बातचीत में अपने मन की घबराहट साझा की थी। उन्होंने बताया था कि सच बोलने का फैसला उनके लिए कितना भारी था। रेवती ने कहा था, "मैंने मजिस्ट्रेट को इस उम्मीद में सब कुछ बताया था कि मेरा नाम गुप्त रखा जाएगा। लेकिन अब मेरा नाम हर जगह सामने आ चुका है। मुझे अब अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता सता रही है। मैं सच में डरी हुई हूं।" उन्हें न केवल अपनी जान का खतरा था बल्कि पुलिस विभाग के भीतर अपने करियर और भविष्य को लेकर भी वे भारी अनिश्चितता में थीं।

उस खौफनाक रात का आंखों देखा हाल

रेवती ने कोविलपट्टी मजिस्ट्रेट एम.एस. भारथीदासन के सामने 19 जून की उस काली रात का विस्तृत विवरण दिया था। उन्होंने बताया कि किस तरह जयराज और बेनिक्स को हिरासत के दौरान बेरहमी से प्रताड़ित किया गया। रेवती की गवाही के अनुसार...

पिता और पुत्र को पूरी रात थाने में बुरी तरह पीटा गया था।

पिटाई इतनी बर्बर थी कि थाने के भीतर मौजूद मेज और पुलिस की लाठियों पर खून के धब्बे लग गए थे।

उन्होंने मजिस्ट्रेट को उन जगहों के बारे में भी बताया जहां ये सबूत मौजूद थे।

रेवती के इस साहसी बयान के आधार पर ही मजिस्ट्रेट ने सीधे पुलिस थाने से सबूत इकट्ठा करने की प्रक्रिया शुरू की। पुलिस विभाग के भीतर रहकर अपने ही साथियों के खिलाफ ऐसा कदम उठाना एक असाधारण बात थी, जिसने जांच को सही दिशा दी।

अदालत का हस्तक्षेप और सीबीआई जांच

रेवती के खुलासों और इस घटना की गंभीरता को देखते हुए मद्रास उच्च न्यायालय ने खुद (suo motu) इस मामले का संज्ञान लिया। अदालत को अंदेशा था कि स्थानीय पुलिस साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ कर सकती है। इसके बाद जांच सीबी-सीआईडी (CB-CID) को सौंपी गई, जिसने 1 जुलाई से जांच शुरू की। बाद में इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के हवाले कर दिया गया।

व्हिसलब्लोअर की चुनौतियां और आज का सम्मान

रेवती ने उस वक्त कहा था कि उन्होंने जो भी किया, वह केवल अपने कर्तव्य और काम के प्रति ईमानदारी के कारण किया। उन्होंने कहा था, "मैंने सोचा कि मुझे अपने काम के प्रति सच्चा होना चाहिए, इसलिए मजिस्ट्रेट को वह सब बता दिया, जो उस दिन हुआ था।" हालांकि उस समय उन्हें वरिष्ठ अधिकारियों से सीधे तौर पर कोई धमकी नहीं मिली थी। लेकिन वे भविष्य को लेकर आशंकित थीं, जैसा कि अक्सर किसी भी 'व्हिसलब्लोअर' (भंडाफोड़ करने वाले) के साथ होता है।

आज, करीब छह साल बाद, जब दोषियों को सजा मिल चुकी है। रेवती के उस फैसले की चौतरफा सराहना हो रही है। संस्थागत दबाव और डर के बावजूद सच का साथ देने की उनकी इस इच्छा ने साबित कर दिया कि एक व्यक्ति की ईमानदारी न्याय की जीत में कितनी निर्णायक हो सकती है।

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