
माघ मेला में गंगा स्नान विवाद ने खोली व्यवस्थागत दरारें, संत समाज में बेचैनी
मौनी अमावस्या पर गंगा स्नान को लेकर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन में टकराव हुआ। मामला संत समाज और सियासत तक पहुंच गया है।
प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या के अवसर पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच उत्पन्न विवाद लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। गंगा स्नान को लेकर शुरू हुआ यह मामला अब साधु-संतों, राजनीतिक दलों और सरकार के शीर्ष स्तर तक पहुंच गया है, जिससे संत समाज में गहरी नाराज़गी देखने को मिल रही है।
स्नान को लेकर टकराव और धरना-प्रदर्शन
मौनी अमावस्या के दिन मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को पालकी में बैठकर गंगा स्नान के लिए जाने से रोक दिया। इसके बाद शंकराचार्य के समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति बन गई। हालात बिगड़ने पर शंकराचार्य ने मेला और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ धरना-प्रदर्शन किया।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान प्रयागराज मेला प्राधिकरण की ओर से शंकराचार्य को दो अलग-अलग नोटिस जारी किए गए, जिससे संत समाज में असंतोष और बढ़ गया। संतों का कहना है कि यह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि शंकराचार्य पद और परंपरा के सम्मान का सवाल है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बयान
विवाद के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बयान सामने आया। उन्होंने कहा कि एक योगी, संत और संन्यासी के लिए धर्म और राष्ट्र सर्वोपरि होते हैं। उनकी कोई व्यक्तिगत संपत्ति नहीं होती, धर्म ही उनकी संपत्ति और राष्ट्र ही उनका स्वाभिमान होता है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि कुछ ‘कालनेमि प्रवृत्ति’ के लोग धर्म की आड़ में सनातन धर्म को कमजोर करने की साजिश कर सकते हैं, इसलिए ऐसे तत्वों से सतर्क रहने की आवश्यकता है।
संत समाज दो धड़ों में बंटा
इस घटना के बाद देशभर के साधु-संतों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। कई संत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में खुलकर सामने आए, जबकि कुछ ने संयम और आपसी संवाद से विवाद सुलझाने की अपील की। कथावाचक अनिरुद्धाचार्य ने प्रशासन पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि शंकराचार्य का अपमान किया गया है। उन्होंने कहा कि किसी के बाल पकड़कर अपमान करना संविधान के खिलाफ है और प्रशासन को ब्राह्मणों व साधुओं से माफी मांगने में संकोच नहीं करना चाहिए।
वहीं कथावाचक देवकी नंदन ठाकुर ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की। उन्होंने कहा कि भगवा धारण करने वाले संत के साथ मारपीट उचित नहीं है और विवाद को बढ़ाने के बजाय आपसी समझ से सुलझाया जाना चाहिए।
वृंदावन और हरिद्वार में विरोध प्रदर्शन
मथुरा के वृंदावन में ब्रजभूमि के संत समाज ने मांग की कि शंकराचार्य को सम्मानपूर्वक दोबारा गंगा स्नान कराया जाए। संतों ने आरोप लगाया कि कुछ अधिकारी योगी सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। फलाहारी बाबा ने कहा कि शंकराचार्य का अपमान जानबूझकर किया गया, जबकि स्वामी अतुल कृष्ण दास महाराज ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ जांच और कार्रवाई की मांग की। महामंडलेश्वर रामदास महाराज ने इसे भगवान शिव की पीठ का अपमान बताते हुए मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की अपील की।
हरिद्वार की हर की पौड़ी पर भारत साधु समाज और अखंड परशुराम अखाड़े ने एक घंटे का धरना दिया। अखाड़े के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने चेतावनी दी कि यदि प्रशासन माफी नहीं मांगता, तो संत समाज और कठोर कदम उठाने को मजबूर होगा।
बाबा रामदेव और अन्य संतों की प्रतिक्रिया
योगगुरु स्वामी रामदेव ने कहा कि तीर्थ स्थलों पर किसी भी प्रकार का अहंकार या एजेंडा लेकर नहीं आना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी साधु, चाहे वह शंकराचार्य हों या कोई अन्य, के साथ अभद्र व्यवहार अस्वीकार्य है। बाबा रामदेव ने चेतावनी दी कि आपसी टकराव से सनातन धर्म कमजोर होता है। नागपुर में आयोजित एक धर्मसभा में पश्चिमाम्नाय द्वारकाशारदापीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती महाराज ने भी प्रयागराज की घटना की कड़ी निंदा की।
राजनीतिक बयानबाजी भी तेज
इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि जगद्गुरु शंकराचार्य के अपमान से हर सनातनी आहत है और बीजेपी सनातन परंपराओं को कमजोर करने की साजिश कर रही है। वहीं उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि शंकराचार्य सम्मानपूर्वक स्नान करें और इस विवाद को समाप्त किया जाए। शिवपाल यादव ने मुख्यमंत्री के ‘कालनेमि’ वाले बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि जब शंकराचार्य का सम्मान नहीं है, तो यह सभी संतों का अपमान है।

