
सथानकुलम केस में 9 पुलिसकर्मियों को फांसी, ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ पर बहस तेज
तमिलनाडु के सथानकुलम केस में 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा मिली है। इस फैसले ने कस्टोडियल हिंसा, मृत्युदंड और पुलिस सुधारों पर नई बहस छेड़ दी है।
तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के सथानकुलम कस्टोडियल डेथ मामले में मदुरै की एक अदालत ने नौ पुलिसकर्मियों को मृत्युदंड सुनाया है। यह मामला व्यापारी पी. जयराज और उनके बेटे जे. बेनिक्स की हिरासत में हुई मौत से जुड़ा है। अदालत ने इसे कानून की रक्षा करने वालों द्वारा किया गया “दुर्लभ अपराध” बताया। वर्ष 2020 की इस घटना ने पूरे देश में आक्रोश पैदा कर दिया था।
यह फैसला पुलिस जवाबदेही और सुधारों को लेकर नए सवाल खड़े करता है। वरिष्ठ कानूनी पत्रकार और संवैधानिक विशेषज्ञ वी. वेंकटेशन के अनुसार, “मृत्युदंड तभी दिया जा सकता है जब आजीवन कारावास की संभावना पूरी तरह समाप्त हो जाए—यही कानूनी कसौटी है।” उन्होंने इस मामले में नौ पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा दिए जाने पर सवाल उठाए हैं।
‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ पर फिर बहस
इस फैसले ने ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत, पुलिस जवाबदेही और कस्टोडियल हिंसा के मामलों में मृत्युदंड की उपयोगिता पर बहस को फिर से तेज कर दिया है।
क्या यह सजा असामान्य है?
भारत के न्यायिक इतिहास में एक साथ नौ लोगों को मृत्युदंड देना बेहद दुर्लभ है। 1980 के बच्चन सिंह फैसले के बाद से मृत्युदंड केवल “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” मामलों में ही दिया जाता है। हालांकि, उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट अक्सर ऐसी सजाओं को कम करके आजीवन कारावास में बदल देते हैं। निर्भया केस के बाद भी बहुत कम मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड को बरकरार रखा है।
सजा तय करने के मानदंड
अदालत केवल अपराध की प्रकृति ही नहीं, बल्कि आरोपी के व्यवहार, पृष्ठभूमि और जेल में उसके आचरण को भी ध्यान में रखती है। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354(3) के तहत मृत्युदंड देने के लिए “विशेष कारण” दर्ज करना जरूरी होता है, और यह हर आरोपी के लिए अलग-अलग होना चाहिए।
क्या सजा बदली जा सकती है?
ट्रायल कोर्ट का फैसला अंतिम नहीं है। इसे मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ से मंजूरी मिलनी जरूरी है, और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट भी इसकी समीक्षा कर सकता है।
यह मामला इसलिए भी अलग है क्योंकि आरोपी पुलिसकर्मी हैं, जो राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। कस्टोडियल हिंसा को राज्य की हिंसा माना जाता है। इस मामले में सबूतों से छेड़छाड़ के भी आरोप हैं, जैसे सीसीटीवी फुटेज का गायब होना।
क्या मृत्युदंड प्रभावी रोक है?
मृत्युदंड को लेकर हमेशा बहस रही है कि क्या यह अपराध रोकने में प्रभावी है। कई न्यायाधीश अब यह मानने लगे हैं कि यह जरूरी नहीं कि मृत्युदंड एक प्रभावी निवारक हो। हालांकि, इस मामले की क्रूरता ने समाज को झकझोर दिया, जैसा कि निर्भया केस में भी देखा गया था।
पुलिस बर्बरता और कानूनी कमी
भारत में अब तक कस्टोडियल टॉर्चर के खिलाफ कोई स्वतंत्र कानून नहीं है, जबकि देश ने संयुक्त राष्ट्र के टॉर्चर विरोधी कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन उसे अब तक अनुमोदित नहीं किया गया है। इस मामले में सीबीआई ने भारतीय दंड संहिता की सामान्य हत्या की धाराओं का उपयोग किया।
सिस्टम की खामियां
इस मामले ने जांच प्रक्रिया में कई खामियां उजागर कीं—जैसे सबूतों से छेड़छाड़ और पुलिस थानों में सीसीटीवी की कमी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद कई थानों में उचित निगरानी व्यवस्था नहीं है।राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार, 2015 से 2022 के बीच 20,000 से अधिक कस्टोडियल मौतें दर्ज हुईं, लेकिन बहुत कम मामलों में इस तरह का निर्णय सामने आता है।
सुधार की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मृत्युदंड से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। जरूरी है कि भारत एक मजबूत और स्वतंत्र कानून बनाए जो कस्टोडियल टॉर्चर को स्पष्ट रूप से अपराध घोषित करे।
आगे की राह
यह मामला न्यायपालिका और संसद दोनों के लिए एक सबक है। संसद को कस्टोडियल टॉर्चर के खिलाफ कानून बनाना चाहिए। वहीं, सुप्रीम कोर्ट भी दिशा-निर्देश जारी कर सकता है, जैसा उसने विशाखा केस में किया था। इस तरह के मामलों में असली न्याय तभी होगा जब ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस और स्थायी सुधार किए जाएं।

